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भाजपा नॉन जाट के सहारे

विधानसभा चुनाव में जाट उम्मीदवारों की कटेगी टिकट गैर जाट वोट पर लामबंद भाजपा : दूसरी पार्टी से आये कार्यकर्ता और नेताओं को टिकट मिलने के आसार

हिसार टुडे । महेश मेहता 

आम आदमी पार्टी, बसपा, जजपा, लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी और कांग्रेस द्वारा इस बार विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने के फैंसले से जहां भारतीय जनता पार्टी की जीत की राह आसान होती प्रदर्शित हो रही है। भाजपा के नेता अब मिशन 75 से आगे जाने की बात कर रहे हैं, मगर शायद पार्टी के अंदर आने वाले दिनों में होने वाले घमासान और वर्तमान विधायकों को अकार्यशीलता के कारण पार्टी हाई कमान द्वारा टिकट काटने का अंदेशा अब मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और पार्टी के अंदर तमाम नेताओं को होने लगा है।
इसी का जीता जागता उदाहरण हाल में देखने को मिला जब ओमप्रकाश धनखड़ के सामने महम में टिकट की दावेदारी के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा कर रहे भाजपा नेता शमशेर खरकड़ा व बलराज कुंडू के समर्थक आपस में भिड़ गए। इस टकराव का सीधा मतलब यही है कि भारतीय जनता पार्टी को इस बार पार्टी के अंदर घमासान का सामना करना पड़ सकता है। इस बार खास हरियाणा में पार्टी हाईकमान की नजर है।

बता दें कि इस बार लोकसभा चुनाव में भले ही भारतीय जनता पार्टी को हरियाणा का 58% वोट मिले हों, मगर हकीकत तो यह है कि इसी लोकसभा चुनाव में भाजपा को 90 में से 11 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल करने में नाकामयाबी मिली। उनमें से ज्यादातर वही सीट हैं जो जाट और मुस्लिम बाहुल्य सीटें थीं। जिसमें प्रमुखता से हरियाणा सरकार में वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु और बादली के विधायक ओमप्रकाश धनखड़ का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इतना ही नहीं इस बार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अपनी गैर जाट राजनीति खेलेगी और जाट उम्मदवारों की पिछले चुनाव की तुलना में इस बार भाजपा थोक के भाव में टिकट न देकर केवल उस क्षेत्रों में टिकट देने का काम करेगी जहां पर जाट मतदाताओं की तादात ज्यादा है।

बादली और नारनौंद में भाजपा के दिग्गजों के बढ़त नहीं दिला पाने से पार्टी हाईकमान नाराज

बता दे इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जितनी उम्मीद अपने विधायकों पर रखी थी। उनमें से 2 जाट नेताओं ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उनमें शामिल है वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु और कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़। बता दें कि आंकड़े बताते हैं कि सोनीपत विधानसभा क्षेत्र में 9 में से 7 विधानसभा में ही भाजपा ने लीड हासिल की थी। बता दें कि सोनीपत में 9 विधानसभा क्षेत्र में से 5 विधानसभा में कांग्रेस के विधायक हैं। उनमें से 2 जगह पर कांग्रेस के लोकसभा भूपेंद्र हुड्डा को लीड मिली थी। जबकि कृषि मंत्री ओमप्रकश धनखड़ के बादली विधानसभा से भाजपा को तकरीबन 11,500 वोट कम मिले। जबकि हिसार लोकसभा के अंतर्गत आने वाले 9 विधानसभा क्षेत्रों में अकेले 1 विधानसभा क्षेत्र से भाजपा को वोट नहीं मिले उनमें शामिल है नारनौंद हलका। यहां के विधायक वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु है। मगर उनके हलके से भाजपा को तकरीबन 3000 वोटों से हार मिली। जिस पर पार्टी के नेताओं और पार्टी हाईकमान ने भी गौर किया है। इसलिए हो सकता है कि उनके प्रति जनता की नाराजगी को देखते हुए पार्टी उनका टिकट काट दे। सूत्रों का कहना है कि नतीजे आने के बाद कई विधायक और मंत्री सीट बदलने की कोशिशों में जुटे हैं। हालांकि नेतृत्व ने किसी भी सूरत में इनकी सीटों में बदलाव नहीं करने का फैसला किया है। भले ही वह जीते या हारे।

दीपेंद्र को जिस तरह से हराया उससे जाट नाराज

बता दें कि बादली विधानसभा क्षेत्र से इस बार लोकसभा चुनाव में लीड न मिलने का कारण एक मात्र यही है कि धनखड़ को लेकर जाट मतदाताओं में नाराजगी है। इतना ही नहीं इस विधानसभा चुनाव में धनखड़ को और मुसीबत होगी, क्यूंकि इस बार जिस प्रकार से दीपेंद्र हुड्डा को हराया गया उससे जाट मतदाता बेहद नाराज हैं और हो सकता है कि उसका खामियाजा धनखड़ को इस चुनाव में भुगतना पड़े। वहीं वित्तमंत्री के खिलाफ नाराजगी का आलम तो लोकसभा चुनाव के दौरान ही नजर आ गया था जब भाजपा के प्रत्याशी बीरेंद्र सिंह की सभा खुलेआम विरोध दिखायी दिया। नारनौद के लोगों का मानना है कि कैप्टन अभिमन्यु की उन 5 सालों में वह सक्रियता नहीं रही जिसकी उम्मीद की जा रही थी, दूसरा जाट आरक्षण के दौरान युवकों पर चल रहा मामला भी कैप्टन अभिमन्यु ने पीछे नहीं लिया जिसका खामियाजा लोकसभा में दिखाई दिया और जब बात विधानसभा चुनाव आएगी मुसीबत और बढ़ेगी।

जाट बनाम गैर-जाट की रणनीति

2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने करीब 28 फीसदी टिकट जाट बिरादरी को दिया था। इनमें से मात्र 6 सीटों पर ही पार्टी को जीत हासिल हुई थी। मगर इस बार पार्टी का इरादा वहां गैरजाट वोटों को अपने पक्ष में गोलबंद करने का है। ऐसे में हो सकता है कि पार्टी इस बार जाट बिरादरी के करीब 11 से 13 नेताओं को ही टिकट देगी। बता दें कि हर चुनाव चाहे वह मेयर चुनाव हो या लोकसभा चुनाव। हर चुनावों में भाजपा ने नॉन-जाट की राजनीति खेलते हुए अपने सफलता की सीढियां चढ़ी। यही कारण है कि इस बार दूसरी पार्टी के नेताओं के भाजपा में शामिल होने के बाद हो सकता है कि दूसरी पार्टी से आये नेताओं को तबज्जो मिलेगी। अगर ऐसा होता है तो 5 साल से टिकट की बांट जोह रहे कार्यकर्ताओं को बस हाथ मलते रह जाना पड़ेगा। बता दें बीते चुनाव में पार्टी ने 17 सीटों पर दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट दिया था।

भाजपा में चौधरी बीरेंद्र सिंह आज के समय में सबसे बड़े जाट नेता

बता दे कि लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा के सामने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि पार्टी में सबसे बड़ा जाट नेता कौन है। इससे पहले कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़ की इसमें गिनती होती थी। लेकिन दोनों की विधानसभा से भाजपा उम्मीदवारों के पिछड़ने से इन दोनों के कद पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जबकि इन सब में चौधरी बीरेंद्र सिंह ने बाजी मारी है। अब भाजपा में उनके अलावा अब कोई दूसरा बड़ा जाट नेता साबित नहीं हुआ है।

जाट मंत्रियों-विधायकों की नहीं बदलेगी सीट

बता दे कि इस बार लोकसभा चुनाव में पार्टी जिन 90 में से 11 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल करने में नाकाम रही, उनमें ज्यादातर जाट और मुस्लिम बाहुल्य सीटें थीं। इनमें दो कद्दावर जाट मंत्रियों कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़ की नारनौद और बादली सीट भी शामिल थी। सूत्रों का कहना है कि नतीजे आने के बाद कई विधायक और मंत्री सीट बदलने की कोशिशों में जुटे हैं। हालांकि नेतृत्व ने किसी भी सूरत में इनकी सीटों में बदलाव नहीं करने का फैसला किया है।

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