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हुड्डा या कुलदीप ही बचा सकते है कांग्रेस (Video)

हुड्डा ने विधायकों की फैज लगाकर दिखाया अपना दम, नॉन जाट के सहारे खेल खेलने वाली भाजपा की तोड़ के लिए कुलदीप बिश्नोई पर दांव लगाना होगा फायदेमंद, 32 सीटों में हार जीत का फैसला जाट मतदान के हाथ

अर्चना त्रिपाठी | हिसार टुडे
100 से 110 दिन बचे है। अगर अब भी कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेशाध्यक्ष को लेकर कोई फैसला नहीं लिया तो वह दिन दूर नहीं कि कांग्रेस को हरियाणा विधानसभा के नतीजों को देखकर दिल मसोस कर रह जाना पड़े। बता दे कि आज हरियाणा में हर चुनाव में जातिगत फैक्टर बहुत मायने रखते हैं। राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 32 सीट पर जीत-हार का फैसला जाट मतदाता ही करते हैं वहीं तकरीबन 17 अन्य सीटे ऐसी है जहां उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसके बाद अहीर, यादव और गुर्जर मतदाताओं का नंबर आता है हरियाणा की ऐसी 10 सीटों को वह प्रभावित करने का दम रखते है। इतना ही नहीं नौ सीटों पर दलित और 4 पर मुस्लिम वोटरों का दबदबा हमेशा दिखाई दिया है। यही कारण है कि जब एक तरफ कांग्रेस की लुटिया डूबती जा रही है। उसके बावजूद भी केंद्र अब तक शांत बैठा हुआ है।

आज मौके की नजाकत देख इतना तो तय है कि अगर कांग्रेस को लगता है कि जाट मतों को साधने से उन्हें फायदा मिल सकता है तो उन्हें पूर्ण मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं। वही अगर उसे लगता है कि नॉन जाट मतों के जरिये कांग्रेस अपने जीत की राह प्रशस्त कर सकती है, तो उन्हें नॉन जाट नेता के तौर पर मशहूर कुलदीप बिश्नोई को प्रदेशाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौप देनी चाहिए। वर्ण जितना कांग्रेस हाईकमान देरी करेगा हरियाणा में कांग्रेस पार्टी उनकी ख़त्म होने की कगार में पहुंच जाएगी।

कुलदीप बिश्नोई से कांग्रेस को आस

बता दें की कुलदीप बिश्नोई वही नेता है जिनके कंधो के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा में अपनी सत्ता पानी की कोशिश की। यह सभी जानते है कि भाजपा के कमजोर प्रत्याशियों को जिताने में कुलदीप बिश्नोई का विशाल जनसमर्थन तूफ़ान की तरह काम कर गया था। यह कहना गलत नहीं होगा कि कुलदीप बिश्नोई ने एक समय में अपने साथ आपार जनसमर्थन के दम पर हरियाणा की राजनीति में एक नया कीर्तिमान गढ़ा था।

मगर जब से वह सत्ता से दूर हुए गैर जाट वोट भाजपा की तरफ खिसकते चले गए. यह रिपोर्ट बताती है की इस बार भी भजपा को लोकसभा में जीत सिर्फ गैर जाट मतों के सहारे ही मुमकिन हो पायी। यही कारण है कि केंद्र अगर फैसला लेता है कि भाजपा के गैर जाट छवि को तोड़े तो उसे कुलदीप बिश्नोई से बेहतर शायद ही कोई मिले। जानकार मानते है कि अगर कुलदीप बिश्नोई को मौका मिलता है और अगर राहुल गाँधी गुटबाजी को समाप्त करने के लिए कठोर कदम उठाकर कुलदीप पर दांव खेलते है तो वो कही न कही उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

अशोक तंवर नहीं जीत पाए विधायकों का दिल

हुड्डा ने अपने आवास में बैठक लेकर सभी विधायकों को हाजिर करके यह तो दिखा दिया की सभी विधायक किसके साथ है मगर दूसरी तरफ अशोक तंवर के खिलाफ यह बात जाती है कि वह अपने कांग्रेस के विधायकों और कार्यकर्ताओ का दिल जीत नहीं पाए जितना दिल हुड्डा ने जीता। यही कारण है कि आज अशोक तंवर के साथ कोई विधायक खड़ा नहींहै। वैसे अशोक तंवर इस माध्यम से यह दिखा रहे है कि वह गुटबाजी में नहीं है। मगर अब कांग्रेस पार्टी को लगता है कि जिताऊ विधायक हुड्डा के साथ है तो अशोक तंवर को हटाना ही शायद ज्यादा बेहतर होगा।

हुड्डा ने दिखाया दम

हाल में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चौ. भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने दिल्ली में स्थल पर जो बैठक बुलाई थी उसमें 13 विधायक,65 पूर्व विधायक,8 पूर्व सांसद, 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशीगण, पार्टी के पूर्व पदाधिकारी, जिला परिषद्/पंचायत सदस्य तथा स्थानीय निकायों के सदस्य और कांग्रेस के विभिन्न प्रकोष्ठों के पदाधिकारीगण शामिल हुए। इस बैठक में जो उनका दमखम दिखाई दिया उसने पुरे कम से कम पोआरटी को यह तो दिखा दिया की उनके साथ कितने विधायकों का समर्थन है। जिसने इस बात को जाहिर कर दिया है कि आज अशोक तंवर को कोई विधायक पसंद नहीं करता। और अधिकतर कार्यकर्ताओ का मत यही है कि वह हुड्डा के साथ विधानसभा चुनाव में उतरना चाहते है।

जाटों के हाथ सत्ता की चाबी

जिलाें के आधार पर बात करें तो रोहतक, हिसार, सोनीपत, कैथल, जींद, फतेहाबाद, झज्जर, भिवानी और सिरसा में हमेशा से जाटों का दबदबा रहा है। इन्हीं जिलों के शहरी क्षेत्रों की कुछ सीटों पर पंजाबी व बनिया मतदाता जीत-हार का फैसला करते हैं। दक्षिण हरियाणा में अहीर, यादवों के साथ गुर्जर वोटरों की संख्या ज्यादा है। पूर्वी हरियाणा में दलित तो पंजाब से लगते अम्बाला, करनाल, कुरुक्षेत्र में सिख/पंजाबी वोटर नेताओं का भाग्य तय करते हैं। पंजाब से लगती सिरसा की एक-दो सीटों पर भी सिख वोटर भी चुनाव में अहम भूमिका में हैं।

बिखराव से हारी कांग्रेस, गठबंधन में एंट्री करने वाली भाजपा आज भी किंग मेकर

25 साल और 5 चुनाव का ट्रेंड पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो विधानसभा चुनाव का बीते 25 साल का ट्रेंड बताता है कि जब-जब कांग्रेस ने बिखराव या बगावत झेली तब-तब उसे हार का मुंह देखना पड़ा। जबकि बहुकोणीय मुकाबला होने पर कांग्रेस पार्टी हमेशा फायदे में रही। वहीं भाजपा भी गठबंधन में चुनाव लड़कर ही किंगमेकर की भूमिका में आई।

दिलचस्प पहलू यह भी है कि केंद्र में जिस पार्टी की सत्ता रही, राज्य में सिंहासन उसी को मिला। यानि गठबंधन के साथ हरियाणा में छाने वाली भाजपा को आज खुद के दम पर फतह करना आसान होने जा रहा है। राजनितिक पंडित मानते है कि राहुल गाँधी अपने खुद के हित की नहीं बल्कि पार्टी के बारे में सोच कर कोई निर्णय लेना चाहिए। क्योंकि जहा आज भाजपा अपने संगठन के डीएम पर इतनी मजबूत होती जा रही है कि उसे हराना मुशिकल होता जा रहा है , जबकि कांग्रेस अब तक अध्यक्षपद व्यर्थ समय बर्बाद कर अपने पाँव में खुद कुल्हाड़ी मारने में जुटी है।

अगर यही हाल रहा था वो दिन दूर नहीं जब कांग्रेस न केवल अपना जाट मतदाताओं का अच्छा खास वोटबैंक खोते जायेगी और कांग्रेस की इसी कमजोरी का फायदा भजपा उठाएगी। इसलिए राहुल गाँधी हो जल्द ही फैसले लेने चाहिए। क्योंकि अब काफी देर इंतज़ार नहीं किया जा सकता। अगर उन्हें भाजपा के मुकाबले खड़ा होना है तो अभी से तैयारी करनी पड़ेगी। अगर राहुल ऐसा करने में विफल साबित होते है तो यह कोई नहीं बदल सकता की कांग्रेस की गुटबाजी और बिखराव के बिच पार्टी मुश्किल से अपनी सीट निकाल पाए। वही भाजपा की पहले और अब की स्थिती में बहुत बदलाव आया है।

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