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यात्राएँ मतलब बाहर के साथ – साथ भीतर की भी और ऐसी यात्राएं बहुत कम लोग कर पाते हैं …

सोशल मीडिया

आलोक को नई जगहों के प्रति रोमांच। है उतनी ही ललक उसे भीतर तक महसूस करने की है उसे जी लेने की है। उनकी यात्राएं मोबाइल सेल्फी के लिए नहीं होती। वह एक उनकी अपनी सी यात्रा है जहाँ अगर साथी मिले तो भी ठीक नहीं तो ये अकेले काफी है और जहाँ तक मेरा मानना है कि यात्राएँ। हमेशा अकेले करनी चाहिए। नदी, समंदर और पानी से इन्हें इतना मुहब्बत है कि रस्क होता है मुझे। यह जानते हुए भी कि नदी का पानी प्रदूषित हो गया है उसमें तेल जैसा कोई चिकना पदार्थ मिला है और उसमें स्नान करने से चर्म रोग हो सकता है फिर भी वे अपनी तैराकी के आनंद को भूलने वाले नहीं हैं उनके साथी के मना करने के बाद भी अकेले उसी नदी में उतरना और पीठ के बल उस पर तैरते हुए सूरज को निहारना यह एक पूरी जिन्दगी जी लेना ही तो है। जिससे हम सब वंचित रहते हैं सदा के लिए।

रस्ता – पैरो पर कोई जलप्रपात मिल जाए तो बस तैयार हो गए उससे अठखेलियाँ करने के लिए वह भी ऊंचाई पर चढ़कर सुरक्षित जोन। से बाहर दरअसल यात्राएँ सुरक्षित जोन से बाहर हैं होनी चाहिए तभी असल सुख मिलता है इसका। आलोक प्रकृति के इतने करीब हैं कि चिड़ियों का चहचहाना उनकी आवाज को पहचानना और उसके सुर में जीवन का संगीत खोज लेना इन्हें अच्छी तरह पता है। इस वृत्तांत में प्रकृति ही नहीं इंसान भी है वह भी नसीर जैसा इंसान जो बेगूसराय का है और केरल में इन्हें। बांसूरी बनाता व बेचता मिल गया ये इत्तफाक भाषा की नजदीकियां की वजह से था लेकिन उसको क्या कहेंगे जो सुदूर जंगली व आदिवासी क्षेत्र में।

अपने दोस्त की माँ के रुप में मिली जब। वे उसकी मुस्कुराहट को ही अपनी माँ जैसी ममता मान बैठे यहाँ तो उनकी भाषा भी साथ नहीं थी। मेरे ख्याल से एक यायावर को भाषाओं की इन सीमाओं से उपर उठ कर अपनी यात्राएँ करनी चाहिए और आलोक इसमें पारंगत हैं।वह केरल में बची एक मात्र यहूदी महिला की पीड़ा को भी उतनी ही शिद्दत से महसूस करते हैं जितनी की उनकी माँ की पीड़ा होगी।उस एकाकी महिला से जिसे लोगों में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई उनसे मिल लेने की और उनके बारे में सब कुछ जान लेने की बेताबी बहुत कुछ कहती है।

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