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रिजर्व बैंक का ‘रिजर्व’ ही गया तो बचा क्या?

संपादकीय महेश मेहता

हिसार टुडे

अपनी जमापूंजी का कुछ भाग हम संभाल कर क्यों रखते है क्योंकि हमें पता है कि कभी भी आपातकालीन स्थिती में यह पूंजी हमारे काम आ सकती है। यही कारण है कि इस रिजर्व का हमारे ही नहीं सभी के लिए बहुत महत्व रहता है। न केवल आम आदमी बल्कि कोई व्यापारी हो सभी अपने मुनाफे का एक हिस्सा ‘रिजर्व’ में डालता है, जैसे बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट में अथवा सोना खरीदने में। यह रकम कहने को तो कुछ पैसे है मगर यही संकट के समय पर बहुत उपयोगी बनकर साबित होता है।

वैसे सच कहें तो संकट के समय यह प्रक्रिया पलट जाती है। रिजर्व बैंक पूर्व में बनाए गए रिजर्व से पैसा निकाल कर देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में उसका उपयोग कर सकता है। जैसे बैंकों पर यदि संकट आया तो उन्हें मदद देने के लिए रिजर्व बैंक अपने रिजर्व का इस्तेमाल कर सकता है। पिछले पांच वर्षों में रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्व में धन डालना बंद कर दिया है। वर्ष 2012 में रिजर्व बैंक ने 27,000 करोड़ रुपये रिजर्व में डाले, वर्ष 2013 में 28,000 करोड़ रुपये डाले लेकिन वर्ष 2014 के बाद रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्व में रकम डालना पूर्णतया बंद कर दिया है। इतना ही नहीं, जो रिजर्व थे, उनमें से 52,000 करोड़ की रकम निकालकर भी इस वर्ष सरकार को दे दिया है।

रिजर्व बैंक ने आकलन किया कि उसके पास जरूरत से अधिक रिजर्व उपलब्ध है और उस अनावश्यक रिजर्व को उसने भारत सरकार को दे दिया। भारत सरकार ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी थी, जिसने कहा था कि रिजर्व बैंक को अपनी कुल पूंजी का 24.5 से 20.0 प्रतिशत तक रिजर्व रखना चाहिए। वर्तमान में रिजर्व बैंक के रिजर्व 23.3 प्रतिशत थे। ये जालान समिति द्वारा बताए गए दायरे में थे लेकिन रिजर्व बैंक ने निर्णय किया कि इन्हें 23.3 प्रतिशत से घटाकर 20.0 प्रतिशत के न्यूनतम स्तर पर ले जाया जाए। ऐसा करने पर बची 52,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम को रिजर्व बैंक ने इस वर्ष भारत सरकार को हस्तांतरित किया है। रिजर्व बैंक दवारा अपने रिजर्वों को पर्याप्त मानने के पीछे उसकी सोच में आया एक मौलिक परिवर्तन है।

भारतीय रिजर्व बैंक के रिजर्व दो प्रकार के होते हैं। पहला सोना, अमेरिकी सरकार के बांड, विदेशी करेंसी इत्यादि हैं। दूसरी श्रेणी में भारत सरकार के बांड अथवा अन्य घरेलू निवेश आते है। इनमें पहले प्रकार के रिजर्व को वास्तविक रिजर्व मानने में संकट है क्योंकि इन्हें तात्कालिक आवश्यकता के अनुसार नगदी में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। जैसे भारी मात्रा में सोना बेचने से अंतराष्ट्रीय बाज़ार में सोने के दाम गिर जाएंगे। कुछ वर्ष पूर्व कई देशों ने अपने सोने का भंडार बेचा था और विश्व बाजार में सोने के दाम गिर गए थे। निकट भविष्य में अगर कभी ऐसी नौबत आई तो इन रिजर्व की वास्तविक कीमत आज से बहुत कम हो जाएगी। अमेरिकी सरकार के बांड बेचने से भारत और अमेरिका के सामरिक संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा। इसलिए इन पूंजियों को तरल नहीं माना जा सकता है। पर इन्हें ही रिजर्व मानकर रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्वों की मात्रा कम कर दी है जिससे कि वह सरकार को अधिक से अधिक रकम मुहैया करा सके।

रिजर्व बैंक के इस कदम से कई प्रकार के संकट उत्पन्न हो गए हैं। पहली बात यह कि अब तक प्रॉफिट का एक हिस्सा भविष्य के संकटों को संभालने के लिए रिजर्व में डाला जाता रहा है। अब उस नीति को पलटकर पूर्व में अर्जित रिजर्व का उपयोग वर्तमान खर्चों को पोषित करने के लिए किया जाने लगा है। दूसरे, पिछले पांच वर्षों में सरकार को रिजर्व बैंक से मिले लाभांश का उपयोग सराहनीय नहीं रहा है। सरकार ने अपने कुल घाटे यानी वित्तीय घाटे में सराहनीय कटौती हासिल की है। हमारा कुल घाटा जीडीपी का सात प्रतिशत था जो वर्तमान में लगभग तीन प्रतिशत हो गया है। लेकिन यह कमी मुख्यत: पूंजी खर्चों में कटौती करके हासिल की गई है। पूंजी खर्चों में कटौती से तीन प्रतिशत वित्तीय घाटा कम हुआ है जबकि चालू खर्चों में कटौती से केवल एक प्रतिशत कम हुआ है।

यह बताता है कि सरकार अपने चालू खर्चों पर नियंत्रण करने में नाकाम है और इन्हें पोषित करने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा वितरित लाभांश का उपयोग किया जाएगा।

तीसरे, जालान कमिटी ने 24.5 से 20.0 प्रतिशत तक रिजर्व रखना उचित माना था, लेकिन रिजर्व बैंक ने इसको मध्य स्तर पर रखने के स्थान पर न्यून स्तर पर रखा है, यानी हमारा सुरक्षा कवच न्यून हो गया है। चौथे, रिजर्व का विदेशी हिस्सा त्वरित रूप से नगद में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, इसलिए संकट के समय देश की परिस्थिति और गंभीर हो जाएगी। पांचवें, वर्तमान अर्थव्यवस्था में कई प्रकार के संकट क्षितिज पर दिख रहे हैं। पकिस्तान से हमारे संबंध बिगड़ रहे हैं, ईरान से सस्ता तेल आयात करने में संकट है, बैंकों के खटाई में पड़े लोन बढ़ रहे हैं, अर्थव्यवस्था में मंदी बढ़ रही है, इत्यादि। इन परिस्थितियों से जूझने के लिए हमें रिजर्व की अधिक जरूरत पड़ेगी न कि कम। सरकार ने अपने तात्कालिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक को इस दिशा में प्रेरित किया है और सरकार के दबाव में रिजर्व बैंक ने देश के भविष्य को दांव पर लगाया है।

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