संपादकीय

Today News |राष्ट्रीय पार्टी का तमगा बचाने में जुटी “मायावती” !

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देश की राजनीति में बहन के नाम से मशहूर मायवती इन दिनों बसपा को जीवित रखने की जद्दोजहद में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही। बदलते राजकीय समीकरणों के साथ मायावती ने भी अपनी सियासी रणनीतियों को बदलना शुरू कर दिया है। कभी अपने सिद्धातों पर अडिग रहने वाली बसपा और मायावती अस्तित्व की लड़ाई के लिए आज किसी से भी समझौता करने को तैयार दिख रही है। लिहाजा पिछले एक साल के दौरान बसपा में मायावती के निर्णय के इतने बदलाव देखे हैं की उसे लेकर खुद उन्हीं के पार्टी कार्यकर्ता असमंजस में है की एक जमाने पर सपा की कट्टर विरोधी मायावती ने पिछले चुनाव में भाजपा को तख्तो ताज से दूर रखने की जुगत में अखिलेश से हाथ कैसे मिला लिया।

राजनीतिक गलियारों में आज 2019 लोकसभा चुनाव की हलचल अभी से सभी पार्टियों के बिच देखने को मिल रही है। इन चुनावों में कांग्रेस समेत बसपा का अस्तित्व दांव पर लगा है। अगर 2014 के नतीजे अपना इतिहास फिर दोहराते हैं तो कई पार्टियों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगेगा। यही कारण है की सभी राजनीतिक पार्टियां अपने मतलब के लिए हेरफेर करने की राजनीति में जुटी हुई हैं। भाजपा के रथ को रोकने के लिए सभी विरोधी दल आज एक साथ आ रहे हैं।गौरतलब है की सोनिया गांधी ने रामबिलास पासवान के साथ मिलकर 2004 में चुनाव लड़ा और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को सत्ता से बाहर खदेड़ दिया था। इसके बाद लगातार 10 सालों तक कांग्रेस सत्ता में बनी रही। अब 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस फिर उसी रणनीति को दोहराना चाहती है शायद इसीलिए अब मायावती से कांग्रेस की नजदीकियां लगातार बढ़ रही हैं।

काफी समय पूर्व कांग्रेस और बसपा की नजदीकियों की कहानी बेंगलुरु में एचडी कुमारस्वामी के मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में देखने को मिली थी। सोनिया गांधी जिस तरह से मायावती के साथ गुफ्तगू करती हुई दिखीं वो अपने आप काफी रोचक और खास था। पिछले लोकसभा चुनाव में कोई सीट न जीत पाने वाली मायावती के लिए सोनिया का ऐसे साथ आना उनके लिए एक तरह से संजीवनी बूटी से कम नहीं है। प्रशासनिक अनुभव रखने के साथ मायावती का दलित और महिला होना विपक्षी पार्टी के लिए भी हर तरह से उपयोगी हैं। खासकर पर तब, जब राजनीति में सांप्रदायिकता और जाति की राजनीति इतनी महत्त्वपूर्ण हो गई है।

देश की राजनीति में 2018 से राजकीय समीकरण बदलने लगे हंै। इस समय बसपा के पास लोकसभा में एक भी सीट नहीं है। मायावती को भी अब दूसरों की जरूरत है, और वो शायद इस बात को समझ भी चुकी हैं। इसीलिए उन्होंने यूपी में हुए पिछले लोकसभा उपचुनाव में अपने सबसे बड़े विरोधी पार्टी एसपी से हाथ मिला लिया था। इसके सकारात्मक परिणाम भी उन्हें देखने को मिले और फूलपुर व गोरखपुर दोनों सीटों एसपी-बीएसपी गठबंधन पर जीत हासिल की थी। बता दें कि गोरखपुर बीजेपी का गढ़ है। यहां से हमेशा बीजेपी जीतती रही है और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहीं से लगातार सांसद रहे हैं। मगर मायावती ने एसपी से हाथ मिलाकर ये भी दिखा दिया कि वास्तव में वो कांशीराम की उत्तराधिकारी है और उनके लिए कोई भी पार्टी अछूत नहीं है। वो समय था जब 1993 में मंदिर-मंडल के मुद्दे के बावजूद बसपा ने सपा के साथ मिलकर यूपी में भाजपा को सत्ता बेदखल कर दिया था। उस समय नारा दिया गया था, ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’।

इस बार भी यूपी उपचुनाव में नारा दिया गया था, ‘बहनजी और अखिलेश जुड़े, मोदी-योगी के होश उड़ें।’
कांशीराम के बारे में एक बार कहा गया था कि ‘न वो सेक्युलरिस्ट हैं और न ही लेफ्टिस्ट। वो ऑपर्चुनिस्ट (अवसरवादी) हैं’। रिसर्चर चंद्रभान का कहना है कि जिस तरह से 2 अप्रैल को दलित, भाजपा के खिलाफ लामबंद हुए थे वो दिखाता है कि बसपा के लिए भी सही समय है कि वो उन पार्टियों के साथ मिल जाए जो कि भाजपा को हरा सकती हैं। सीएसडीएस का एक सर्वे बताता है कि दलितों में बीजेपी की लोकप्रियता घटी है। पिछले लोकसभा चुनाव से 2 फीसदी कम होकर अब भाजपा सिर्फ 22 फीसदी दलितों की पसंद रह गई है। खास बात ये है कि कांग्रेस 23 फीसदी दलितों की पसंद है। हालांकि भीम ऐप लांच करके व बाबा साहब आंबेडकर के जन्मदिन को शानदार तरीके से मनाकर भाजपा फिर से दलितों में अपनी खोई हुई लोकप्रियता को पाना चाहती है। इन कोशिशों में भाजपा के नेता यूपी में दलितों के घर भोजन पर भी गए। लेकिन बाहर से मंगाए गए खाने और मच्छर होने जैसे बयानों ने भाजपा को लाभ पहुंचाने के बजाय और भी ज्यादा नुकसान पंहुचा दिया।

यही नहीं भाजपा पार्टी के भीतर भी दलित नेताओं में विरोध का भाव देखने को मिला है। गौरतलब है की यह बात तब सुर्खियों में और आ गयी थी जब कुल 40 में से कम से कम 5 सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर दलितों के खिलाफ हो रहे अत्याचार के बारे में अवगत कराया और अपना असंतोष दर्ज किया था। दलितों के मन में भाजपा के प्रति इस असंतोष के भुनाने के लिए विपक्षी पार्टियों के सामने इस समय मायावती सबसे बेहतरीन चेहरा हैं. जिग्नेश मेवाणी व प्रकाश आंबेडकर जैसे चेहरे भी हैं लेकिन उनकी पहुंच पूरे भारत में नहीं जितना बहन मायावती की है। भाजपा ने पिछले चुनावों में मुकाबला मोदी बनाम राहुल रखने की कोशिश की और इसीलिए चुनावी सभाओ में ‘नामदार बनाम कामदार’ और ‘चायवाला बनाम शहजादा’ जैसे स्लोगन भी बढ़चढ़ कर दिए गए थे। परन्तु मायावती की छवि के सामने ये सब नहीं चलेगा। सीएसडीएस के सर्वे में ये भी पाया गया है कि मोदी व राहुल गांधी के बाद मायावती प्रधानमंत्री के रूप में लोगों के लिए तीसरा सबसे पसंदीदा चेहरा हैं।

इस साल राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों में दलितों की संख्या काफी है। कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले लिटमस टेस्ट भी होगा। जाहिर है अगले लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस इन तीनों राज्यों का विधानसभा चुनाव हार के नहीं जाना चाहेगी। अगर इन तीनों राज्यों में कांग्रेस व बसपा के मिले हुए वोट प्रतिशत पर विचार करें तो पाएंगे कि अगर इन दोनों पार्टियों ने मिलकर पिछले विधानसभा चुनाव लड़े होते तो स्थितियां दूसरी होतीं। ये बात सही है कि इन राज्यों में बसपा को सिर्फ 7 से 8 फीसदी वोट ही मिले जो कि सीट जीतने के लिए बहुत कम हैं। लेकिन किसी दूसरी पार्टी की सीट के साथ अगर ये वोट प्रतिशत जुड़ जाएं तो उस पार्टी के लिए काफी सीट निकालना आसान हो जाएगा। इन सब बातों के बीच मायावती के साथ कुछ कमियां भी हैं।

पहली बात मायावती खुद ही भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसी हैं। चुनाव के मद्देनजर देखें तो पाते हैं कि वो खुद अपने दम पर मुसलमानों का वोट पाने में सफल नहीं रहीं। 2016 के चुनाव में दलित-मुस्लिम गठजोड़ ने उनके लिए उतना वोट नहीं खींचा जितना 2007 में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ ने दिलाया। इसलिए मुसलमानों का वोट पाने के लिए मायावती को कांग्रेस या एसपी से हाथ मिलाना पड़ेगा।

इन बातों से वाकिफ कांग्रेस और बसपा के बीच की कहानी का अध्याय कर्नाटक में कांग्रेस ने एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद के लिए समर्थन देकर दिखा। यहां कांग्रेस और मायावती ने दिखा दिया था कि वो भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए कुछ भी कर सकती है। लेकिन सवाल है कि क्या वो राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा करेगी? क्या राहुल गांधी अपनी मां की तरह किसी दलित महिला के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी को छोड़ना चाहेंगे?

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस, दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बजाय बसपा से गठबंधन करने की तैयारी में है। कांग्रेस के एक नेता के अनुसार दिल्ली में हम किसी के जूनियर पार्टनर बनकर चुनाव नहीं लड़ेंगे। एेसा नहीं हो सकता कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 2 और गठबंधन दल 5 सीटों पर चुनाव लड़े। विधानसभा में कांग्रेस 20 और दूसरा दल 50 सीटों पर लड़े।
एेसे में गठबंधन के बारे में नहीं सोचा जा सकता है। लेकिन अगर कांग्रेस 6 लोकसभा सीटों पर और दूसरा दल 1 एक सीट पर चुनाव के लिए मैदान में उतरे तो बात बन सकती है।

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