संपादकीय

क्या मीडियावालो डरने का समय आ गया है !

जो पत्रकार अपने सोर्स के जरिये या संविधान में स्वत्रता के अधिकार के तहत कुछ लिख पढ़ पात है उसके खिलाफ कार्यवाई होना क्या जायज है?

हिसार टुडे : क्या ज़माना आ गया है जो इन दिनों उत्तरप्रदेश में हो रहा है वह कुछ समय पहले हमने हरियाणा और पश्चिम बंगाल में भी देखा है। हरियाणा में मेयर चुनाव के दौरान आप कार्यकर्ताओ कि गिरफ्तारिओ तो पश्चिम बंगाल में “ममता के मेमे बनाये जाने पर भाजपा कार्यकर्ता की गिरफ्तारी।

अब तक यह मसला शांत हुआ ही था कि अब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ कथित आपत्तिजनक पोस्ट करने के मामले में 3 पत्रकारों की गिरफ्तारी इस बात का साबुत है कि पत्रकारिता का अब बेहद दुखद दौर चल रहा है। अलीगढ में एक बच्ची के साथ हत्या के मामले में 30 घंटे तक पुलिस एएफआईआर दर्ज नहीं कर पायी थी और अब खुद की चाटुकारिता के लोभी लोग आज पतकारो के स्वत्रनत्र पर ही डाका डालने लगे है जो एक घिनोने हरकत को परिभासित करता है।

सवाल यह उठ खडा होता है कि जो पत्रकार अपने सोर्स के जरिये या संविधान में स्वत्रता के अधिकार के तहत कुछ लिख पढ़ पात है उसके खिलाफ कार्यवाई होना क्या जायज है? बड़े अखबारों के पत्रकारों का मलाल रहता है कि हम बोलना तो बहुत कुछ चाहते है मगर हमारे हाथ बंधे है। किसी पार्टी के खिलाफ गया तो वो सीधा केस कर देता है। ऐसे में उन्होंने विवादित स्टोरी पर लिखना ही बंद कर दिया है।

मगर हां जो पत्रकार लिख कर नहीं बोल पाते थे वह ट्वीटर में अपनी राय साँझा कर लेते थे मगर अब वहा भी उनकी खैर नहीं। जो भाजपा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा महिला कार्यकर्ता द्वारा “मेमे” शेयर करने पर ममता बनर्जी द्वारा की गयी पुलिस कार्यवाई को गलत करार दे रही है , तो क्या वही भाजपा एक पत्रकार के खबर प्रसारित करने और किसी महिला के बयान को दिखने और उसे रीट्वीट करने वालो के खिलाफ की गई कार्यवाई को सही मानती है ? अगर ऐसा नहीं है तो योगी जी चुप क्यों बैठे है।

क्या वह उनके खिलाफ बोलने वालो पर ऐसे ही एक्शन लेकर उनकी आवाज को दबाने लगेंगे ? अगर हिम्मत है तो जिस महिला ने इंटरवयू दिया उसे गिरफ्तार करके दिखाते। पता है इस सबमें सबसे ख़ास बात क्या है। एफ़आईआर की प्रति में लिखा है कि शिकायतकर्ता का आरोप है कि प्रशांत कनौजिया ने योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ ‘आपत्तिजनक टिप्पणी’ करके उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश की है।

एफ़आईआर के मुताबिक, पुलिस को शुक्रवार दोपहर 12.07 बजे घटना की सूचना मिली। एफ़आईआर में शिकायतकर्ता का नाम विकास कुमार दर्ज है। जब जानकारी निकाली गयी तो पता चला कि विकास हज़रतगंज थाने में ही पुलिस इंस्पेक्टर हैं। महाशय कहते है कि “उन्होंने हमारे मुख्यमंत्री पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, इसलिए मैंने शिकायत की। वाह जनाब क्या आप अपने फर्ज निभाने में भी उतने ही तत्पर है , या प्रमोशन या सिफारिश के लिए यह चाटुकारिता का काम किया है? भगवान् जाने।

वैसे यह बात सराहनीय रही कि एडिटर्स गिल्ड समेत कई पत्रकार संगठनों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से संबंधित कथित आपत्तिजनक वीडियो के मामले में पत्रकार प्रशांत कनौजिया, इशिका सिंह और अनुज शुक्ला की गिरफ्तारी की निंदा की है। आपको बात दू कि स्वतंत्र पत्रकार कनौजिया को उनके ट्वीट के लिए गिरफ्तार किया गया था जबकि सिंह और शुक्ला को उनके चैनल नेशन लाइव पर एक कार्यक्रम के लिए गिरफ्तार किया गया।

उन तीनों को कथित तौर पर उनके द्वारा साझा किए गए और प्रसारित वीडियो के संबंध में गिरफ्तार किया गया है। उस वीडियो में एक महिला ने आदित्यनाथ की प्रेमिका होने का दावा करते हुए कहा कि वह उसके साथ अपना जीवन बिताना चाहती है। अब बताओ यह तो महिला बोल रही है. अगर यह खबर प्रसारित कर दिया तो क्या बड़ा गुनाह हो गया। गुनाह तब होता है जब हम मनगढंत बात बोलते है। इसलिए चाटुकारिता छोड़े और भाई पुलिस वाले अपना फर्ज निभाओ। यही तत्परता मुजरिमो को पकड़ने में दिखाई होती तो आज बात कुछ और होती।

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