संपादकीय

Thank You हुड्डा साहब!

संपादकीय

ऐसा क्यों हो रहा है हमारे “हुड्डा जी” के साथ कि उनके समर्थक कहते-कहते थक गए कि अशोक तंवर को हटाओ-अशोक तंवर को हटाओ। मगर अशोक तंवर हटने की जगह “खिलखिलाते मुस्कान” के साथ अपनी अध्यक्ष पद की कुर्सी पर बरकरार है। क्या जादू फीका हो गया है हुड्डा जी का? एक दशक वह हरियाणा के मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे, सोनिया गाँधी से उनके गहरे पारिवारिक रिश्ते रहे हैंं, मगर ऐसा क्या हो रहा है हुड्डा के साथ कि उनके मन की एक इच्छा पार्टी पूरी नहीं कर रही है। क्या वाकई अशोक तंवर इतने बड़े हौवा हो गए हैं जिससे हुड्डा गुट परेशान है, लेकिन आज लगता तो कुछ ऐसा ही है।

वैसे इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि अशोक तंवर को राष्ट्रीय राजनीति में “लाइमलाइट” करने और उन्हें हरियाणा में लगातार सुर्खियों में रखकर उन्हें सबसे बड़े कांग्रेस नेता के दर्जे में लाने में कहीं न कहीं भूपेंद्र हुड्डा का बहुमूल्य योगदान रहा है। क्योंकि अशोक तंवर को अध्यक्ष पद से हटाने की मांग को लेकर उन्होंने बार-बार पार्टी हाईकमान से गुहार लगाई, उनके और हुड्डा समर्थक गुट के अलावा किसी को भी अशोक तंवर से प्रॉब्लम नहीं।

हमेशा हाई कमान के सामने सिर्फ हुड्डा समर्थक ही रहे। पार्टी हाई कमान को भी लगने लगा कि यह तो बहुत बड़ी नाइंसाफी। क्योंकि प्रॉब्लम सिर्फ हुड्डा समर्थकों को और किसी को नहीं। वैसे माना जाता है कि एक बार सांसद का चुनाव जीते अशोक तंवर राहुल गाँधी के चहिते माने जाते हैं। यही कारण है कि अब तक अशोक तंवर अध्यक्ष पद पर बरकरार है, वहीं दूसरी बात यह भी है कि हुड्डा को प्रदेशाध्यक्ष बनाने के लिए कांग्रेस हाई कमान बिलकुल तैयार नहीं। क्योंकि एक तो विभिन्न घोटालों में भूपेंद्र हुड्डा का नाम रहा है, दूसरा हुड्डा के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान भूखंड घोटालों में हुड्डा का पर आरोप लगे, सीबीआई जांच में अक्सर उन्हें दो-चार होना पड़ता है, इतना ही नहीं इस मसले में रोबर्ट वाड्रा भी फंसे उसके लिए कहीं न कहीं गांधी परिवार भूपेंद्र हुड्डा से नाराज है। क्योंकि उनको लगता है कि हुड्डा ने अपने कार्यकाल के दौरान सिर्फ जमीन और संपतियों पर ही ध्यान केंद्रित किया जबकि वह चाहते तो किसानों के लिए अहम कार्य कर सकते थे, गरीबों और बेरोजगार युवाओं के लिए अहम कार्य कर सकते थे। मगर उन्होंने यह नहीं किया। जबकि हुड्डा के कारण कांग्रेस इतनी बदनाम हुयी जिसके दाग धोने में अभी काफी समय लगेंगे। इसलिए पार्टी हाई कमान ऐसे नेता को प्रदेश में पार्टी की कमान संभालने की जिम्मेदारी जल्दी देने को राजी नहीं है।

वहीं ठीक दूसरी तरफ अशोक तंवर ने इतने विरोध के बावजूद खुद को साबित कर दिखाया और उनके ऊपर लगाए आरोपों का प्रखर रूप से जवाब दिया उससे कहीं न कहीं अशोक तंवर और मजबूत होते आये। आज वह भले ही अपनी सीट हार गए हों, मगर उन्होंने पार्टी को जोड़ने की कोशिश की, मगर यह बात अलग है कि उनकी कोशिश परवान नहीं चढी।
मगर उनको हुड्डा के विरोध ने फायदा जरूर पहुंचाया और हुड्डा पार्टी हाई कमान के सामने बुरे बने। वैसे भी राहुल ने अध्यक्षपद से इस्तीफा दे दिया हो, मगर बावजूद सभी अभी भी राहुल पर भरोसा जता रहे हैं, मगर राहुल ने हरियाणा के मामले में अपने हाथ खड़े कर जहां अशोक तंवर को और ताकत देने का काम किया है, वहीं हुड्डा को भी अब पछतावा होने लगा है कि अशोक तंवर को हटाने के मामले में वह ही पार्टी के सामने बुरे बने हैं, जबकि तंवर मुस्कुराते हुए मन ही मन जरूर कहते होंगे कि मुझे इतना बड़ा नेता बनाने की लिए “थैंक्यू हुड्डा साहब”

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