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लौट आये ताऊ!

संपादकीय : महेश मेहता

हिसार टुडे

दाल-रोटी, लस्सी यह पहचान है हमारे हरियाणा के खाने की और उस खाने के लाजवाब स्वाद की। क्या कभी देखा है कि नेता लोग जनता के बीच जमीन में बैठकर खाना खाते है। वैसे हरियाणा में इनेलो पार्टी में यह दिखाई देता था जब अभय चौटाला को खुद एसवाईएल के आंदोलन के दौरान गांव गांव जाकर लोगो को निमंत्रण देते देखा था। अपने अलग अंदाज में खटिया पर बैठकर सादा भोजन दाल रोटी या सब्जी चटनी साथ में प्याज का भोजन करते देख हरियाणा में एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है। इन दिनों ऐसा ही दुष्यंत चौटाला को देखकर दिखाई देता है। मैंने सुना है कि जब ताऊ अर्थात ताऊ देवीलाल जीवित थे, तब वह हरियाणा के ऐसे नेता थे जो खुद को नेता नहीं बल्कि खुद को एक किसान मानते थे. गरीब लोगों के बीच बैठना, खाना पीना उनकी रोजाना की दिनचर्या का एक भाग था। मन किया गांव के लोगों को इकठ्ठा करके उनके हित की बात करना, उनका हाल चल जानना ताऊ को बहुत भाता था। ठीक आज कल ताऊ की तरह दुष्यंत चौटाला भी गांव गांव जाकर जनचौपाल करते दिखाई देते है और वह जिस प्रकार से गांव गांव घूम रहे है उसे देखते है तो ऐसा लगता है कि वाकई “ताऊ” वापस आ गए हैं क्या?

शायद मेरी इस बात से कुछ लोगों को आपत्ति हो, मगर दुष्यंत आज जिस प्रकार लोगो के बीच जनचौपाल के माध्यम से जा रहे है। गांव में ठहरना खाना उनके नियमित दिनचर्या का भाग हो गया है। आज एक परिचित ने दुष्यंत की एक तस्वीर भेजी। बड़े मजे से जननायक जनता पार्टी के नेता के तौर पर प्रसिद्ध दुष्यंत पाल्थी मारकर जमीन पर चटाई बिछाकर बैठे हैं और सामने है खाने की थाली। सब्जी, रोटी, सलाद और हां लस्सी। कभी- कभी तो एक छोटी सी चारपाई पर उनको सुस्ताते भी देखा है। लम्बाई ज्यादा होने से चारपाई से बाहर निकलते पैर मगर किसी बात की िफक्र नहीं, क्योंकि जब सुकून मिलता है तो परवा किस बात की।

वैसे दुष्यंत जैसे नेता कम ही दिखते है। गांव-गांव घूमने की योजना है और लोगों को जननायक जनता पार्टी के बारे में बताना है। ऐसे में कई किलोमीटर का सफर हर दिन करके दुष्यंत कभी-कभी तो अपनी पसंदीदा बाइक के सवारी करके निकल पड़ते हैं। दुष्यंत का यह तरीका इन दिनों हरियाणा में चर्चा का विषय बना हुआ है। राष्ट्रीय मीडिया तक शायद वह न पहुंचे मगर अपने देसी अंदाज में वह बिना प्रचार हरियाणा में जरूर छा गए है।

अक्सर मैंने चर्चाओं के दौरान यह कहते सुना है कि दुष्यंत जब छोटे थे तो पिता से ज्यादा ताऊ की उंगली पकड़ कर चलना, उनके सभी राजनीतिक बैठकों को दूर रहकर देखना और सुनना। बचपन से ताऊ के साथ रहकर सौम्य स्वाभाव के साथ आचरण भी उनके अंदर ऐसा घर कर गया है कि वह आज जनचौपाल के माध्यम से दिखाई दे रहा है। लोग कहते हैं कि जजपा कमजोर है, मगर हां इस बात से ज्यादा तारीफ आज भी दुष्यंत की होती है और यह सब केवल अपनी ईमानदार छवि के कारण। आजकल सत्ताधारी यह खाकर खुश होता है कि हमने कुछ महीनो पहले बने जजपा के नेताओं को अपने पार्टी में शामिल करवाया। मगर हंसी तब आती है जब वो यह बात उस पार्टी के कार्यकर्ता के लिए कहते हैं जिसे बने एक साल भी नहीं हुए। इसका अर्थ है कि दुष्यंत की टीम तोडना भाजपा के लिए कीर्तिमान है मगर दुष्यंत के लिए फक्र की बात कि उसने उन लोगों को मौका देकर इतना आगेे लाया कि सबसे मजबूत सत्ताधारी उनको ले रहे है।

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