संपादकीय

राजकुमार सैनी भाजपा की कर रहे थे मदद !

संपादकीय

हिसार टुडे।

ऐसा लगता है कि बसपा अपना गेम खेल गयी है। एक तरफ बुआ यानि मायावती ने अपने बबुआ अर्थात अखिलेश जी का ऐसा साथ छोड़ा कि ऐसा लगा मानो मायावती “गेस्ट हाउस कांड” का बदला ले गई। मायावती 0 में से 10 पर पहुंच गयी और अखिलेश की बची कुछ सीट भी हाथ से निकल गई।

इन चुनावी परिणामों के बाद मायावती ने यह कहकर समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़ दिया कि वह अपने मतदाताओं का वोट मतों में नहीं तब्दील कर पाए, जबकि हकीकत तो यह है कि इस चुनाव में जिस प्रकार मायावती ने आपराधिक छवि वाले दबंग और मुस्लिम समुदाय के अधिकत्तर उम्मदवारों को चुनाव में उतारा यही कारण है कि यादवों ने बसपा को वोट न देकर भाजपा के साफ छवि वाले प्रत्याशी को वोट देना ज्यादा उचित समझा। यह तो रही उत्तरप्रदेश की बात अब हम आपको बताते हैं हरियाणा में बसपा का हाल।

बता दें कि हरियाणा में बसपा ने उस लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी को जोरदार झटका दिया है। जिसकी उम्मीद शायद राजकुमार सैनी को भी नहीं थी। मगर हां अन्य पार्टियों को जरूर थी। बता दें कि लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी से बहुजन समाज पार्टी ने यह कहकर गठबंधन को विराम लगा दिया कि “राजकुमार सैनी भाजपा की मदद कर रहे थे।”

बता दें कि राजकुमार सैनी जिनके बारे में कहा जाता था कि उन्होंने भाजपा से गद्दारी की, बगावत की। मगर इस पुरे चुनाव में राजकुमार सैनी भाजपा के टारगेट में कभी थे ही नहीं। न ही चुनाव के पहले भाजपा ने उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्यवाई की और न ही उन्हें आड़े हाथों लिया। जो वह अक्सर कांग्रेस और इनेलो के नेताओं को लेती थी। ऐसे में बसपा के प्रदेश प्रभारी डॉ मेघराज ने जिस प्रकार राजकुमार सैनी पर भाजपा के लिए चुनाव में मदद करने का आरोप लगाया उससे यह तो तय है कि कहीं न कहीं दाल में काला है।

बल्लभगढ़ में चल रही समीक्षा बैठक में प्रदेश प्रभारी डॉ मेघराज ने यह भी ऐलान कर सबको चौंका दिया कि बसपा इस बार हरियाणा विधानसभा चुनाव में अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। आज बसपा जिस प्रकार से लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी को आड़े हाथों ले रही है ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं कुछ तो खिचड़ी जरूर पक्क रही है। एक तरफ भाजपा नेताओं का राजकुमार के प्रति उग्र न होना, दूसरी तरफ लोकसभा के ठीक पहले इनेलो से बसपा का गठबंधन तोड़ना और उन्हें कमजोर बनाना। इस बात की तरफ संकेत दे रहा है कि हरियाणा में बसपा किसके इशारे में यह रणनीति बना रही है।

वैसे राजनीति के जानकार मानते हैं कि बसपा सुप्रीमो मायावती ऐसी है जिनका जल्दी भरोसा करना मुश्किल है, वो कब कौन सा कदम उठा ले यह कोई नहीं जान सकता। इनेलो ने तो भाई-बहन का प्रेम बिखरते देख लिया। अब मायावती ने अपने नए भाई राजकुमार सैनी से भी रिश्ता तोड़ दिया। वैसे बसपा ने इस बात का खुलासा किया है कि राजकुमार सैनी का खुद का कोई वोट बैंक नहीं है। वैसे अधिकतर सीटों पर तो खुद मायवती की पार्टी चुनाव लड़ रही थी और राजकुमार सैनी सिर्फ स्टंटबाजी करते दिखाई दिए थे।

याद है उन्होंने कहा था हुड्डा जहां से चुनाव लड़ेंगे वहीं से भरूंगा नामांकन और जब सोनीपत का नाम आया तो राजुकमार सैनी अपना नमांकन परचा भरवाने भी गए थे, मगर दस्तावेज नहीं था इसलिए वापस लौट आये। सैनी यहां भाजपा के खिलाफ नहीं बल्कि हुड्डा के खिलाफ चुनाव लड़ना चाहते थे। यानी अर्थ साफ है कि वो किसे हराने या वोट काटने के लिए मैदान में उतरने वाले थे।

याद है जींद उपचुनाव में लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी का उम्मीदवार आशरी किस पार्टी में शामिल हुआ? भाजपा। मगर राजकुमार ने भाजपा के खिलाफ कुछ खास आक्रामकता नहीं दिखाई। इससे पता चलता है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है और कौन किसकी मदद कर रहा है। वैसे मायावती का गठबंधन तोड़ने से जजपा को एक उम्मीद की किरण जरूर नजर आ रही है। चूंकि अब हरियाणा में इनेलो और एलएसपी से मायावती का मोह भांग हो गया तो क्या ऐसा तो नहीं जननायक जनता पार्टी के साथ वो विधानसभा चुनाव में जजपा-आप -बसपा गठबंधन के साथ चुनाव लड़े।

क्योंकि माना जाता है कि मायावती के ख्वाब बहुत बड़े हैं। उन्होंने उत्तरप्रदेश में समाजवादी को अर्श से फर्श में ला दिया, इनेलो का मुश्किल घड़ी में साथ छोड़ दिया, लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी को भी आजमा लिया ऐसे में हो सकता है कि आखिरी मोहरा जजपा को तो नहीं बनाएगी। क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो शायद विधानसभा के समीकरण कुछ अलग होंगे।

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