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अब आया न ऊंट पहाड़ के नीचे

बसपा ने इनेलो से गठबंधन क्या तोड़ा कि भाजपा के मंत्री तैयार हो गए अपनी-अपनी बयान बाजी देने।

हिसार टुडे।

बसपा ने इनेलो से गठबंधन क्या
तोड़ा कि भाजपा के मंत्री तैयार हो गए
अपनी-अपनी बयान बाजी देने। याद है
कितनों ने खिल्ली उड़ाई थी। भाजपा के
कितने नेता इनेलो पर प्रहार करने को
तैयार हो गए थे।

जींद उपचुनाव, मेयर
चुनाव और लोकसभा चुनाव में जीत
के बाद भाजपा को ऐसा गुमान हो गया
था कि इनेलो में दो-फाड़ होने पर भी
उन्होंने या उनके कार्यकर्ताओं ने मजाक
बनाने और विपक्ष पर प्रहार करने में
कोई को-कसार नहीं छोड़ी थी। मगर
लगता है कि जल्द ही भाजपा का यह
गुमान ठंडा करने का काम शिरोमणि
अकाली दल करने जा रहा है।

एक जमाने में इनेलो के साथ
गठबंधन कर हरियाणा में चुनाव
लड़ने वाली शिरोमणि अकाली दल
और इनेलो का रिश्ता शुरू से ही
बहुत गहरा रहा है।

मगर जिस दिन से
एसवाईएल का मुद्दा
उठा उसके बाद से
गठबंधन तो नहीं रहा, मगर बादल से
चौटाला के रिश्ते जरूर कायम रहे।

आज भी चौटाला परिवार पर आने वाले
हर संकट में वह प्रकाश सिंह बदल
से घर का बुजुर्ग होने के नाते सलाह
मश्वरा करते है। जब इनेलो में दो-फाड़
हुयी थी उस दौरान भी चौटाला परिवार
के मुखिया ने ओमप्रकाश चौटाला की
गैरहाजिरी में बादल से सलाह मशवरा
किया था। यानी एक घरेलु रिश्ता।

मगर काफी समय से राजनीति
में पूरी तरह से सक्रीय शिरोमणि
अकाली दल की सक्रियता से भाजपा
को चिंता खाये जा रही थी। क्यूंकि
यही शिरोमणि अकाली दल पंजाब में
शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के
बीच गठबंधन है। इस गठबंधन धर्म को
वह कई दशकों से पालन करते आ रहे
हैं।

मगर भाजपा पंजाब में कांग्रेस का
गढ़ तोड़ने के लिए शिरोमणि अकाली
दल से विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीट
लेने के लिए दबाव बना रही है और
भाजपा का यह दबाव आगे चलकर
और हावी हो सकता है। इसलिए अब
शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा को
हरियाणा में टेंशन देने का काम करते
हुए यहां अपनी सक्रियता तेज कर दी
है।

पंजाब में भाजपा के दबाव को कम
करने के लिए हरियाणा में शिरोमणि
अकाली दल ने दबाव बनाना शुरू
कर दिया है। जैसा की आपको पता है
कि नॉन जाट और पंजाबी वोटों ने हर
चुनाव में भाजपा के लिए अहम और
महत्वपूर्ण भूमिका अख्तियार की थी।

ऐसे में अगर शिरोमणि अकाली दल भी
अगर हरियाणा में एक्टिव होती है तो
वोटों का ध्रुवीकरण होगा और इसका
खामियाजा भाजपा के चुनावी गणित
बिगाड़ने अथवा मिशन 75 को पूरा
करने में हो सकता है।

यही कारण है कि आज हरियाणा
में शिरोमणि अकाली दल की भूमिका
पर बारीकी से नजर है। इतना ही
नहीं जो भाजपा के नेता पहले इनेलो
को समाप्त बताते थे, अब उन्हीं भाजपा
नेताओं को इस बात का डर सता रहा
है कि कहीं दुबारा शिरोमणि अकाली
दल और ओमप्रकाश चौटाला की
पार्टी अर्थात इनेलो में गठबंधन न हो
जाये।

वरना न केवल चुनाव में, बल्कि
पंजाब में भाजपा और
शिरोमणि अकाली
दल के गठबंधन पर
इस का असर पड़ेगा।

यही कारण है कि अब भाजपा की यह
स्थिति देख इनेलो और दूसरी पार्टी
के कार्यकर्ता मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं।
इनेलो के विधायक भी सोचते होंगे कि
बहुत बड़े-बड़े दावे करने वाली भाजपा
की हालत ऐसी है कि “अब आया ऊंट
पहाड़ के नीचे।”

इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला
का “गेम प्लान” की झलक अब
आपको धीरे-धीरे दिखनी शुरू हो
गयी न। वैसे हरियाणा में 15 से 20
लाख सिख वोटर्स सिरसा, अम्बाला,
कुरुक्षेत्र और करनाल के तकरीबन
24 विधानसभा सीटों पर अपना अच्छा
खासा दबदबा बना सकते है। बता दें
कि इन सीटों पर अकाली दल की
पकड़ मजबूत मानी जा रही है। यही
कारण है कि अकाली दल भाजपा से
30 विधानसभा सीट मांग रहा है वहीं
भाजपा ने उन्हें सिर्फ 5 ऑफर किया है।

ऐसे में सवाल यह उठ खड़ा होता है कि
अगर यही हाल रहा था तो इनेलो की
तो शायद बल्ले-बल्ले हो जाये। क्योंकि
सूत्र बताते हैं कि इतनी कम सीटों पर
शिरोमणि अकाली दल राजी न हो और
वह भाजपा को सबक सिखाने के लिए
अपने पुराने हम दर्द और दोस्त इनेलो
से गठबंधन के साथ मैदान में उतरे।

इसलिए इनेलो के नेता और कार्यकर्ता
भी बस देख रहे हैं कि कैसे फसे
भाजपा उनके जाल में।

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