संपादकीय

मोदी का “आफ्टरइफेक्ट” कहीं बगावत-कहीं गठबंधन में फूट

संपादकीय

हिसार टुडे। अभी राहुल गाँधी अपने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की बात कर उस फैसले पर अड़े हुए है तो अचानक लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कई राज्यों में कांग्रेस के अंदर बगावत के सुर फूट रहे हैं। अभी तक कई विधायकों और नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा दिया है। हालात यह हैं कि मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों के बीच भी पटरी नहीं खा रही है। राजस्थान में जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने बेटे वैभव गहलोत के सिर पर हार का ठीकरा फोड़ा है। तो मध्य प्रदेश में गुना सीट से हार का स्वाद चख चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कहा कि मुख्यमंत्री ठीक से प्रदर्शन नहीं कर पाए। उनका निशाना जाहिर तौर पर मुख्यमंत्री कमलनाथ की ओर था जो अपने बेटे नकुलनाथ को छिंदवाड़ा से जिताने में लगे रहे। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में भी सालों से मुख्यमंत्री पद का सपना देख रहे कई वरिष्ठ नेता पार्टी के प्रदर्शन पर चुप्पी साधे हुए हैं।

बात करें महाराष्ट्र की तो यहां पर पार्टी के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल ने प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व से नाराज होकर विधायक के पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने कहा कि अपने बेटे तक के लिए भी प्रचार नहीं किया है। उन्हें पार्टी आलाकमान से कोई शिकायत नहीं है, जिसने मुझे विपक्ष का नेता बनने का मौका दिया है। पाटिल ने कहा, ‘मैंने अच्छा काम करने की कोशिश की है। लेकिन हालात ने मुझे इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया है’ . इसके बाद वीखे पाटिल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भी मुलाकात करने पहुंच गए। अब आप ही बताओ पार्टी आज से कमजोर नेतृत्व का शिकार है या बहुत पहले से। विखे पाटिल का यह निर्णय लेना इस बात का भी संकेत दे रहा है कि उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव दिख रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में उन्होंने यह तस्वीर नजर आने लगी है कि कोंग्रेस की बहुत दुर्दशा होने वाली है शायद सीट निकलना भी उनके बस की बात नहीं। शायद यही कारण है कि राजनीतिक चालाकी दिखाते हुए उन्होंने भाजपा से नजदीकियां बढ़ान पहले ही शुरू कर दिया था। देवेंद्र फडणवीस से मुलाक़ात उसी रणनीति का हिस्सा है।

वहीं, बीएसपी सुप्रीमो मायावती के विधानसभा उप चुनाव में अकेले लड़ने के ऐलान पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि गठबंधन टूटा है या जो गठबंधन पर कहा गया है उस पर सोच समझ कर विचार करेंगे। भाई अब कितना सोचोगे यादवजी। गयी बैस पानी में अब काहे के सोचत हउवा। खोपड़िया गरम हो जाई तोहार। वैसे अखिलेश बाबू तो यह कहते है कि समाजवादी पार्टी भी उपचुनाव के लिए अकेले दम पर लड़ने को तैयार है। वैसे इसका मतलब यह नहीं कि गठबंधन टूट गया। गौरतलब है कि बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष बहन मायावती ने उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुछ सीटों के लिये संभावित उपचुनाव अपने बलबूते लड़ने की पुष्टि करते हुये स्पष्ट किया है कि इससे सपा के साथ गठबंधन के भविष्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा, गठबंधन बरकरार रहेगा. मायावती ने मंगलवार को अपने बयान में कहा कि उनकी पार्टी अपने बलबूते उपचुनाव लड़ेगी, लेकिन सपा से गठबंधन बरकरार रहेगा। उन्होंने कहा कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव से उनके रिश्ते कभी खत्म नहीं होने वाले हैं। ‘‘सपा के साथ यादव वोट भी नहीं टिका रहा। अगर सपा प्रमुख अपने राजनीतिक कार्यों के साथ अपने लोगों को मिशनरी बनाने में सफल रहे तो साथ चलने की सोचेंगे। फिलहाल हमने उपचुनावों में अकेले लड़ने का फैसला किया है।’

‘बहन जी आप अखिलेश को क्यों दोष दे रही है। वैसे अखिलेश बाहरी बात करते रहे मगर उन्हें यादव मतदाताओं की जरा भी परवाह नहीं की। इस बार अखिलेश का जो हाल था उसको देखकर लग रहा था मानो वह बसपा के इशारे पर नाच रहे थे , शायद वह अपने पिता का वो आखिरी भाषण सदन का याद कर लेते जिसमें उन्होंने कहा था उम्मीद करता हु की दुबारा मोदी ही प्रधानमंत्री बनकर आएंगे,और उस वक्तव् पर सभा में कैसे मोदी गदगद हो गए थे। पिता ने तो पहले ही संकेत दे दिए थे कि अखिलेश का फैसला उनको भारी पढ़ने वाला। पिता की जुबान सच निकली और 0 से मायावती का खाता सीधे 10 तक पहुंच गया और समाजवादी पार्टी को या मिली सिर्फ 5 सीट में शर्मनाक जीत। बता दें कि यादवजी ने मायावती को गठबंधन में सीटे तो दे दी , मगर हकीकत यह है कि मायावती ने काफी सीटों पर आपराधिक छवि वाले दबंगो और मुसिम समुदाय को मैदान में उतारा था। यह बात यादव और ठाकुर मतदाताओं को बहुत बुरी लगी। खुद ही जब वहां के लोगो से मैंने बात कि तो उन्होंने कहा कि यादव लोग इस बात से नाराज है कि जब मुस्लिम नेता ही बन गए और दबंग नेता ही बन गए तो उनको कौन पूछेगा तो उन्हें कौन पूछेगा। यही कारण है कि उन्होंने जहां जहां बसपा ने अपने उम्मीदवार खड़े किये थे वहा वहां यादवो ने अपना वोट भाजपा को देना उचित समझा। जिसका खामियाजा अखिलेश की छवि और वोटो पर भी पड़ा जिसका नतीजा इस लोकसभा चुनाव के नतीजों में साफ़ दिखाई दिया।

बात करते है कि और कहा उथल पुथल हुई। पता है जब से लालू जी को पता चला है कि नितीश का हाल भाजपा ने क्या करके छोड़ा है उसके बाद से तो नितीश का दुःख खुद लालू जी ही महसूस कर रहे है, यह दुःख महसूस करते हुए लालू जी तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कैबिनेट पद को लेकर भाजपा के साथ चल रही अनबन के बीच उन्हें न्योता दिया है। हालही लोकसभा चुनाव में बिहार में खाता खोलने में नाकाम रही लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद ने नीतीश कुमार को महागठबंधन में वापस आने का न्योता दिया है। महागठबंधन अर्थात अर्थात फिर वही बबुआ लोगो की पार्टी। वहीं, जब सब जगह बगावत – गठबंधन तोड़ने की चर्चा चल रही है।

बता दें कि नीतीश कुमार साल 2017 में महागठबंधन से अलग हो गए थे। यह औपचारिक न्योता राजद उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने सोमवार को पटना में दिया। लालू यादव के करीबी समझे जाने वाले सिंह ने मीडिया से कहा कि अब फिर से एकजुट होने का समय आ गया है, क्योंकि भाजपा आने वाले दिनों में नीतीश कुमार का केवल “अपमान” करेगी। बाद में पार्टी ने कहा कि यह अपील केवल नीतीश कुमार के लिए नहीं थी, बल्कि सभी गैर भाजपाई पार्टियों को साथ आना चाहिए। वैसे इन उठा -पठक के बिच भाजपा में यही चर्चा चल रही है कि लोकसभा अध्यक्ष पद किसे दिया जाए। लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उम्मीदवारों के नाम पर मंथन कर रहा है तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी, राधामोहन सिंह एवं वीरेन्द्र कुमार सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को इस पद की दौड़ में शामिल माना जा रहा है। सूत्रों ने सोमवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संभावित उम्मीदवारों में पूर्व केन्द्रीय मंत्री जुएल ओराम और एस एस अहलुवालिया के नाम भी शामिल हैं। आठ बार सांसद बन चुकी मेनका गांधी भाजपा की सबसे अनुभवी लोकसभा सदस्य हैं और वह अध्यक्ष पद के लिए एक स्वाभाविक विकल्प हैं। सत्रहवीं लोकसभा में सबसे अनुभवी सांसद होने के कारण उन्हें कार्यवाहक अध्यक्ष चुना जा सकता है। राधामोहन सिंह भी छह बार सांसद का चुनाव जीत चुके हैं और उन्हें भी अध्यक्ष पद के लिए एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है। सिंह की संगठन पर गहरी पकड़ है तथा उनकी छवि विनम्र एवं सबको साथ लेकर चलने वाले नेता की है। सूत्रों के अनुसार वीरेन्द्र कुमार भी छह बार से सांसद हैं और उनकी दलित छवि उनके पक्ष में काम कर सकती है। इसलिए उनके नामा पर भी पार्टी चर्चा कर रही है। उधर, बिहार के बेगूसराय से सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को मोदी कैबिनेट में पशुपालन, डेयरी और मतस्य मंत्रालय का जिम्मा मिला है।

Tags
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close