टुडे न्यूज़संपादकीय

मीडिया इतिहास का आया “काला दिन”

हिसार टुडे 

आप सब जानते हैं… “टीवी पत्रकारिता के लिए ये एक बेहद मुश्किल वक्त है… मुझे बस इतना ही कहना है कि आप सिर्फ निष्पक्ष भी रहेंगे तो पत्रकारिता की बहुत बड़ी सेवा हो जाएगी…” यह वक्तत्व उस टीवी चैनल में काम करने वाले विनोद कापड़ी के हैं जिन्होंने टीवी 9 भारतवर्ष से अलविदा कर दिया। मगर जाते-जाते उन्होंने जो बात कही वो इस ओर इशारा करती है कि क्या आज वाकई पत्रकारों में निष्पक्षता की कमी आ गयी है।

क्या आजकी पत्रकारिता का बुरा दौर चल रहा है? हाल में कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने (अप्रैल 28, 2019) मीडिया को क्यों कहा कि मैं मीडिया का बहिष्कार करता हूं, कांग्रेस ने क्यों कहा कि 1 महीने तक हम टीवी डिबेट में नहीं जाएंगे, क्यों समाजवादी पार्टी ने अपने सारे मीडिया प्रवक्ताओं को पद से हटा दिया। क्यों आरजेडी ने मीडिया का बहिष्कार कर दिया? आखिर क्यों आम आदमी पार्टी, जेडीयू, बसपा ने मीडिया का बहिष्कार करने का निर्णय लिया?

मुझे लगता है जब देश के 6 बड़े राजनीतिक दल टीवी चैनलों का बहिष्कार करे तो इसका मतलब साफ है कि यह मीडिया के इतिहास का सबसे काला दिन चल रहा है। टीवी चैनलों ने अपनी विश्वसनीयता को खो दिया है। वरना जिस मीडिया के बहिष्कार से राजनीतिक पार्टियां और नेता डरा करते थे, आज उन मीडिया पर राजनीतिक दल अपनी भड़ास निसंकोच बहिष्कार कर निकाल रहे हैं। ये वही मीडिया है जिसने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी , अमिताभ बच्चन को नहीं छोड़ा। मगर आज वही मीडिया संदेह के घेरे में आ रही है।

2014 के बाद से इसकी विश्वसनीयता इतने बड़े पैमाने पर गिरी है जो बेहद चिंता का विषय है। पता है कुमारस्वामी की मीडिया से नाराजगी इसी बात को लेकर थी कि उनके बेटे को मीडिया का उतना अटेंशन नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। इतना ही नहीं राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेज प्रताप सिंह, मायावती समेत ममता बनर्जी ने भी 2019 के चुनाव में खुलेआम यह आरोप लगाया कि वह गोदी मीडिया है जो एक विशेष पार्टी के ही प्रचार में लगी है। उनका जनता से और विपक्ष से कोई सारोकार नहीं। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि 2014 के बाद से यही मेन स्ट्रीम मीडिया विपक्ष को दरकिनार करते हुए उन्हें टीवी में कम स्पेस दे रही है।

उनसे तीखे सवाल और एक विशेष पार्टी से ऐसे मीठे सवाल पूछे जाते हैं जो पूछने के लायक ही नहीं है। कोई आम कैसे खाता है, कोई व्रत में कैसे रहता है जैसे सवाल पत्रकारिता के नाम पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। विपक्ष का मानना है कि पत्रकारों का काम सच्ची खबर प्रकाशित करना और सभी पार्टी को सामान मौका देना है, मगर आज कल की मीडिया सिर्फ और सिर्फ चाटुकारिता में व्यस्त है। और यही चाटुकारिता मीडिया जगत में सबसे शर्मनाक और काला दिन से कम नहीं।

न केवल उन्होंने पत्रकारिता पर सवाल खड़े किये हैं, बल्कि नेताओं को भी मीडिया पर बरसने का मौका दिया है। आज विपक्ष का मानना है कि 2019 के नतीजे इसलिए भी आये हैं क्यूंकि विपक्ष की भूमिका टीवी चैनलो ने सही प्रकार नहीं दिखाई। उन्हें स्क्रीन से हमेशा बाहर रखा, उनके बयानों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया और एक विशेष पार्टी की चाटुकारिता करके उसे देश भक्ति पार्टी बताया गया।

जबकि असल मुद्दे नोट बंदी में मौत, जीएसटी को लेकर सूरत के व्यापारियों का रोष, बेरोजगारी का बढ़ता प्रमाण, महंगाई, रसोई गैस के बढ़ते दाम, सीमा पर सैनिकों की मौत का बढ़ता प्रमाण, विकास दर में 45 साल से कम की दर यह वह मुद्दे हैं जो विपक्ष ने सामने लाये, मगर टीवी चैनलो ने उन्हें जगह नहीं दी। आज पुराने पत्रकार मेन स्ट्रीम मीडिया से गायब होकर सोशल मीडिया में चले गए हैं। उनका मानना है कि आजकल के टीवी चैनलों में कुछ विशेष पार्टी का दबाव ऐसा रहता है कि चाटुकार ही वहां जीवित रह सकता है जबकि असल पत्रकार को उठाकर बाहर फेंक दिया जाता है।

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