संपादकीय

कुमारी शैलजा ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर उठाया सवाल

सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप कहा कि ईवीएम में गड़बड़ी की गई - कुमारी शैलजा

हिसार टुडे।  आज भले हुई भाजपा 10 लोकसभा सीटों में अपने जित के दावों के साथ ख़ुशी मन रही है और मुख्यमंत्री 5 तारीख को हिसार में अभिनन्दन सभा के जरिये अपने विरोधकों पर निशाना साधने की कोशिशों में लग गए हैं, मगर कांग्रेस के नेता मानते हैं कि बिना ईवीएम के गड़बड़ी के भाजपा चुनाव में जीतने में कामयाब नहीं हो सकती है। हरियाणा में ही नहीं पुरे देश में इन दिनों कांग्रेस नेता अपनी हार का मंथन कर रहे है। ऐसा ही मंथन का दौर हरियाणा में चल रहा है। हार के बाद कांग्रेस के नेता अपने कार्यकर्ताओ से मिलकर जय जताने की कोशिश कर रहे है कि उनकी हार का कारण मीडिया का नकारातमक प्रचार के साथ ईवीएम में भरी गड़बड़ी है। ऐसा ही आरोप कुमारी शैलजा ने अपने कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात करने के दौरान लगाया। कुमारी शैलजा ने सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि ईवीएम में गड़बड़ी की गई।

इतना ही नहीं खुद दीपेंद्र हुड्डा ने भी बूथ कैप्चरिंग का आरोप लगाकर संदेह उत्पन किया, इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद विपक्षी दल ईवीएम पर सवाल उठाने लगे हैं। पहले बसपा प्रमुख मायावती ने सवाल खड़े करते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को विपक्षी दलों की मांग पर विचार करना चाहिए। अब एएमएमके के टीटीवी दिनाकरन ने ईवीएम को लेकर भी सवाल उठाया था। न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक उन्होंने कहा, ‘यह बहुत अजीब बात है कि हमारे कई समर्थकों ने हमारी पार्टी को वोट दिया था, लेकिन उनके वोट पंजीकृत नहीं हुए, ऐसे उदाहरण हैं जहां हमारी पार्टी के लिए कोई वोट नहीं डाला गया। यह कैसे संभव हो सकता है?
उत्तर प्रदेश में हो रहे निकाय चुनाव के दौरान भी ईवीएम पर सवाल उठे।

कानपुर और मेरठ में कुछ मतदाताओं ने ऐसी शिकायत की थी कि किसी भी पार्टी को वोट देने के लिए बटन दबाने पर वोट कथित तौर पर भाजपा को ही क्यों जाता है। जब लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के दौरान ईवीएम में इस कथित गड़बड़ी को लेकर कानपुर और मेरठ में मतदाताओं ने प्रदर्शन भी किया। न्यूज18 की खबर ने बताया था कि कानपुर के तिवारीपुर वार्ड में बूथ नंबर 58 पर मतदाताओं ने कहा, इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन सी बटन दबा रहे हैं, वोट भाजपा के खाते में रजिस्टर हो रहा है। मतदाताओं का आरोप था कि उन्होंने मतदाता अधिकारी से शिकायत की लेकिन वोटिंग जारी रही।

रिपोर्ट में कहा गया कि यह खबर फैलते ही विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ता एकत्र हो गए और नारेबाजी करने लगे। हालांकि, प्रशासन ने कहा कि शिकायत के तत्काल बाद रिटर्निंग अधिकारी बदल दिया गया और ईवीएम भी बदल दी गई। इसी तरह की घटना कानपुर के नौबस्ता इलाके में दर्ज हुई। बूथ संख्या 66 में मतदाताओं ने शिकायत की कि कोई भी बटन दबाने पर वोट भाजपा को जा रहा था। कुछ ही देर में प्रदर्शन होने लगा और पुलिस ने लाठी चार्ज की।

अंग्रेजी पत्रिका फ़्रंटलाइन में छपी ख़बर के मुताबिक़, बांबे हाई कोर्ट में सूचना के अधिकार को आधार बनाकर दायर की गई एक जनहित याचिका में चुनाव आयोग की ओर से पिछले 13 महीने में जिस तरह के जवाब दिए गए हैं, उससे पता चलता है कि ईवीएम को लेकर उसके काम करने का तरीक़ा क्या है। आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन रॉय ने जनहित याचिका दायर कर चुनाव आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग से ईवीएम और वोटर वेरिफ़ाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) की ख़रीद, भंडारण और यह किन जगहों पर इस्तेमाल होती है, इसकी प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी माँगी थी। यह जनहित याचिका पूरी तरह से आरटीआई के माध्यम से जुटाई गई जानकारियों के आधार पर थी। कोर्ट ने केंद्रीय चुनाव आयोग, महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग, केंद्रीय गृह मंत्रालय और ईवीएम बनाने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की दो कंपनियों – इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल), हैदराबाद और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), बेंगलुरु से जानकारी माँगी।

इन जानकारियों में ईवीएम की ख़रीद, भंडारण और इसके इस्तेमाल को लेकर जो जानकारियाँ दी गई थीं वह बहुत ज़्यादा भयावह थीं। इसमें 116.15 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं की ओर भी इशारा किया गया था। इसके अलावा ईवीएम की संख्या को लेकर भी बड़ी गड़बड़ियाँ सामने आई थी। ख़बर के मुताबिक़, इन दस्तावेज़ों में कहा गया था कि कंपनियों की ओर से चुनाव आयोग को दी गई और उसे मिली ईवीएम की संख्या में बहुत बड़ा अंतर था। इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि ईवीएम निर्माता कंपनियों की ओर से चुनाव आयोग को दी गई लगभग 20 लाख ईवीएम अब आयोग के पास नहीं हैं। पिछले 13 महीनों में इस जनहित याचिका पर सात सुनवाईयां हो चुकी हैं लेकिन न तो चुनाव आयोग और न ही राज्य निर्वाचन आयोग इन गायब हुई ईवीएम के बारे में कुछ बता पाये।

रॉय की ओर से दायर की गई आरटीआई पर चुनाव आयोग ने 21 जून, 2017 को दिए अपने जवाब में कहा कि उसे बीईएल की ओर से 1989-90 और 2014-15 के बीच 10,05,662 ईवीएम मिलीं। जबकि बीईएल ने 2 जनवरी, 2018 को आरटीआई के जवाब में कहा कि उसने 1989-90 और 2014-15 के बीच 19,69,932 ईवीएम चुनाव आयोग को दी थीं। ईवीएम बनाने वाली दूसरी कंपनी ईसीआईएल ने आरटीआई के जवाब में 16 सितंबर, 2017 को कहा कि उसने 19,44,593 ईवीएम की आपूर्ति चुनाव आयोग को की। जबकि चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि उसे ईसीआईएल की ओर से 1989-90 और 2016-17 के बीच 10,14,644 ही मिलीं।

अब आती है इसमें हैरान करने वाली जानकारी। वह जानकारी यह है कि लगभग 15 सालों के अंतराल में चुनाव आयोग को बीईएल की ओर से दी गई 9,64,270 ईवीएम प्राप्त नहीं हुईं और 9,29,949 ईवीएम जो, दूसरी कंपनी ईसीआईएल ने चुनाव आयोग को दी थी, वह भी उसे नहीं मिली। है ना, हैरान करने वाली बात। आरटीआई दाखिल करने वाले रॉय भी इससे बुरी तरह हैरान हो गए। रॉय ने ईवीएम बनाने वाली दोनों कंपनियों से आरटीआई के माध्यम से हर साल के ऑर्डर-सप्लाई चार्ट की मांग की। लेकिन इससे भी जो जानकारी मिली, उसमें बहुत सारी गड़बड़ियां थी। ख़बर के सामने आने के बाद प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो की अपर महानिदेशक और चुनाव आयोग की प्रवक्ता शेफ़ाली शरण ने ट्वीट कर कहा है कि खबर में ईवीएम की माँग और आपूर्ति के बारे में किए गए दावे सिर्फ अनुमान पर आधारित हैं।

शेफाली शरण ने यह भी कहा है कि फरंटलाइन और टीवी9 भारतवर्ष के संपादकों को उनकी पत्रिका/चैनल में ली गई इस भ्रामक ख़बर के बारे में उचित जानकारी दे दी गई है। फरंटलाइन के संपादक ने इस बात को स्वीकार किया है कि इसका प्रतिउत्तर प्रकाशित कर दिया जाएगा। टीवी9 भारतवर्ष ने अपने टेलीकास्ट से ख़बर को हटा दिया है। शरण ने ट्वीट में फरंटलाइन और टीवी 9 भारतवर्ष को लिखे एक पत्र में कहा, ‘यह पता चलता है कि इस खबर में एक व्यक्ति को आरटीआई से और बांबे हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के माध्यम से मिली जानकारियों का चुनिंदा हिस्सा प्रकाशित किया गया है। इस खबर में पक्षपातपूर्ण और एकतरफा जानकारी दी गई है, जो कि गलत है और तथ्यों की गलत व्याख्या पर आधारित है, इससे आम जनता के मन में बेवजह का संदेह पैदा हो रहा है।

’पत्र में लिखा है कि ईवीएम को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के बारे में स्पष्ट है कि चुनाव आयोग की स्वीकृति के बिना एक भी ईवीएम को इसके गोदाम से बाहर नहीं ले जाया जा सकता है और इस संबंध में प्रशासनिक नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है। आयोग के पास एक मजबूत ‘ईवीएम प्रबंधन सॉफ्टवेयर’ है, जिसके माध्यम से प्रत्येक ईवीएम/वीवीपैट की स्थिति के बारे में पता किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी और चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के साथ सभी काम पारदर्शी तरीके से किए जाते हैं। खैर हकीकत क्या है यह तो खुदा या चुनाव आयोग की बता पायेगा। मगर शायद यह जवाब मिलना थोड़ा मुश्किल होगा।

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