संपादकीय

क्या सावित्री जिंदल ने ले लिया राजनीति से संन्यास!

संपादकीय

हिसार टुडे। हिसार का नाम लेते ही चर्चा में आता है नाम सावित्री जिन्दल का। हर चुनाव में कांग्रेस हिसार में वोटबैंक के लिए सावित्री जिंदल के वोटबैंक पर ही निर्भर रहता है। हर कोंग्रेसी नेता को लगता है चुनाव में जीतना है तो माताजी की कृपा रही तो वोटों की बरसात झमाझम होने लगेगी। शायद इसलिए मेयर चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव में सभी कोंग्रेसी और सावित्री जिंदल समर्थित प्रत्याशी उन्ही पर आसरा लगाए बैठे थे। मगर मेयर चुनाव में भाजपा की जीत और गौतम के भारी भरकम वोटों ने यह तो बता दिया कि अब सावित्री जिंदल का जादू और करिश्मा फीका पड़ता जा रहा है। बची-कूची कसर लोकसभा चुनाव में दिखाई दी। यहां तो सावित्री जिंदल का वोटबैंक कहे जाने वाले वोट भी कांग्रेस प्रत्याशी को नहीं पड़े। इतना ही नहीं कुम्भ स्नान के बहाने भाजपा नेताओं से मुलाकात, बार-बार भाजपा में जाने की खबर, इतना ही नहीं अचानक नवीन जिंदल द्वारा कुरुक्षेत्र से चुनाव लड़ने से इंकार कर देना। क्या सब घटनाएं इस बात का सबूत दे रही हैं कि जिंदल परिवार अब सक्रीय राजनीति से संन्यास लेने वाला है।

वैसे एक बात तो तय है कि सावित्री जिंदल ने कठिन से कठिन दौर में कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा, मगर अब वह जिस प्रकार से सक्रीय राजनीति से धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। वो इस बात की तरफ इशारा करता है कि सावित्री जिंदल समझ चुकी है कि उनका जनाधार अब धीरे-धीरे खत्म हो चुका है। इतना ही नहीं नवीन जिंदल का राजनीति से दूर होना, उनका राजनीति से दूर होना इस बात की तरफ इशारा कर रहा है कि हो सकता है कि वह इस बार विधानसभा चुनाव न लड़ें।

सूत्र बताते हैं कि सावित्री जिंदल और नवीन जिंदल शायद अब कभी कांग्रेस पार्टी की टिकट से चुनाव न लड़ें। हालांकि कांग्रेस पार्टी में वह बने तो रहेंगे, मगर चुनाव नहीं लड़ेंगे। वैसे अगर यह चर्चा सही साबित होती है तो यह जिंदल परिवार के लिए एक बहुत बड़ा टर्निंग प्वाइंट बनकर साबित होगा। क्योंकि एक तो उनके खुद के ही वोटबैंक घट गए हैं, अतरिक्त वोटबैंक उनसे जुड़े नहीं हैं। ऐसे में सावित्री जिंदल हो या नवीन जिंदल वे कहीं से भी चुनाव में खड़े हों, वह जीत कर नहीं आ सकते।

क्योंकि हिसार में भाजपा ने अपनी पैठ जो बनाई है अब अन्य पार्टियों के लिए उसे तोडना मुश्किल साबित होगा, इतना ही नहीं करोड़ों की लागत से सीवरेज पाईप लाइनों के कार्य भी विकासशील भाजपा की सोच को प्रदर्शित कर रहे हैं, ऐसे में एयरपोर्ट का काम भी जिस गति से चल रहा है, उसको देखकर भाजपा ने पहले ही हिसारवासियो का दिल जीत लिया है। ऐसे में कांग्रेस का वोटबैंक यहां लगातार घट रहा है, जो इस बात की तरफ पहले ही इशारा कर रहा है कि कांग्रेस से चाहे जो भी हिसार से चुनाव लड़े उसके लिए यहां से जीतना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। कोई यह बोलता था कि माताजी नलवा से अपना आखिरी विधानसभा चुनाव लड़ेंगी, मगर इसकी भी गुंजाईश कम नजर आ रही है। इतना ही नहीं नवीन जिंदल भी चुनाव से राम राम कह चुके हैं।

जानकारों का मानना है कि अब जिंदल परिवार उतना राजनीति में खुलकर सामने नहीं आएगा जैसा पहले आया करता था। अब सावित्री जिंदल का चुनाव न लड़ने की बात चर्चा में बाहर आने का मतलब साफ है कि भाजपा को विधानसभा चुनाव में मजबूत विपक्ष शायद खोजना पड़े। कांग्रेस के साथ एक मजबूत राजघराने के तौर पर जिंदल का नाम सामने आया करता था। सावित्री जिंदल के दामाद तो खुद रोहतक से भाजपा की टिकट से मेयर बन चुके हैं, उनके परिवार का एक सदस्य पहले ही भाजपा के वरिष्ठ मंत्रियों के साथ है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि उनके मधुर रिश्ते भाजपा के नेताओं के साथ भी हैं। मगर जिस प्रकार से चुनाव और राजनीति से दूरी सावित्री जिंदल ने बना रखी है, उसने पार्टी श्रेस्ट को सन्देश दे दिया है कि वह किसी और की तलाश कर लें।

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