टुडे न्यूज़संपादकीय

एसवाईएल मुद्दे का विरोध करने वाले अकाली दल से किस मुंह से भाजपा करती गठबंधन

संपादकीय महेश मेहता

हिसार टुडे

एसवाईएल यह मुद्दा ही ऐसा है जिसने 5 सालों तक भाजपा का पीछा नहीं छोड़ा और भाजपा 5 सालों में इसे हल भी नहीं करवा पाई। युं तो एसवाईएल का पानी हरियाणा को देने के पक्ष में पंजाब की शिरोमणि अकाली दल नहीं है। इसलिए अक्सर उनमें भाजपा के साथ मतभेद की खबरें आती रहती हैं। मगर माना जा रहा है कि इस बार अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल इस बात को लेकर नाराज हैं कि हरियाणा में पार्टी के एकमात्र विधायक को भाजपा में शामिल किया गया। ऐसा करके भाजपा ने अनैतिक और दुर्भाग्यपूर्ण कार्य किया है। सुखबीर सिंह बादल अब कहते फिर रहे हैं कि हर रिश्ते की एक मर्यादा होती है और अकाली दल के मौजूदा विधायक को अपने खेमे में शामिल करने से उनके गठबंधन की मर्यादा का उल्लंघन हो रहा है।

क्या हरियाणा में अकाली दल का नेता शामिल करना भाजपा की कुछ नियोजित रणनीति का हिस्सा है? क्योंकि हर कदम की भनक पार्टी हाई कमान को होना भी तय है। दरअसल कलांवाली के विधायक बलकौर सिंह को भारतीय जनता पार्टी ने बृहस्पतिवार को नयी दिल्ली में उन्हें पार्टी में शामिल करवाया था। शामिल करवाया तो ठीक मगर अकाली दल के इस नेता ने शामिल होते ही भाजपा के गुणगान में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए।

उन्होंने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की राज्य को ‘ईमानदार’ सरकार कहकर जमकर तारीफंे की। इस पुरे घटनाक्रम में सुखबीर सिंह बादल ने अकाली दल कोर कमेटी की बैठक में भाजपा द्वारा गठबंधन धर्म के नियम तोड़ने पर चर्चा की गयी। उन्होंने यह भी कहा बादल ने कहा कि अकाली दल ने हरियाणा विधानसभा चुनाव अकेले दम पर लड़ने का फैसला किया है। पंजाब में कोई समस्या नहीं है जहां भाजपा के साथ हमारा गठबंधन है। पंजाब और दिल्ली में हमारा गठबंधन कायम है। उन्होंने कहा कि हरियाणा में पहले भी भाजपा के साथ हमारा गठबंधन नहीं रहा, लेकिन पुराने सहयोगी दल होने के नाते हमारी एक प्रतिबद्धता है। बादल एक तरफ दिल्ली और पंजाब में गठबंधन की बात पर कायम थे तो वहीं हरियाणा की बात पर उन्होंने इस घटना को ही अत्यंत निंदनीय करार दिया।

मगर क्या ऐसा करके पंजाब को यह संदेश जा रहा है कि भाजपा जल्द ही पंजाब में गठबंधन से दूर खुद के दम पर सरकार बनाने की कोशिश करेगा? दरअसल भाजपा का बेशक पंजाब में शिरोमणि अकाली दल से चुनावी समझौता है, लेकिन हरियाणा में एसवाईएल नहर निर्माण के मुद्दे पर दोनों पार्टियों के मत भिन्न हैं। माना जा रहा है कि भाजपा इसी कारण शिअद से कोई चुनावी समझौता नहीं करना चाहती। क्योंकि उसको लगता है कि अगर उन्होंने समझता किया तो यही मुद्दा विपक्ष के पास चुनावी मुद्दा बनकर साबित होगा। विपक्ष को बोलने का मौका मिलेगा कि हरियाणा को पानी देने का विरोध करने वालों से भाजपा कर रही है गठबंधन। इसलिए भाजपा को लगा कि इससे बेहतर है गठबंधन न करे और मिशन 75 की तरफ आगे बढे।

क्या हरियाणा में अकाली दल का साथ छोड़ना राजनीतिक मजबूरी और जीत के प्रति भाजपा की ललक है या आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए अभी से तैयार की जा रही रणनीति। दरअसल भाजपा की कार्य शैली है कि आज जो पार्टी सोचती है वह उसके बहुत गुना आगे की सोचती है। भाजपा चाहती है कि पंजाब में भी भाजपा का कमल पूर्ण बहुमत के साथ खिले। इसलिए वहां के मुख्यमंत्री से अमित शाह का नरम रुख और बड़े भाई की संज्ञा इस तरफ ईशारा कर रहा है कि भविष्य की राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है। अगर यह पटकथा सही तरीके से भाजपा के चाणक्य के मन के अनुसार लिखी गई तो हो सकता है कि पंजाब की आगामी राजनीतिक पठकथा का निचोड़ भाजपामय शासन से निकले। इनदिनों भाजपा में दूसरी पार्टी से आये मजबूत उम्मीदवारों की बाढ़ सी आ रही है।

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