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तंवर हार से डर गए क्या ?

संपादकीय : महेश मेहता

हिसार टुडे

यूं तो आये दिन कांग्रेस मीडिया की सुर्खियों में बानी रहती है और बात है कि विवादों के लिए। जनता भी यही जानना चाहती है कि भाजपा का तो पता चल रहा है मगर भाई कांग्रेस का क्या हाल है कोई यह बताये। वैसे कर्नाटक का खेल समझने और सुलझाने में फिलहाल हरियाणा कांग्रेस प्रभारी आजाद busy हैं। अच्छा है उनको डिस्टर्ब न किया जाए। मगर बखेड़ा कर्णाटक की तरफ हरियाणा कांग्रेस में भी जल्द होगा। यह मैं नहीं कह रहा यहां के हालत कह रहे हैं। समझ नहीं आता अशोक तंवर को प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी से इतना प्यार क्यों है? किसी भी कीमत में वह अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं।

सुना है कि अब तो उन्होंने ऐलान भी कर दिया है कि वह हरियाणा में विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, बल्कि पार्टी को चुनाव में बलवान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाएंगे। भाई तो क्या समझ ले कि आपको कांग्रेस प्रेम हुआ है या चुनाव में बुरी तरह हारने का डर। वैसे जानकार तो यही कहने लगे हैं कि लोकसभा में भाजपा की महिला प्रत्याशी सुनीता दुग्गल से बुरी तरह हारने के बाद अब अशोक तंवर हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव लड़ पाएं। भाई साहब हद्द होती है, इतना डरोगे दूसरे प्रत्याशियों के मन से हार का डर निकालोगे कैसे? हुड्डा जी तो आपने लोकसभा में चुनाव लड़वाकर ठिकाने लगा दिया और अब जब खुद की बारी आयी तो हाथ खड़े करते हो कमाल है साहब।

हाल में यह महाशय एक साक्षात्कार में अपनी भूल स्वीकारते हुए कह रहे थे कि मेयर चुनाव हमें कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर लड़ना चाहिए था, यहीं हमारी सबसे बड़ी गलती हो गयी। भाई साहब अब पता चला कि गलती हो गयी, हिसार से रेखा एेरन जिन अरमानों के साथ कांग्रेस में शामिल हुयी थी। उनको तो इसी चुनावचिन्ह को लेकर अपनी असहमति ने हरा दिया। आपने ही कहा था न कि मेयर चुनाव कांग्रेस नहीं लड़ रही। जबकि आपके ही कांग्रेस के नेताओं ने मेयर प्रत्यशियों को समर्थन दिया था।

साहब इतने में ही नहीं रुके, कहते हंै कि हम तो मेयर चुनाव चुनाव चिन्ह पर लड़ना चाहते थे, 70-80 फीसद कार्यकर्ता रेडी भी थे, मगर कुछ लोग नहीं चाहते थे कि चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा जाए इसलिए हम हार गए और भाजपा जीत गयी। कमाल करते हैं अशोक तंवर यह बात मुझे क्या किसी को भी हजम नहीं हो रही। खैर छोड़िये क्या बोलें आपके बारे में।

ग्राउंड रिपोर्ट वैसे यह कहती है कि दरहसल अशोक तंवर जानते हैं कि ऐसी कोई सीट नहीं है जहां से वह अपने जितने की उम्मीद करें। क्योंकि उनको उनके ही समाज से वह सकारात्मक सन्देश नहीं मिला जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी। कार्यकर्ता भले ही आपके इर्द-गिर्द मंडराते फिरें मगर हकीकत तो यही है कि वह आपको चुनाव में जीत नहीं दिलवा सकते। जीत अगर पानी है तो वह है मतदाता। मगर आपकी छवि ही लोगों के मन में ऐसी बसी है कि पता नहीं मतदाता आपके बारे में क्या सोचते होंगे। सिरसा से सांसद का चुनाव लड़ने के दौरान आपको भाजपा से कितने लाख वोटों के मार्जिन से हार का मुंह देखना पड़ा इस बात से आप अवगत तो हैं या आपको याद दिलाना पड़ेगा।

वैसे एक प्रदेशाध्यक्ष ऐसा होना चाहिए कि वह किसी भी चुनौती में डट कर खड़ा हो और अपने विरोधियों को भी आड़े हाथो लेने का हुनर रखता हो। स्वर्गीय भजनलाल और बंसीलाल का दौर याद करो, शायद कुछ सीख मिले आपको। मुझे पता है आपको किसी के सीख की जरुरत नहीं मगर आपने वह कहावत तो सुनी होगी, “निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।” यानी कि आपकी निंदा करने वालों को अपने साथ रखें, क्योंकि इससे आपको अपने अंदर की कमियां सुधारने का मौका मिल जाएगा। आज लगता है इसी चक्कर में आप अपने पद से इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं। यही सोच रहे हैं कि वैसे भी चुनाव हारा तो कोई पूछेगा नहीं, इससे अच्छा है प्रदेशाध्यक्ष बने रहुं, कम से कम कोई पूछेगा तो जरूर। खैर हुड्डा जी को पता है कि आपके मन में क्या चल रहा है, इसलिए तो हुड्डा का बयान भी आया है कि कुछ भी हो जाए मैं पार्टी नहीं छोडूंगा।

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