टुडे न्यूज़संपादकीय

मोदी सरकार के सामने संकट

हिसार टुडे 

मोदी सरकार के आते ही भारत को एक के बाद एक ऐसे झटके मिल रहे है जिसकी उम्मीद शायद पहले कभी किसी ने नहीं की होगी। हकीकत तो यह है कि आखिरकार सरकार ने देश में बेरोज़गारी दर के बढ़ने से जुड़े आकंड़े जारी कर दिए हैं। वैसे जब चुनाव के पहले यह आकड़े बाहर आये थे तब सरकार ने उसका विरोध किया था और इसे करार दिया था।

दरहसल हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार अब सरकार ने यह आंकड़े खुद जारी किए हैं जिसमें माना गया है कि भारत में बेरोज़गारी दर पिछले चार दशक में सबसे ज़्यादा पहुंच गई है। सरकार की ओर जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष यानी 2017-18 के दौरान बेरोज़गारी की दर 6.1 फीसदी बढ़ी। ये डेटा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल सदस्यों के शपथग्रहण समारोह के एक दिन बाद जारी हुआ है।

सरकार ने पहले लीक हुई रिपोर्ट को यह कहते हुए ख़ारिज किया था कि बेरोज़गारी के आंकड़ों को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है। मगर आखिरकार सरकार ने मान लिया की 45 साल में बेरोजगारी का आकड़ा सबसे निचले पायदान पर पहुंच चूका है. मोदी सरकार के दूसरे पारी में आते ही यह रिपोर्ट एक तरह से सरकार के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है।

अब सरकार को यह जवाब देना होगा की इतना खराब परफॉर्मन्स क्यों रहा है। और जो विपक्ष बढ़ते बेरोजगारी दर की बात करती थी। उसे हमेशा सरकार ने झूट का पुलिंदा बताया मगर आज सच सबके सामने उजागर हो चूका है। मोदी सरकार को उसके पहले कार्यकाल में सबसे ज्यादा रोज़गार के मुद्दे पर घेरा गया।

सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017-18 के बीच बेरोज़गारी 45 साल में सबसे ज़्यादा रही। अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी मानते हैं कि सरकार को अभी भवन निर्माण और कपड़ा इंडस्ट्री जैसे लेबर-सेक्टर पर फ़ोकस करने की ज़रूरत है, ताकि तत्काल प्रभाव से रोजगार पैदा किया जा सके। इसके अलावा सरकार को हेल्थ केयर जैसी इंडस्ट्री पर भी काम करना चाहिए ताकि लंबी अवधि वाली नौकरियां भी पैदा की जा सकें। हेल्थ सेक्टर में नौकरियों पर जोशी कहते हैं, “सरकार अपनी स्वास्थ्य सेवा और जन कल्याण योजनाओं को बढ़ाना चाहती है, इसके लिए डॉक्टरों और सर्जनों के अलावा पैरामेडिक्स और नर्सों की भी आवश्यकता है।”

माना जा रहा है कि घटता निर्यात भी रोजगार के रास्ते में एक बड़ी रुकावट पैदा करता है। सरकार से ऐसी नीतियों को प्राथमिकता देने की उम्मीद है जो छोटे और मध्यम व्यापार को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएंगी। शायद यही कारण है कि छोटे -मझले खुदरा व्यापारियों के लिए सरकार पेंशन योजना ला रही है। बेरोजगारी की दर के साथ ही देश की आर्थिक वृद्धि दर भी धीमी पड़कर पांच साल के न्यूनतम स्तर यानी 5.8 फ़ीसदी पर पहुंच गई है।

इससे पहले वित्त वर्ष 2017-18 की चौथी तिमाही में विकास दर 7.2 फ़ीसदी रही थी। ये रिपोर्ट बताती है कि ये आंकड़े दूसरी बार प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। पिछले वित्तीय वर्ष अप्रैल 2018 से मार्च 2019 तक आर्थिक वृद्धि दर 6.8% रही।
इसका मतलब है कि भारत अब सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं रह गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के लिए ये एक बड़ी चुनौती बनकर साबित होने वाली है।

निर्मला सीतारमण मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में कॉमर्स और रक्षा जैसे मंत्रालय संभाल चुकी हैं। सरकार के सामने मौजूदा चुनौती ये है कि वो अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों का यकीन वापस ला सके। अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी कहते हैं, “सरकार को अपनी शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म पॉलिसी के बीच सामंजस्य बैठाना होगा।” नई जीडीपी दर से साफ है कि भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से नीचे की ओर गिर रही है। चीन के अलग भारत की आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा कारक यहां की घरेलू खपत है।

पिछले 15 सालों से घरेलू खपत ही अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभाता रहा है। लेकिन हालिया डेटा से साफ़ है कि उपभोक्ताओं की खरीदने की क्षमता में कमी आई है। कारों-एसयूवी की बिक्री पिछले सात सालों के सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है। ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, स्कूटर की बिक्री में भी कमी हुई है। बैंक से कर्ज़ लेने की मांग भी तेज़ी से बढ़ी है। हालिया तिमाहियों में हिंदुस्तान यूनिलीवर की आय वृद्धि में भी कमी आई है। इन तथ्यों को देखते हुए ये समझा जा सकता है कि उपभोक्ता की खरीदने की क्षमता में कमी आई है। इतना ही नहीं मोदी सरकार के आते ही तीसरी समस्या बन गयी है किसानों पर आते संकट की।

भारत में बढ़ता कृषि संकट नरेंद्र मोदी के लिए उनके पहले कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहा। देश भर के किसान दिल्ली-मुंबई सहित देश के कई हिस्सों में सड़कों पर अपनी फ़सल के उचित दाम की मांग के साथ उतरे है। भाजपा ने अपनी पहली सरकार में चुनिंदा किसानों को 6000 रुपये सालाना देने का फ़ैसला किया था, हालांकि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली मंत्रिमंडल की बैठक में सभी किसानों के लिए ये स्कीम लागू कर दी है। जोशी कहते हैं, “इस योजना से कुछ वक्त के लिए राहत देगी लेकिन लंबे वक्त में ये काम नहीं आएगी।

” वह मानते हैं कि कृषि क्षेत्र की संरचना को सुधारने की ज़रूरत है। वर्तमान समय में किसान अपनी फ़सल राज्य सरकार की एजेंसियों को बेचते हैं। जोशी कहते हैं कि किसानों को सीधे बाज़ार में मोलभाव करने की सहूलियत देनी चाहिए। इसके अलावा चौथा मुद्दा है ट्रम्प द्वारा भारत को मिला जोरदार झटका।

दरहसल लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत पर पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की थी। डोनाल्ड ट्रंप अक्सर भारत की तारीफ करते हैं, लेकिन अब एक हैरान करने वाली खबर आ रही है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जीएसपी व्यापार कार्यक्रम के तहत भारत को प्राप्त लाभार्थी विकासशील देश का दर्जा खत्म कर दिया है।

उन्होंने कहा कि भारत ने अमेरिका को अपने बाजार तक समान और तर्कपूर्ण पहुंच देने का आश्वासन नहीं दिया है। जेनरेलाइज सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस (जीएसपी) अमेरिका का सबसे बड़ा और पुराना व्यापार तरजीही कार्यक्रम है। इसका लक्ष्य लाभार्थी देश के हजारों उत्पादों को बिना शुल्क प्रवेश की अनुमति देकर आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “मैंने यह तय किया है कि भारत ने अमेरिका को अपने बाजार तक समान और तर्कपूर्ण पहुंच देने का आश्वासन नहीं दिया है।

तदनुसार, पांच जून, 2019 से भारत को प्राप्त लाभार्थी विकासशील देश का दर्जा समाप्त करना बिल्कुल सही है।” डोनाल्ड ट्रंप ने इस संबंध में अमेरिका के तमाम शीर्ष सांसदों की अपील ठुकराते हुए यह फैसला लिया है। सांसदों का कहना था कि इस कदम से अमेरिकी उद्योगपतियों को प्रतिवर्ष 30 करोड़ राष्ट्रपति ट्रंप ने चार मार्च को कहा था कि अमेरिका जीएसपी के तहत भारत को प्राप्त लाभार्थी विकासशील देश का दर्जा खत्म करने पर विचार कर रहा है।

इस संबंध में भारत को मिला 60 दिन का नोटिस तीन मई को समाप्त हो चुका है। इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था, “मैंने अपने देश की ओर से, अपनी ओर से और हर व्यक्ति की ओर से बधाई दी। उन्होंने चुनावों में शानदार जीत दर्ज की। वह मेरे दोस्त हैं। भारत से हमारे बहुत अच्छे रिश्ते हैं।’’ राष्ट्रपति ट्रंप ने बाद में एक ट्वीट भी किया और मोदी को ‘महान व्यक्ति एवं भारत के लोगों का नेता’ कहकर उनकी तारीफ की थी। भारत के लिए पांचवा संकट है निजीकरण को बढ़ावा देना।

भाजपा के अपने चुनावी वादों में से एक था कि वह रेलवे, सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर 1.44 ट्रिलियन डॉलर कैसे खर्च करेंगे। लेकिन इतनी बड़ी रकम कहां से आएगी? जानकार मानते हैं कि मोदी इसके लिए निजीकरण की राह अपना सकते हैं। मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में सरकारी उद्यमों को बेचने के अपने वादों पर धीमी गति से काम किया है। एयर इंडिया लंबे वक्त से कर्ज़ में डूबी है। सरकार ने इसके शेयर बेचने की प्रक्रिया शुरू की लेकिन कोई ख़रीददार नहीं मिला और एयर इंडिया नहीं बिक सकी।

मोदी सरकार के आते ही भारत को एक के बाद एक ऐसे झाके मिल रहे है जिसकी उम्मीद शायद पहले कभी किसी ने नहीं की होगी। हकीकत तो यह है कि आखिरकार सरकार ने देश में बेरोज़गारी दर के बढ़ने से जुड़े आकंड़े जारी कर दिए हैं। वैसे जब चुनाव के पहले यह आकड़े बाहर आये थे तब सरकार ने उसका विरोध किया था और इसे करार दिया था।

दरहसल हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार अब सरकार ने यह आंकड़े खुद जारी किए हैं जिसमें माना गया है कि भारत में बेरोज़गारी दर पिछले चार दशक में सबसे ज़्यादा पहुंच गई है। सरकार की ओर जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष यानी 2017-18 के दौरान बेरोज़गारी की दर 6.1 फीसदी बढ़ी। ये डेटा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल सदस्यों के शपथग्रहण समारोह के एक दिन बाद जारी हुआ है।

सरकार ने पहले लीक हुई रिपोर्ट को यह कहते हुए ख़ारिज किया था कि बेरोज़गारी के आंकड़ों को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है। मगर आखिरकार सरकार ने मान लिया की 45 साल में बेरोजगारी का आकड़ा सबसे निचले पायदान पर पहुंच चूका है. मोदी सरकार के दूसरे पारी में आते ही यह रिपोर्ट एक तरह से सरकार के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। अब सरकार को यह जवाब देना होगा की इतना खराब परफॉर्मन्स क्यों रहा है।

और जो विपक्ष बढ़ते बेरोजगारी दर की बात करती थी। उसे हमेशा सरकार ने झूट का पुलिंदा बताया मगर आज सच सबके सामने उजागर हो चूका है। मोदी सरकार को उसके पहले कार्यकाल में सबसे ज्यादा रोज़गार के मुद्दे पर घेरा गया। सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017-18 के बीच बेरोज़गारी 45 साल में सबसे ज़्यादा रही। अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी मानते हैं कि सरकार को अभी भवन निर्माण और कपड़ा इंडस्ट्री जैसे लेबर-सेक्टर पर फ़ोकस करने की ज़रूरत है, ताकि तत्काल प्रभाव से रोजगार पैदा किया जा सके।

इसके अलावा सरकार को हेल्थ केयर जैसी इंडस्ट्री पर भी काम करना चाहिए ताकि लंबी अवधि वाली नौकरियां भी पैदा की जा सकें। हेल्थ सेक्टर में नौकरियों पर जोशी कहते हैं, “सरकार अपनी स्वास्थ्य सेवा और जन कल्याण योजनाओं को बढ़ाना चाहती है, इसके लिए डॉक्टरों और सर्जनों के अलावा पैरामेडिक्स और नर्सों की भी आवश्यकता है।”

माना जा रहा है कि घटता निर्यात भी रोजगार के रास्ते में एक बड़ी रुकावट पैदा करता है। सरकार से ऐसी नीतियों को प्राथमिकता देने की उम्मीद है जो छोटे और मध्यम व्यापार को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएंगी। शायद यही कारण है कि छोटे -मझले खुदरा व्यापारियों के लिए सरकार पेंशन योजना ला रही है।

बेरोजगारी की दर के साथ ही देश की आर्थिक वृद्धि दर भी धीमी पड़कर पांच साल के न्यूनतम स्तर यानी 5.8 फ़ीसदी पर पहुंच गई है। इससे पहले वित्त वर्ष 2017-18 की चौथी तिमाही में विकास दर 7.2 फ़ीसदी रही थी। ये रिपोर्ट बताती है कि ये आंकड़े दूसरी बार प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। पिछले वित्तीय वर्ष अप्रैल 2018 से मार्च 2019 तक आर्थिक वृद्धि दर 6.8% रही।
इसका मतलब है कि भारत अब सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं रह गया है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के लिए ये एक बड़ी चुनौती बनकर साबित होने वाली है। निर्मला सीतारमण मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में कॉमर्स और रक्षा जैसे मंत्रालय संभाल चुकी हैं। सरकार के सामने मौजूदा चुनौती ये है कि वो अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों का यकीन वापस ला सके। अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी कहते हैं, “सरकार को अपनी शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म पॉलिसी के बीच सामंजस्य बैठाना होगा।” नई जीडीपी दर से साफ है कि भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से नीचे की ओर गिर रही है।

चीन के अलग भारत की आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा कारक यहां की घरेलू खपत है। पिछले 15 सालों से घरेलू खपत ही अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभाता रहा है। लेकिन हालिया डेटा से साफ़ है कि उपभोक्ताओं की खरीदने की क्षमता में कमी आई है। कारों-एसयूवी की बिक्री पिछले सात सालों के सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है। ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, स्कूटर की बिक्री में भी कमी हुई है।

बैंक से कर्ज़ लेने की मांग भी तेज़ी से बढ़ी है। हालिया तिमाहियों में हिंदुस्तान यूनिलीवर की आय वृद्धि में भी कमी आई है। इन तथ्यों को देखते हुए ये समझा जा सकता है कि उपभोक्ता की खरीदने की क्षमता में कमी आई है। इतना ही नहीं मोदी सरकार के आते ही तीसरी समस्या बन गयी है किसानों पर आते संकट की।

भारत में बढ़ता कृषि संकट नरेंद्र मोदी के लिए उनके पहले कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहा। देश भर के किसान दिल्ली-मुंबई सहित देश के कई हिस्सों में सड़कों पर अपनी फ़सल के उचित दाम की मांग के साथ उतरे है। भाजपा ने अपनी पहली सरकार में चुनिंदा किसानों को 6000 रुपये सालाना देने का फ़ैसला किया था, हालांकि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली मंत्रिमंडल की बैठक में सभी किसानों के लिए ये स्कीम लागू कर दी है। जोशी कहते हैं, “इस योजना से कुछ वक्त के लिए राहत देगी लेकिन लंबे वक्त में ये काम नहीं आएगी।

” वह मानते हैं कि कृषि क्षेत्र की संरचना को सुधारने की ज़रूरत है। वर्तमान समय में किसान अपनी फ़सल राज्य सरकार की एजेंसियों को बेचते हैं। जोशी कहते हैं कि किसानों को सीधे बाज़ार में मोलभाव करने की सहूलियत देनी चाहिए। इसके अलावा चौथा मुद्दा है ट्रम्प द्वारा भारत को मिला जोरदार झटका। दरहसल लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत पर पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की थी। डोनाल्ड ट्रंप अक्सर भारत की तारीफ करते हैं, लेकिन अब एक हैरान करने वाली खबर आ रही है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जीएसपी व्यापार कार्यक्रम के तहत भारत को प्राप्त लाभार्थी विकासशील देश का दर्जा खत्म कर दिया है।

उन्होंने कहा कि भारत ने अमेरिका को अपने बाजार तक समान और तर्कपूर्ण पहुंच देने का आश्वासन नहीं दिया है। जेनरेलाइज सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस (जीएसपी) अमेरिका का सबसे बड़ा और पुराना व्यापार तरजीही कार्यक्रम है। इसका लक्ष्य लाभार्थी देश के हजारों उत्पादों को बिना शुल्क प्रवेश की अनुमति देकर आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “मैंने यह तय किया है कि भारत ने अमेरिका को अपने बाजार तक समान और तर्कपूर्ण पहुंच देने का आश्वासन नहीं दिया है।

तदनुसार, पांच जून, 2019 से भारत को प्राप्त लाभार्थी विकासशील देश का दर्जा समाप्त करना बिल्कुल सही है।” डोनाल्ड ट्रंप ने इस संबंध में अमेरिका के तमाम शीर्ष सांसदों की अपील ठुकराते हुए यह फैसला लिया है। सांसदों का कहना था कि इस कदम से अमेरिकी उद्योगपतियों को प्रतिवर्ष 30 करोड़ राष्ट्रपति ट्रंप ने चार मार्च को कहा था कि अमेरिका जीएसपी के तहत भारत को प्राप्त लाभार्थी विकासशील देश का दर्जा खत्म करने पर विचार कर रहा है।

इस संबंध में भारत को मिला 60 दिन का नोटिस तीन मई को समाप्त हो चुका है। इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था, “मैंने अपने देश की ओर से, अपनी ओर से और हर व्यक्ति की ओर से बधाई दी। उन्होंने चुनावों में शानदार जीत दर्ज की। वह मेरे दोस्त हैं। भारत से हमारे बहुत अच्छे रिश्ते हैं।’’ राष्ट्रपति ट्रंप ने बाद में एक ट्वीट भी किया और मोदी को ‘महान व्यक्ति एवं भारत के लोगों का नेता’ कहकर उनकी तारीफ की थी। भारत के लिए पांचवा संकट है निजीकरण को बढ़ावा देना।

भाजपा के अपने चुनावी वादों में से एक था कि वह रेलवे, सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर 1.44 ट्रिलियन डॉलर कैसे खर्च करेंगे। लेकिन इतनी बड़ी रकम कहां से आएगी? जानकार मानते हैं कि मोदी इसके लिए निजीकरण की राह अपना सकते हैं। मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में सरकारी उद्यमों को बेचने के अपने वादों पर धीमी गति से काम किया है। एयर इंडिया लंबे वक्त से कर्ज़ में डूबी है। सरकार ने इसके शेयर बेचने की प्रक्रिया शुरू की लेकिन कोई ख़रीददार नहीं मिला और एयर इंडिया नहीं बिक सकी।

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