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हुड्डा के तकदीर का फैसला करेगी राजस्थान विधानसभा चुनाव का परिणाम

Hisar Today

वैसे चर्चा इस बात पर जोरो पर है कि भूपेंद्र हुड्डा की जनक्रांति रथ यात्रा कांग्रेस हाईकमान पर दबाव डालने में नाकाम रही है? चर्चा यह भी थी हुड्डा की जनक्रांति रथ यात्रा प्रदेश में सियासी तूफान लाने में नाकाम रही? ऐसे में अपने ही पार्टी के अंदर उठे इन विरोधी स्वर को दबाने के लिए भूपेंद्र हुड्डा ने एक नया पैतरा खेलते हुए दिसंबर में विशाल रैली को रेकॉर्डतोड़ रैली बनाने के मूड में हैं। वैसे 11 दिसंबर को आने वाला राजस्थान विधानसभा का चुनाव क्या हरियाणा की राजनीति में असर दाल पायेगा। क्या यह हरियाणा में कांग्रेस की राजनीती में असर डालेगा इस पर फिलहाल सभी की निगाहें टिकी हुई है। दरअसल पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा ने कांग्रेस हाईकमान को अपनी सियासी ताकत दिखाने के लिए दिसंबर में विशाल रैली करने का एलान किया था। भूपेंद्र हुड्डा खेमे की प्लानिंग यही थी कि विशाल रैली के जरिए वे हाईकमान को यह दिखा देंगे कि उनके बगैर हरियाणा में कांग्रेस सत्ता हासिल नहीं कर सकती है। वो चाहते थे कि इस बहाने वह पार्टी आलाकमान को झुकाने का काम करेंगे। भूपेंद्र हुड्डा ने सोचा कि रिकॉर्डतोड़ रैली के बलबूते वह पार्टी हाईकमान को उसी तरह झुकाने का काम करेंगे जैसे पंजाब में अमरिंदर सिंह ने झुकाया था।

लेकिन भूपेंद्र हुड्डा की यह सियासी मिसाइल बड़ा धमाका करने से पहले ही सियासी हालात का शिकार हो गई है। क्यूंकि हाल में नवंबर/दिसंबर में ही पांच राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के चुनाव की घोषणा कर दी गई है । 11 दिसंबर को इन राज्यों के चुनाव परिणाम घोषित होंगे। जजमेंट डे पर आने वाला जनता का फैसला हरियाणा ही नहीं पूरे देश की सियासत पर निर्णय का असर डालने का काम करेगा। 11 तारीख के परिणामों के आधार पर ही देश की सियासी तस्वीर साफ होगी। 11 तारीख के चुनाव परिणाम अकारण भूपेंद्र हुड्डा की रैली की उपयोगिता और महत्व खत्म हो गया है। अगर 11 तारीख को राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनने का जनादेश आया तो हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा को प्रदेश कांग्रेस की एकतरफा कमान मिलने के दरवाजे बंद हो जाएंगे और अशोक तंवर की कुर्सी बरकरार रहने का रास्ता साफ हो जाएगा। अगर 11 तारीख को राजस्थान में भाजपा अपनी सरकार बचाने में सफल रही तो फिर रैली की सफलता का हिसाब-किताब लगाए बगैर हुड्डा को हरियाणा की चुनावी कमान देने को कांग्रेस हाईकमान मजबूर हो जाएगा। वैसे अब दिसंबर में भूपेंद्र हुड्डा की रैली नहीं बल्कि 11 तारीख का चुनाव परिणाम ही हरियाणा कांग्रेस के भावी हालात और जरूरतों का फैसला करने का काम करेगा ।अगर देखा जाए तो भूपेंद्र हुड्डा की सियासी हसरतों पर पांच राज्यों के चुनाव परिणाम की तारीख भारी पड़ने का काम कर गई है।

हो सकता है दिसंबर के बाद सिर्फ चुनाव परिणामों का ही आकलन होगा और भूपेंद्र हुड्डा की रैली को कोई गंभीरता से नहीं लेगा। हो सकता है कि कार्यकर्ता भी भूपेंद्र हुड्डा की सबसे बड़ी दिसंबर रैली सियासी समीकरणों को प्रभावित करने में नाकाम रहेगी क्योंकि उससे पहले ही चुनाव परिणाम का धमाका चारों तरफ फैल चुका होगा। ऐसा माना जा रहा है कि भूपेंद्र हुड्डा अब विशाल रैली के जरिए सिर्फ अपने दमखम का परिचय ही नहीं देना चाहते बल्कि वह पार्टी आलाकमान को यह भी दिखने की कोशिशों में है कि हरियाणा में कांग्रेस पार्टी में उनसे बड़ा और कद्दावर नेता और कोई नहीं। मगर विभिन्न राज्यों के चुनाव जरूर उनके मंसूबो पर पानी फेर दे। वे रिकॉर्ड तोड़ रैली के जरिए कांग्रेस हाईकमान पर दबाव हरगिज़ नहीं डाल पाएंगे।11 दिसंबर को अगर राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनने का फैसला आया तो भूपेंद्र हुड्डा के लिए हरियाणा कांग्रेस की चौधर हासिल करने की गुंजाइश दम तोड़ जाएगी और अगर राजस्थान में कांग्रेश को मात मिली तो भूपेंद्र हुड्डा को चुनावी जंग का सेनापति बनाना कांग्रेस हाईकमान की मजबूरी हो जाएगी। हालांकि क्या भूपेंद्र हुड्डा कांग्रेस पार्टी आलकमान को कितना खुश कर पाएंगे यह तो अभी भी भविष्य की गर्भ में है। क्योंकि कांग्रेस में नेता अनेक है।

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