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हुड्डा और कुलदीप की दोस्ती से गरमाएगी हरियाणा की सियासत

Hisar Today

कांग्रेस में भूपेंद्र हुड्डा की कोई काट नहीं है। यह बात हरियाणा के ज्यादातर नागरिकों के साथ खुद कांग्रेस पार्टी के ही अनेकों कार्यकर्ता दबी जुबान में यह बात मानते हैं। ऐसे में कांग्रेस के अंदर और बाहर चर्चा का बाजार गर्म होना इसलिए भी मुमकिन है क्यूंकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने हाल में स्वयं को प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है। गत दिनों प्रेस वार्ता के दौरान पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि वो ही कांग्रेस के भावी मुख्यमंत्री होंगे। प्रश्न ये था कि कांग्रेस की तरफ से प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन होगा। तब भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा था कि वो ही होंगे और कौन हो सकता है। इस घोषणा से प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से सरगर्मी तेज हो गई। कांग्रेस में उनके बराबर का कोई कद्दावर नेता नहीं है जो उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुनौती दे सके। जाट लैंड में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा का पूरा प्रभाव है और वर्तमान में हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस के 14 विधायक उनके साथ खड़े हैं। इसी के चलते पूर्व सीएम हुड्डा ने मुख्यमंत्री के रूप में स्वयं को पेश किया था।

हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा 10 साल तक मुख्यमंत्री के पद पर रहे और दावा किया जा रहा है कि उनके शासनकाल में प्रदेश में चहुंमूखी विकास हुआ है। यही नहीं, हुड्डा की कांग्रेस हाईकमान में भी काफी पहुंच है। उन्हें कांग्रेस का चुनावी घोषणा पत्र निर्माण करने वाली कमेटी में भी शामिल करके उनके महत्व को और बढ़ा दिया है। प्रदेश में जाट मतदाताओं की संख्या काफी होने के कारण किसी जाट नेता को ही मुख्यमंत्री बनाने की कवायद में कांग्रेस हाईकमान प्राथमिकता देगी। प्रदेश में हुड्डा की लोकप्रियता को नकारना उच्चकमान के गले की फांस बन सकता है। वैसे कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला, कुमारी शैलजा, कुलदीप बिश्नोई, कैप्टन अजय यादव, किरण चौधरी भी खुद को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में बता रहे हैं। साथ ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर के समर्थक भी उनको प्रमुख रूप से मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर चुके हैं। वैसे हकीकत तो यह है कि पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा की मतदाताओं में अच्छी खासी पैठ है।

मगर जब हाईकमान ने मुख्यमंत्री की कुर्सी भजनलाल से छीनकर चौ. हुड्‌डा को सौंपी थी तब भी कमोबश यही हालत थे। कांग्रेस में हाईकमान की निर्णय ही अंतिम होता है यह बात हुड्डा से अच्छा कौन जान सकता है। कुलदीप बिश्नोई भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं जो प्यार पहले चौ. भजनलाल और भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा में था वही प्यार अब अशोक तंवर व भूपेन्द्र सिंह हुड्‌डा के बीच है। यदि हाईकमान खुद हुड्‌डा को अपने अलावा किसी और को अपनी पसंद का मुख्यमंत्री चुनने का अवसर दें तो तंवर की बजाय बिश्नोई को तरजीह दे सकते हैं। वैसे पिछली बार केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने से प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार कुछ खिसकता नजर आया लेकिन सरकार की जन विरोधी नीतियों के चलते मतदाता पुन: कांग्रेस से जुड़ने लगे हैं। मतदाताओं को कांग्रेस से जोड़ने में पूर्व सीएम हुड्डा की जनक्रांति यात्रा का प्रमुख रूप से बड़ा योगदान रहा है।

हुड्डा ने अपनी यात्रा के दौरान प्रदेश औऱ आम जन से जुड़े मुद्दे उठाए जिससे आम जनता का झुकाव पार्टी की तरफ बढ़ा है। हुड्डा की लोकप्रियता का इस बात से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौजूदा कांग्रेस विधायकों में से लगभग 14 विधायक उनके खेमे के बताए जाते हैं। यही नहीं, प्रदेश कांग्रेस कमेटी में भी भूपेंद्र समर्थकों का काफी वर्चस्व है। वैसे दूसरी बात यह भी हैं कि भूपेंद्र हुड्डा अनुभवी के साथ 10 साल तक उन्हें सत्ता संभालने का अच्छा खासा अनुभव है। जिस प्रकार से कई विधायक भूपेंद्र हुड्डा के साथ जुड़े है। ऐसे में अगर हुड्डा को पार्टी आलाकमान दावेदारी नहीं सौंपेगी तो पार्टी को भी पता है कि कांग्रेस पार्टी दो फाड़ भी हो सकती है और जीती हुई बाजी कांग्रेस 2019 चुनाव में हार जायेगी। इसलिए पार्टी आलाकमान पूरी कोशिश करेगा की सत्ता की चाबी ऐसे व्यक्ति के हाथ में रहे जिसके दम पर प्रदेश में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ सके।

 

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