संपादकीय

हिसार मेयर चुनाव में हार ने सिखाया सबक “जमीन पर उतर आओ महाशय”

समय बदल चुका है और बदल चुकी है राजनीति। राजनीति में वही नेता बन सकता है जो जनता के बीच और जनता के साथ मिलकर रहे। हिसार के मेयर चुनाव के नतीजों ने उन नेताओं को जरूर सबक सिखा दिया हैं, जिनसे बात करना एक आम आदमी के बस की बात नहीं। हिसार में अब तक अपना मेयर बनाकर कुछ राजनीतिक घरानों ने कठपुतली की तरह उन्हें इस्तेमाल करने वालों को न केवल हिसार की जनता देख चुकी है बल्कि समझ चुकी है कि हिसार का विकास अगर हिसार का वाकई में चाहिए तो यह जातिवाद और घरानेशाही से ऊपर उठ कर जनता के लिए काम करना जरुरी होगा। मगर लगता है कि हिसार के 2 राजनीतिक घरानों को यह बात सीखनी होगी। मेरा यह बात करने का कारण भी है। मैं पत्रकार तो हूं मगर एक हिसार का आम वोटर भी हूं। खैर बात करता हूं मैं मेयर चुनाव की।

इस बार जब हिसार मेयर चुनाव हुए तो मैंने चुनाव के दौरान देखा कि कैसे हिसार के दो राजनीतिक घराने बिश्नोई और जिंदल एकजुट होने का बड़ा बड़ा दावा कर रहे थे, मगर उन दावों पर मुझे संदेह और प्रश्नचिन्ह तब उठा जब मैंने चुनाव में जो भी गतिविधियां देखी। इन सभी घटनाओं को देखकर बार-बार यह सवाल उठ रहा था कि क्या वाकई वह अपने समर्थित मेयर उम्मीदवार को जिताना चाहते थे या हराना ? खुद को एकसाथ बताने वाले यह घराने क्या वाकई एकजुट थे या महज बोलने के लिए ही थे। क्योंकि जिस दिन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने हिसार में सभा ली थी उसी दिन सावित्री जिंदल और रेणुका बिश्नोई ने भी कटला रामलीला मैदान में सभा लेकर यह दिखाने की कोशिश की कि जिंदल और बिश्नोई परिवार एकजुट है। मगर यहां भी एकजुटता की कमी और हिसार में कौन सा घराना किस पर भारी है यह भी दिखाई दिया। इसी आखिरी चुनावी सभा में जो हुआ शायद अगर वो आप भी देखते तो कहते कि रेखा ऐरन को इन दोनों घरानों ने हरा दिया। दरअसल इस आखिरी चुनावी सभा में कांग्रेस नेताओं ने वरिष्ठता के आधार पर सावित्री जिंदल के भाषण को आखिरी रख प्रोटोकॉल तोड़कर विधायक रेणुका बिश्नोई को पहले बुला दिया। बस होना क्या था कि रेणुका बिश्नोई के खास संजय गौतम ने मंच के अनाउंसर को कहा कि पहले सावित्री जी को बुलाओ।

काफी देर तक रेनुका भी अपनी सीट से नहीं उठी। मगर जब सबके सामने नाम की घोषणा हो गयी, तब मजबूरन रेनुका बिश्नोई भाषण देने उठी। उनके आगमन के साथ युवाओं में नारेबाजी के स्वर उठने लगे रेनुका बिश्नोई जिंदाबाद। मगर अगले ही पल जब सावित्री जिंदल भाषण के लिए उठी तो न युवा थे, न नारेबाजी थी। इतना ही नहीं खचाखच लोगों से भरा मैदान और मैदान में रखी कुर्सियां खाली होने लगी। जो जोरदार नारेबाजी और मोबाइल से लाइव रिकॉर्डिंग चल रही थी। वह अचानक सावित्री जिंदल के आने के बाद बंद हो गया। इन कुर्सियों का खाली होना इस बात का सबूत था कि इन दोनों परिवार में मतभेद और मनभेद अभी भी बरकार थे। इतना ही नहीं इन कुर्सियों का खाली होना इस बात का भी सबूत था कि लोग अब जिंदल परिवार को पसंद नहीं करते। यह दुर्भाग्य की बात है मैंने यह भी देखा था कि बूथ की जिम्मेदारी विधायक कुलदीप बिश्नोई के पुत्र भव्य बिश्नोई संभाल रहे थे मगर जब मैं खुद एक मतदान केंद्र में मौजूद था तो माने पाया कि काफी बूथ से तो इन लोगों के कार्यकर्ता ही गायब थे।

प्रचार के लिए तो रेनुका और सावित्री साथ दिखे, मगर कुलदीप बिश्नोई की गैरमौजूदगी इस बात का संकेत दे रही थी कि वह अपने दोस्त गौतम सरदाना के खिलाफ प्रचार में नहीं उतरना चाहते, जिन्होंने खुद पहले 2014 में हजकां पार्टी से विधायक का चुनाव लड़ा था। इतना ही नहीं चुनाव के दिन भी कोई हिसार में ज्यादा दिखाई नहीं दिया तो क्या ऐसे में यह गैरव्यवस्था किसी बात का संकेत दे रही थी कि बाहर कुछ और और अंदर कुछ और चल रहा था। इतना ही नहीं जिस प्रकार गौतम के सहयोग में पूरी भाजपा टीम उनके साथ खड़ी थी, मगर दूसरी तरफ हनुमान ऐरन और रेखा मतदान के दिन अकेले ही अपने दम पर सभी तैयारियों का जायजा ले रहे थे। जबकि न सावित्री जिंदल और न ही रेणुका और न ही भव्य कहीं दिखाई दिए। सबसे गौरतलब बात तो यह है कि जब मतदान सूचि में कुछ गड़बड़ी की बात सामने आई तो “माताजी” ने मीडिया के सामने तो इस गड़बड़ी की बात करते हुए कहा कि मीडिया के जरिये मैं शिकायत कर रही हूं।

मगर लिखित तौर पर चुनाव आयोग को शिकायत देना भी उन्हें गवारा नहीं रहा। क्या सब देखकर लगता नहीं कि चुनाव था या कुछ और। दरअसल आम जनता क्या मीडिया भी जानती है कि चुनाव नजदीक आते ही बिश्नोई परिवार को अपने हलके की याद आ गई। वैसे पुराने जानकारों का मानना है कि स्वर्गीय भजनलाल ने जैसी राजनीति की, वैसी राजनीति बिश्नोई परिवार में नहीं है क्योंकि वो अभी भी जनता से कटे हुए हैं। हिसार में उनका घर है मगर कभी इतने सालों में देखा उन्होंने हिसार की जनता से कितनी बार मुलाकात की। सावित्री जिंदल की बात करें तो उन्होंने जिस प्रकार से मेयर चुनाव में अपनी आखिरी जनसभा में कहा कि रेखा को जिताने के लिए खून का आखिरी कतरा तक लगा दूंगी। यह कहीं न कहीं इस ओर भी इशारा कर रही है कि शायद इस चुनाव में हार-जीत पर सावित्री जिंदल कि राजनीती का आगे का भविष्य टिका था। जो हार के साथ प्रश्चिन्ह में तब्दील हो गया।

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