संपादकीय

हरियाणा में जिस नेता ने छोड़ी मूल पार्टी वो बन गए इतिहास

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हरियाणा का इतिहास है की जिस जिस नेता ने अपनी मूल पार्टी छोड़कर नयी पार्टी बनाई वह कभी भी सफल नहीं हो पाए। वक्त भी गवाह है की हरियाणा निर्माण के बाद जिन भी राजनेताओं ने अपनी मूल राजनीतिक पार्टी छोड़कर अलग पार्टी का गठन किया उनका भविष्य कभी भी सुरक्षित नहीं रहा और नतीजा ऐसा निकला की उन्ही लोगो को दुबारा वापस लौटकर अपनी मूल पार्टी में लौटना पड़ा। यह बात जगजाहिर है की इससे पूर्व में अहीरवाल के कद्दावर कांग्रेसी नेता (स्वर्गीय) राव बीरेंद्र सिंह ने दल बदल करके 24 मार्च 1967 को हरियाणा के मुख्यमंत्री का पद ग्रहण किया था ।उनके इस कदम से हरियाणा को दलबदल का हब कहा जाने लगा। राव बीरेंद्र सिंह ने अपना राजनीतिक भविष्य बचाए रखने के लिए विशाल हरियाणा पार्टी का गठन किया। यह बात किसी से छुपी नहीं है की विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें तथा उनके समर्थकों को वापस 23 सिंतबर 1978 को कांग्रेस में शामिल होना पड़ा।

हरियाणा के विकास पुरूष के रूप में पहचाने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय बंसीलाल ने तीन बार 22 मई 1968, 5 जुलाई 1985 और 11 मई 1996 को मुख्यमंत्री पद संभाला। साथ ही उन्होंने भी कांग्रेस की नीतियों और अपनी उपेक्षा होते देखकर हरियाणा विकास पार्टी का गठन किया। हरियाणा विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से चुनावी गठबंधन करके 11 मई 1996 को मुख्यमंत्री का पद प्राप्त किया लेकिन भाजपा ने बंसीलाल मंत्रिमंडल से समर्थन वापस ले लिया जिसके चलते सरकार अल्पमत में हो गई थी, उस समय कांग्रेस ने उनका समर्थन करके उन्हें कुछ दिन तक मुख्यमंत्री पद संभालने का मौका दिया। कुछ समय बाद कांग्रेस ने भी बंसीलाल में अपना अविश्वास व्यक्त कर दिया जिससे उनकी सरकार गिर गई। इसके बाद अपना और अपने पुत्र सुरेंद्र का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने कांग्रेस का पुन: दामन थाम लिया।

हरियाणा के 3 बार मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय भजनलाल कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में शुमार होते थे। केंद्र में भी उन्होंने कृषि मंत्री के पद पर कार्य किया। भजनलाल ने 29 जून 1979, 22 जनवरी 1980 और 23 जुलाई 1991 को मुख्यमंत्री पद का भार संभाला। भजनलाल के शासन काल में हरियाणा प्रदेश आयाराम गयाराम (दलबदल) के नाम से पूरे विश्व में विख्यात हो गया। केंद्र में जनता दल की सरकार बनने के बाद भजनलाल ने हरियाणा की बागडोर संभाली। केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार गिरने के कारण भजनलाल ने भी दलबदल का सहारा लेकर जनता दल के पूरे विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर पुन: मुख्यमंत्री पद संभाल लिया। भजनलाल और कांग्रेस उच्चकमान के मध्य मदभेद उत्पन्न हो गए और भजनलाल ने अपने समर्थकों सहित 2 दिसंबर 2007 में हरियाणा जनहित कांग्रेस का गठन किया। ट्रैक्टर चुनाव चिन्ह पर हजका ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में अपना भाग्य आजमाया लेकिन अधिक सफलता हाथ नहीं लगी और उनके चुनाव चिन्ह पर विजय प्रताशी दलबदल करके कांग्रेस में शामिल हो गए।

हरियाणा विधानसभा 2014 के चुनाव में हजकां और भाजपा के मध्य चुनावी गठजोड़ सिरे नहीं चढ़ सका और उनकी वार्ता विफल हो गई, जिसके चलते हजकां ने पूरे हरियाणा में अपने चुनाव चिन्ह पर उम्मीदवारों को उतारा लेकिन केवल 2 ही कुलदीप बिश्नोई और रेणुका बिश्नोई विजयी हो सके। इस स्थिति को देखते हुए कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस में हजकां का विलय करने का मन बना लिया और दंपति कांग्रेस में शामिल हो गए। हरियाणा के पूर्व गृहमंत्री गोपाल कांडा ने भी अपने विरूद्ध मुकदमा दर्ज होने के खिलाफ कांग्रेस और तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से विद्रोह करते हुए हरियाणा लोकहित पार्टी का गठन किया और 2014 विधानसभा चुनाव में अपना भाग्य आजमाया। लेकिन उन्हें भी कोई सफलता हाथ नहीं लगी। इसी प्रकार कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री विनोद शर्मा ने भी कांग्रेस की नीतियों से परेशान होकर हरियाणा जन चेतना पार्टी का गठन किया और 2014 के चुनाव में भाग्य आजमाया उनका हाल भी अन्य दलबदल करने वाले नेताओं जैसा हुआ।

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