संपादकीय

हजारों करोड़ के मालिक रामदेव की इस चुनाव में क्यों सील गई जुबान !

Hisar Today

वैसे तो रामदेव योग गुरु हैं लेकिन वो सियासी आसन करना भी बख़ूबी जानते हैं। वक़्त के हिसाब से फिट रहने के लिए कौन सा ‘सियासी’ आसन कब करना है, इसमें उन्हें महारथ हासिल है। पाँच साल पहले जब तमाम राजनीतिक पंडित सीटों के गुणा-भाग में उलझे थे, तब रामदेव खुलकर भाजपा के पक्ष में न केवल खड़े थे, बल्कि चुनावी प्रचार में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। आम चुनावों से लगभग एक साल पहले 31 मार्च 2013 को जयपुर में एक संवाददाता सम्मेलन में रामदेव ने कहा था कि अगर भाजपा को सत्ता में आना है तो उन्हें नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करना चाहिए। रामदेव ने कहा था, “अगर भाजपा अगले लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करती है और अपनी प्राथमिकताएं बदलती है तो उसके लिए कुछ संभावनाएं बनती हैं।”फिर उन्होंने बीजेपी को समर्थन देने के लिए भी उनके नेताओं से कई ‘आसन’ भी करवाए।
नितिन गडकरी ने रामदेव के पैर छूकर आशीर्वाद लिए तो चुनाव से कुछ दिन पहले राजधानी दिल्ली में एक महोत्सव के दौरान नरेंद्र मोदी ने रामदेव के साथ मंच पर हाथ उठाकर गीत गाते नज़र आए। जो नजारा सब ने देखा। फिर मंच से रामदेव ने अपने समर्थकों से ‘मोदी को वोट देने और दूसरों को भी उन्हें ही वोट देने के की अपील की थी। सत्ता में आने के बाद रामदेव को हरियाणा सरकार ने अपना ब्रैंड अंबेसडर बनाते हुए कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया। योग में रामदेव कई आसन करते हैं उसी तरह से राजनीति में भी वो आसन बदलना जानते हैं।
पिछले साल दिसंबर के आखिरी हफ़्ते में मदुरई में उन्होंने कहा कि कुछ नहीं कहा जा सकता कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। (अभी पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आए दो हफ़्ते ही हुए थे, जिसमें भाजपा तीन बड़े राज्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सत्ता से बाहर हो गई थी)
ज़ाहिर है रामदेव अब नब्बे के दशक के सिर्फ़ योग बाबा नहीं रहे, उनका पतंजलि आयुर्वेद का भाजपा के शासनकाल में हज़ारों करोड़ रुपए का कारोबार है।यानी लंबी दाढ़ी और भगवा कपड़ा लपेटे बाबा योगी के अलावा अब अरबपति कारोबारी भी हैं। हरिद्वार से लगभग 25 किलोमीटर दूर रामदेव का साम्राज्य सड़क के दोनों ओर कई एकड़ में फैला हुआ है। स्कूल, अस्पताल, दवा बनाने की फैक्ट्री। ये एक टाउनशिप सी है। मदुरई में उस संवाददाता सम्मेलन में रामदेव ने कहा, “अभी राजनीतिक स्थिति बेहद कठिन है। हम नहीं कह सकते कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा या इस देश का नेतृत्व कौन करेगा। लेकिन, स्थिति बहुत रोचक है।” उन्होंने ये भी कहा कि वो अब ‘सर्वदलीय भी हैं और निर्दलीय’ भी। वैसे आप पाठक इसका मतलब तो भली भांति समझ चुके होंगे।
तो क्या रामदेव ने सियासी आसन का त्याग कर दिया है या फिर बेहद चतुर कारोबारी की तरह बाबा ने समय की नज़ाकत को भांपते हुए ‘न काहू से दोस्ती न काहू से बैर’ वाला फॉर्मूला अख्तियार कर लिया है।
पतंजलि योगपीठ में योग की क्लास लेने के बाद सुबह सात बजे से ही रामदेव के बैठकों के दौर शुरू हो गए। एक वाक्या आपको याद दिला दू कि बाबा ने उनके आश्रम में आये एक पत्रकार को कहा, “आप तो राजनीति पर बात करोगे और मैं अभी इस पर कुछ नहीं बोलूँगा।” तो क्या अब मान लेना चाहिये कि योग गुरु और एक व्यापारी इस बार भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन नहीं कर रहे हैं?
तो ऐसा क्या हो गया जो रामदेव राजनीति से तौबा कर रहे हैं और पाँच साल पहले भाजपा के लिए खुलकर प्रचार करने वाले बाबा को अब चुप्पी साधनी पड़ रही है। जो रामदेव भाजपा का गुणगान करते रहते थे अब वो अचानक इस चुनावी समर में कहां गायब हो गए। वैसे जब मैं राजनीति से जुड़ा कभी लेख लिखती हु तो मुझे यही बात ध्यान में आ जाती है कि इस बारके लोकसभा चुनाव में किसी भगवाधारी और सभी को योग का पाठ पढ़ाने वाले को हम मिस कर रहे है।
वैसे थाली एक हाथ से कभी नहीं बजती। सवाल यह भी उठता है कि आज बाबा रामदेव गायब है और भाजपा भी उनको पूछ नहीं रही , ऐसे में क्या भाजपा के लिए बाबा की ज़रूरत अब ख़त्म हो गई है या फिर बाबा एक कुशल कारोबारी की तरह अपने सभी विकल्प खुले रखना चाहते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार शेखर हम्प्रेस कहते हैं कि बाबा रामदेव ने 2014 में काले धन को लेकर ज़ोर-शोर से अभियान चलाया था और अपने अनुयायियों से ये कहते हुए मोदी को वोट देने को कहा था कि उनकी सरकार विदेशों से काला धन भारत लाएगी, लेकिन मोदी सरकार इस मोर्चे पर ख़ास कुछ नहीं कर सकी। उनकी परेशानी ये है कि वो इस मुद्दे पर अपने अनुयायियों को कैसे समझाएं? वो आगे कहते हैं, “रामदेव के वैदिक शिक्षा बोर्ड के प्रस्ताव को स्वीकार कर भाजपा ने एक तरह से उन्हें मनाने की कोशिश भी की है।” मुंबई के एक और पत्रकार मित्र ने कहा की, “इस बार बाबा के पास मोदी के पक्ष में बात करने के लिए हाई मोरल ग्राउंड नहीं बचा है। काला धन पर कोई काम नहीं हुआ। दूसरे, ये भी लगता है कि रामदेव क्योंकि अब कारोबारी भी हैं, इसलिए अभी के राजनीतिक माहौल को देखते हुए वो कोई साइड नहीं लेना चाहते।”
फिर नोटबंदी और जीएसटी जैसे मोदी सरकार के फ़ैसलों ने कारोबारियों पर असर डाला और रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद भी इनके असर से नहीं बच सकी थी। बता दें कि पतंजलि ने 2018 में आय, मुनाफ़े के आंकड़े तो नहीं दिए, लेकिन कहा कि कंपनी की आय तकरीबन पिछले साल यानी वित्त वर्ष 2017 के बराबर ही रही। वित्त वर्ष 2017 में पतंजलि आयुर्वेद की आमदनी 10,561 करोड़ रुपए थी, जो कि उससे पिछले साल के मुक़ाबले दोगुने से अधिक थी। बालकृष्ण ने माना था कि नोटबंदी और जीएसटी का ‘थोड़ा बहुत असर’ पतंजलि पर भी हुआ है।
हालांकि उनकी दलील थी कि ग्रोथ का आंकड़ा इसलिए कम रहा, क्योंकि पतंजलि का फ़ोकस इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने और सप्लाई चेन खड़ा करने पर था। तो नोटबंदी और जीएसटी जैसे मोदी सरकार के फ़ैसले से बाबा रामदेव खफ़ा हैं। पत्रकार पीएस चौहान कहते हैं, “बाबा ने कभी खुलकर तो इनको (नोटबंदी और जीएसटी) लेकर नाराज़गी नहीं जताई, लेकिन आप आंकड़े देखेंगे तो पता चल जाएगा, तमाम उद्योगो की तरह पतंजलि पर भी इसका असर पड़ा है। कंपनी के विस्तार कार्यों पर असर पड़ा है।”
लेकिन लाखों अनुयायियों का दावा करने वाले रामदेव को इस बार अपने पक्ष में खड़ा करने के लिए बीजेपी ने क्या वाक़ई कोई कोशिश नहीं की। इसका जवाब पत्रकार नागमणि पांडेय देते हैं, “मेरी राय में इसके पीछे पतंजलि के आर्थिक हित हैं। यहां लोकल स्तर की बात करूँ तो भाजपा ने इस बार रामदेव का दरवाज़ा नहीं खटखटाया। उनका प्रत्याशी एक भी बार उनसे मिलने नहीं गए।”
साल 2007 में जब पतंजलि आयुर्वेद की शुरुआत हुई तो किसी ने नहीं सोचा था कि 10 साल में ही ये कंपनी कई उत्पाद श्रेणियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चुनौती पेश करने लगेगी.लेकिन हुआ यही. योग गुरु बाबा रामदेव बैनरों से लेकर टीवी तक कंपनी के उत्पादों का प्रचार कर रहे हैं और उनकी कंपनी अब कई हज़ार करोड़ का साम्राज्य बन चुकी है.
हज़ार करोड़ का साम्राज्य मगर ऐसी संम्पति कब से बढ़नी शुरू हुई आइये डालते है उसी पर एक नजर। 2014 में हुए चुनाव में नरेंद्र मोदी का समर्थन कर पतंजलि ब्रांड में उतरे रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद की कमाई साल 2015-16 में 5 हज़ार करोड़ पर पहुंच गई थी जो उससे पिछले साल की तुलना में 150 फ़ीसदी ज़्यादा मानी जाती है। कंपनी 2016-17 में 10 हज़ार करोड़ कमाई तक पहुंचने का लक्ष्य बना रही है। पांच साल में कंपनी की कमाई में दस गुना से ज़्यादा का उछाल आया है। कामयाबी की इस स्पीड के पीछे पतंजलि आयुर्वेद का विस्तार है। कंपनी देश के कई राज्यों में नए प्लांट और फ़ूड पार्क बना रही है। देश में बाबा रामदेव को कहां-कहां ज़मीन मिली है, जान लीजिए।
पतंजलि आयुर्वेद को असम के तेजपुर में हर्बल और मेगा फ़ूड पार्क के लिए 150 एकड़ ज़मीन दी जा चुकी है। लेकिन इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक बाबा रामदेव ने असम के उद्योग मंत्री चंद्र मोहन पटवारी से मुलाक़ात कर 33 एकड़ ज़मीन और मांगी हैं। 1,200 करोड़ रुपए के इस पार्क में 10 लाख टन सालाना क्षमता की मैन्युफ़ैक्चरिंग इकाई होगी। ये इस साल मार्च में पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाएगी।
उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल नवंबर में पतंजलि आयुर्वेद को ग्रेटर नोएडा में 2,000 करोड़ रुपए का फ़ूड पार्क बनाने की इजाज़त दे दी है और साथ ही यूनिट के लिए यमुना एक्सप्रेसवे पर 450 एकड़ ज़मीन देने पर भी सरकार राज़ी हुई। ऐसा कहा जा रहा है ये इकाई पूरी क्षमता तक पहुंचने के बाद सालाना 25 हज़ार करोड़ रुपए के उत्पाद तैयार करेगी। बात करे शिवराज सिंह चौहान के मध्य प्रदेश ने भी बाबा रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद को अपने यहां खींच लिया है। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक पतंजलि राज्य के धार ज़िले में 500 करोड़ की फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की दिशा में बढ़ रही है। इसके लिए बाबा रामदेव की कंपनी को 400 एकड़ ज़मीन दी जाएगी।
वही इसके अलावा नागपुर में पतंजलि मेगा फ़ूड और हर्बल पार्क की आधारशिला रखी जा चुकी है।

सौजन्य : बीबीसी 

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