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सुप्रीम कोर्ट का आदेश : दागी नेताओं को मिली चुनाव लड़ने की मिली आजादी

Hisar Today

एक तरफ हमारे देश के नेता और मुखिया भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात करते हैं दूसरी तरफ उसी देश में दागी नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट के इंकार ने दुबारा यह साबित कर दिया है कि आखिरकार भारत में अपराधियों की जीत हो ही गई। दरअसल भारत की जनता यह उम्मीद लगाए बैठी थी कि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के साथ अन्य दो जजों की बेंच ऐसा ऐतिहासिक फैसला देगी जिससे भारत वासियों को गर्व हो, मगर जनता के मंसूबो पर पानी तब फिर गया जब जजों ने दागी मंत्रियों को चुनाव लड़ने की अनुमति दी। दरअसल केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि इस समय भारत में विधायकों और सांसदों की कुल संख्या के तिहाई से भी अधिक यानी 36 प्रतिशत के खिलाफ 3,045 आपराधिक मामले चल रहे हैं।

वैसे तो राजनीति के अपराधीकरण को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत बेहद चिंतित है लेकिन इस समस्या से कैसे निपटा जाए, इसके बारे में विभिन्न जजों की अलग-अलग राय है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र और दो अन्य जजों का मानना है कि निर्वाचन आयोग स्वयं यह नियम जोड़ सकता हैं कि आपराधिक मामलों में लिप्त उम्मीदवार को पार्टी का चुनाव चिह्न नहीं दिया जाएगा लेकिन जस्टिस इंदु मल्होत्रा का विचार है कि इस प्रावधान के कारण उम्मीदवारों के खिलाफ अंधाधुंध फर्जी आरोप लगने शुरू हो सकते हैं। उधर केंद्र सरकार का पक्ष रखने वाले एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना है कि न्यायपालिका अपने अधिकारक्षेत्र का अतिक्रमण कर रही है और कानून बनाने के संसद के अधिकार को अपने हाथ में ले रही है।

प्रधान न्यायाधीश का कहना है कि संसद जब तक कानून बनाए, तब तक अदालत हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकती। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि सामाजिक समस्या हो या राजनीतिक समस्या, उसका समाधान अदालतें नहीं कर सकतीं। कानून बनाकर संसद भी उसका समाधान नहीं कर सकती क्योंकि कानून पर अमल भी तभी हो सकता है जब उसे लागू करने वालों में इसके लिए अपेक्षित इच्छाशक्ति हो और कानून पर अमल करने के लिए अनुकूल माहौल भी तैयार किया जाए। संविधान में छुआछूत को गैरकानूनी घोषित किया गया है और सभी नागरिकों को सामान अधिकार दिए गए हैं लेकिन क्या आजादी के 71 साल बाद भी समाज से छुआछूत की बीमारी मिट सकी है और क्या जाति-भेद और जाति-श्रेष्ठता पर आधारित दलित उत्पीड़न समाप्त हो सका है? क्या महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी मिल सकी है और क्या अल्पसंख्यकों को भेदभाव से छुटकारा मिल सका है?

यही बात राजनीति में अपराधियों की भूमिका पर लागू होती है। इन मामले में सबसे पहली जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टियों की है जो चुनाव घोषणापत्रों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का संकल्प व्यक्त करती हैं लेकिन चुनावों में भ्रष्ट उम्मीदवारों को टिकट देती हैं। जब तक कोई नेता दूसरी पार्टी में होता है, तब तक उसके भ्रष्टाचार पर बवाल मचाती है लेकिन उसे अपनी अपनी सदस्यता देने में जरा भी देर नहीं लगाती और सदस्य बनाते ही उसके भ्रष्टाचार को भूल जाती हैं। यही हाल अन्य किस्म के अपराधों के मामले में है। हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर अपराधों के मुकदमे बड़ी संख्या में विधायकों और सांसदों के खिलाफ चल रहे हैं। कानूनन जब तक वे अदालत में अंतिम रूप से दोषी नहीं ठहरा दिए जाते, तब उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता। इस समय लालू प्रसाद यादव ही एक ऐसे नेता हैं जो जेल काट रहे हैं और चुनाव नहीं लड़ सकते।

इस प्रवृत्ति को तभी रोका जा सकता है जब समूचा राजनीतिक वर्ग राजनीति में शुचिता को पुनर्स्थापित करने के लिए कृतसंकल्प हो जाए। वरना गेंद संसद, निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट के पालों में ही घूमती रहेगी। दरअसल कोर्ट ने चुनाव लड़ने से पहले प्रत्येक उम्मीदवार को अपना आपराधिक रिकॉर्ड निर्वाचन आयोग के सामने घोषित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने ये भी कहा है कि राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के संबंध में सभी जानकारी अपनी वेबसाइटों पर डालेंगे। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने मंगलवार को कहा कि उम्मीदवारों को केवल इस आधार पर अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता है क्योंकि उनके खिलाफ आपराधिक मामले में आरोप लगाए गए हैं। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह और गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन द्वारा दायर की गई जनहित याचिका पर ये फैसला दिया है।

पांच जजों की बेंच में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस आरएफ नारिमन, जस्टिस एएम खान्विल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूण और जस्टिस इंदू मल्होत्रा शामिल थे। पीठ ने ये भी कहा कि चुनाव लड़ने से पहले प्रत्येक उम्मीदवार अपना आपराधिक रिकॉर्ड निर्वाचन आयोग के समक्ष घोषित करे। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों को अपने उम्मीदवारों का रिकॉर्ड जानने का अधिकार है। 2011 में दायर अपनी याचिका में गैर-सरकारी संस्था ने मांग की थी कि राजनीति के आपराधिकरण से बचने के लिए एक दिशा-निर्देश तैयार किया जाना चाहिए और जो भी उम्मीदवार गंभीर मामलों में आरोपी हैं, उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। शुरुआत में ये मामला तीन जजों की बेंच के पास गया था, जिनकों ये देखना था कि क्या अनुच्छेद 102(अ) से (ड) और अनुच्छेद 120(ई) के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानून के दायरे से बाहर निकलकर कोर्ट द्वारा किसी को अयोग्य घोषित किया जा सकता है?

केंद्र सरकार ने इस मामले में कोर्ट से कहा कि जो सवाल तीन जजों की बेंच के सामने रखा गया है, उसका जवाब मनोज नरूला बनाम भारत संघ मामले में पांच जजों की संविधान पीठ ने दिया है। हालांकि कोर्ट इस बात से संतुष्ट नहीं हुई और फिर इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास हस्तांतरित किया गया। इससे पहले राजनीति के अापराधीकरण को ‘सड़न’ करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह चुनाव आयोग को राजनीतिक पार्टियों से यह कहने का निर्देश देने पर विचार कर सकता है कि उनके सदस्य अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का खुलासा करें ताकि मतदाता जान सकें कि ऐसी पार्टियों में कितने ‘कथित बदमाश’ हैं।

अपने इस फैसले में कोर्ट ने कहा है कि राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के संबंध में सभी जानकारी अपनी वेबसाइटों पर डालेंगे। सुप्रीम कोर्ट के वकील ललित उपाध्याय ने कहा, ‘हमने ये मांग किया था कि जिन उम्मीदवार के खिलाफ गंभीर आरोप हैं, उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए। इस पर कोर्ट ने संसद को निर्देश दिया है कि वे कानून बनाएं जिससे राजनीति में आपराधिकरण को रोका जा सके। ‘वहीं फैसला पढ़ते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, ‘संसद को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अपराधी राजनीति में न आए।

आपराधिक आरोप वाले राजनीतिक नेताओं पर कोई रोक नहीं, कानून बनाने के लिए संसद है।’ इस पीठ में जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा भी शामिल थे। न्यायालय ने यह भी कहा कि सभी राजनीतिक दलों से जुड़े उम्मीदवारों के रिकॉर्ड का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से गहन प्रचार किया जाना चाहिए। निर्देश देते हुए न्यायालय ने कहा कि किसी मामले में जानकारी प्राप्त होने के बाद उस पर फैसला लेना लोकतंत्र की नींव है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का आपराधीकरण चिंतित करने वाला है।

इस निर्णय के साथ कोर्ट के फैसले को ट्विटर यूजर्स अपराधियों की जीत बता रहे हैं। अदालत के फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है। एक ओर ट्विटर यूजर्स अदालत के फैसले को सही ठहरा रहे हैं तो कुछ यूजर्स इसे अपराधियों की जीत करार दे रहे हैं। एक ट्विटर यूजर दिब्येंदु कर्माकर ने लिखा, ‘अजब देश की गजब कहानी। देश की आजादी के 71 वर्षों बाद क्या यही न्याय है। आखिरकार भ्रष्ट, अपराधी, चोर, डकैत, हत्यारे नेता जीत गए।’

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