राजनीतिसंपादकीय

सिरसा लोकसभा सीट पर इनेलो की स्थिति मजबूत

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सिरसा हरियाणा का सबसे रोमांचक चुनावी लड़ने वाला लोकसभा क्षेत्र। हरियाणा की कुल 10 लोकसभा सीटो में से जो दो सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित की गई हैं उनमें से एक सीट है ‘सिरसा’। यूं तो सिरसा लोकसभा सीट जाट बहुल मतदाताओं वाली सीट मानी जाती है, लेकिन स्पैशल दर्जे की वजह से कभी भी कोई भी जाट यहां से चुनाव नहीं लड़ पाया। सिरसा सीट का गठन 1962 में हुआ था। साल 1952 में हुए प्रथम लोकसभा चुनावों से लेकर 1961 तक इस सीट का कोई अस्तित्व ही नहीं था। सिरसा एक ऐसा लोकसभा मतदार संघ हैं जो पंजाब और राजस्थान से सटा है। तीन जिलों के मतदाता भी इससे जुड़े हैं। यह एकमात्र सीट है जो सिख, बागड़ी व देसवाली बेल्ट तक फैली है। इतना ही नहीं सिरसा इनेलो सुप्रीमो औमप्रकाश चौटाला का घर होने के नाते उनका गृह क्षेत्र भी हैं।

यह सीट शुरू में ही आरक्षित कर दी गई थी और तभी से इसका आरक्षित दर्जा अभी भी बदस्तूर जारी है। तीसरी लोकसभा के लिए 1962 में हुए चुनावों में यहां से अनुसूचित जाति के कांग्रेसी उम्मीदवार दलजीत सिंह विजयी हुए थे। यहां से ज्यादातर अनुसूचित जाति के उम्मीदवार ही संसद में पहुंचते रहे हैं, किंतु 1998 और 1999 में यहां से धानक जाति के उम्मीदवार डा. सुशील इंदौरा (इनेलो प्रत्याशी) को भी जीत मिली थी। गौरतलब है कि साढ़े सोलह लाख से अधिक मतदाताओं वाली यह लोकसभा सीट भी नौ विधान सभा क्षेत्रों को मिला कर गठित की गई है।

सिरसा लोकसभा क्षेत्र की एक खास बात यह है कि यह तीन जिलों सिरसा, फतेहाबाद और जींद तक फैली हुई है। इनमें से छह विधानसभा क्षेत्र -रतिया, कालांवाली, डबवाली, सिरसा, रानियां और एेलनाबाद तो सिरसा जिले के अंतर्गत ही आते हैं, जबकि टोहाना व फतेहाबाद की दो सीटें जिला फतेहाबाद में पड़ती हैं । नौंवी सीट नरवाना की है, जो कि जिला जींद का हिस्सा है, लेकिन लोकसभा में यह सिरसा के साथ जुड़ी हुई है। एक उल्लेखनीय बात यह है कि हरियाणा की यह इकलौती लोकसभा सीट है जिसके नौ में से तीन विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं।

जातीय समीकरणों के हिसाब से सिरसा में सर्वाधिक संख्या जाटों की है। जाट वोट 3,30,000 हैं। यदि इसमें जाट सिक्ख और सिक्खों के 1,78,000 वोट भी शामिल कर लिए जायें तो इनकी तादाद पांच लाख से ज्यादा होती है। इसके बाद ज्यादा संख्या अनुसूचित जाति के वोटों की है। इनमें 1,53,000 अनुसूचित, 50,000 बाल्मिकी और 42,000 धानक शामिल हैं। पंजाबी अरोड़ा मतदाताओं की संख्या भी लगभग एक लाख है। इनके अलावा वैश्य/बनिया 90,000, कुम्हार 74,000, मजहबी 59,000, खाती व लुहार 54,000, ब्राह्मण 50,000, बिश्नोई 44,000, नायक/नाई 43,000, ओड़ 34,000, रॉय सिक्ख 30,000, सैनी 25,000 ,बावरिया 18,000, सुनार 15,000, गुर्जर 9,000 तथा अन्य जातियों के 1,50,000 मतदाता हैं ।

मुख्य विपक्षी दल इनेलो को यहां 1989, 1999, 2004 व 2014 में विजय का स्वाद चखने का मौका मिला, लेकिन 1989 व 1999 में तो उसे जीत तब मिली थी जब उसका बीजेपी से गठबंधन था, जबकि 1998 मे इनलो का बसपा के साथ समझैता था। इनेलो पार्टी को खुद के बलबूते सिर्फ 2014 में ही जीत हासिल हुई। जहां तक 2019 के लोकसभा चुनाव का सवाल है, यह तय है कि अगली बार भी सिरसा में मुख्य मुकाबला इनेलो और कांग्रेस पार्टी के बीच ही होगा। इनेलो को इस बार जाट व जट सिक्ख मतदाताओं के साथ साथ बसपा के साथ गठबंधन की वजह से बड़ी संख्या में दलित वोट भी मिलने की उम्मीद है। अभी तक के संकेत बताते हैं कि इनेलो इस बार भी चरणजीत रोड़ी पर ही दांव लगाएगा, जो कि चौटाला परिवार के वफादार भी हैं और किसी तरह के विवादों के शिकार भी नहीं हैं।

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