टुडे न्यूज़संपादकीय

सिरसा लोकसभा सीट असली लड़ाई इनेलो और कांग्रेस के बीच

Hisar Today

हरियाणा की 10 लोकसभा सीटों में से एक ‘सिरसा’ अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित है। यह एकमात्र सीट है जो सिख, बागड़ी व देसवाली बेल्ट तक फैली है। यह सीट हरियाणा राज्य बनते ही सुरिक्षत कर दी गई थी और तभी से इसका आरक्षित दर्जा अभी भी बदस्तूर जारी है। गौरतलब है कि साढ़े सोलह लाख से अधिक मतदाताओं वाली यह लोकसभा सीट भी नौ विधानसभा क्षेत्रों को मिला कर गठित की गई है। सिरसा लोकसभा क्षेत्र की एक खास बात यह है कि यह तीन जिलों सिरसा, फतेहाबाद और जींद तक फैली हुई है। इनमें से छह विधानसभा क्षेत्र – रतिया, कालांवाली, डबवाली, सिरसा, रानियां और एेलनाबाद तो सिरसा जिले के अंतर्गत आते हैं, जबकि टोहाना व फतेहाबाद की दो सीटें जिला फतेहाबाद में पड़ती हैं। नौंवी सीट नरवाना की है, जो कि जिला जींद का हिस्सा है।

इस लोकसभा सीट पर अभी तक कांग्रेस ने अपने पत्ते साफ नहीं किये हैं, आखिर 2019 में यहां से किसे मैदान में वह उतारेगी। वैसे तो राजनैतिक पंडितों का मानना है कांग्रेस पार्टी आलाकमान को यहां से अशोक तंवर को ही चुनावी मैदान में उतरना चाहिए। लेकिन यदि कांग्रेस उन्हें विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करती है तो, उस स्थिति में तंवर का लोकसभा चुनाव लड़ना मुश्किल हो जाएगा। ऐसी स्थिति आने पर अशोक तंवर अपने स्थान पर अपनी पत्नी अवंतिका तंवर का नाम लोकसभा चुनाव में आगे बढ़ा सकते हैं।

वैसे एक चर्चा यह भी है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा जो इस सीट से(1991-1996 और 1996 -1998) दो बार जीत कर आई थीं, वह दुबारा इसी सीट पर भाग्य आजमाने के लिए फिर से तैयार हैं। कांग्रेस पार्टी आलाकमान से शैलजा के दशकों पुराने पारिवारिक ताल्लुकात आज भी हैं। सोनिया गांधी से अच्छे रिश्ते, सुशिक्षित व अनुसूचित मजबूत चेहरा है व गाहे बगाहे नॉन जाट सीएम की बात चलती है तो शैलजा का नाम भी इस चर्चा में शामिल रहता है। इसलिए कुमारी शैलजा को टिकट मिलने में कोई परेशानी होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसके बारे में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि बीजेपी ने इस सीट को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया। यहां भी हिसार कि भांति भाजपा ने यह सीट अधिकतर अपने गठबंधन सहयोगियों के लिए छोड़ती रही है। इसलिए इस क्षेत्र में भाजपा का जनाधारा नहीं बन पाया, जो कि किसी राजनैतिक दल के लिए बहुत जरूरी होता है। पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा ने इस सीट पर चुनाव ही नहीं लड़ा। 2014 में पार्टी ने हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठबंधन करके यह सीट उसके लिए छोड़ दी थी जबकि 2009 में इनेलो के लिए यह सीट छोड़ी थी।

इससे पहले भाजपा ने इस सीट पर 2004 में चुनाव लड़ा था और उसके प्रत्याशी महाबीर प्रसाद ने 13.68 फीसदी वोट हासिल किये थे।भाजपा ने 1998 में हंसराज को यहां से पार्टी का टिकट दिया था और तब उसे मात्र 25.24 फीसदी वोट मिले थे, जबकि 1996 में भी हंसराज ने ही चुनाव लड़ा था और 23.77 फीसदी वोट लिये थे। वर्ष 1991 में भाजपा ने यहां पर प्यारेलाल को आजमाया था और मात्र 6.54 फीसदी वोट से ही बीजेपी को संतोष करना पड़ा था। अब 2019 चुनाव भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भाजपा यहां से किसे मौका देगी? किसे उतारेगी? इसके बारे में फिल्हाल कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

भाजपा के लिए यहां से चुनाव जितना मुश्किल हैं। एक तो काबिल उम्मीदवार नहीं, दूसरा ‘डेरा सच्चा सौदा’ मामले में भाजपा कि कार्यवाई का असर इन चुनावों में साफ दिखाई देगा, क्यूंकि इस बार डेरा सच्चे सौदा के अनुयायी चुनावों में भाजपा को करारा सबक सिखाने में कोई कसर नही छोड़ेंगे।
बहरहाल, समीकरणों के हिसाब से भाजपा के लिए यह सीट बेहद चुनौती पूर्ण या यूं कहे इसे जितना उनके लिए न के बराबर है। वहीं कांग्रेस की यहां स्थिति भाजपा की तुलना में बेहद मजबूत है।

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