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सर छोटूराम प्रतिमा का मुद्दा उठाकर सांसद दुष्यंत चौटाला के ‘एक तीर से दो निशाने’

Hisar Today

रोहतक स्थित सांपला गांव में इनेलो युवा नेता सांसद दुष्यंत चौटाला का आगाज पहले कभी इतना व्यापक न था। क्या दुष्यंत की आवाज की गर्जना भाजपा को उनकी ललकार तो नहीं, जो कह रही हो कि “बीजेपी तैयार हो जाओ इनेलो तैयार है”। क्या दुष्यंत का यह आगाज 2019 के चुनाव की झलक मात्र तो नहीं? क्या यह बीरेंद्र सिंह के लिए खतरे की घंटी तो नहीं ?दरअसल आज इनेलो और भाजपा के बीच सर छोटूराम को लेकर चल रहा टकराव न केवल विरासत को हथियाने की जंग है, बल्कि यह मुद्दा इनेलो और भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का भी विषय है। 2004 में चौधरी ओमप्रकाश चौटाला ने सर छोटूराम का संग्रहालय बनवाकर उनकी प्रतिमा का निर्माण करवाकर उसका शिलान्यास स्थापित किया था। मगर 2014 के उपरांत भाजपा में रहते हुए बीरेंद्र सिंह और भाजपा पार्टी ने अपनी सियासत चमकाने के लिए सर छोटूराम के नाम पर राजनीित करते हुए उनकी पुरानी प्रतिमा को हटाकर नई प्रतिमा का निर्माण करवाकर एक नया राजनीित दांव खेला।

कहते हैं यही दांव इनेलो और बीजेपी के बीच की सियासत की असली जंग की शुरुवात थी। इनेलो सूत्रों के अनुसार सर छोटूराम के नाम पर भाजपा ने अपनी राजनीित चमकाने के चक्कर में उनकी प्रतिमा वहां से उठाकर गर्ल्स कॉलेज में स्थापित कर दी, और चौधरी ओमप्रकाश चौटाला केे नाम का शिलान्यास का पत्थर टूटा और दूर फेंका पाया गया। इनेलो ने इस अपमान के लिए भाजपा को आड़े हाथों लेना शुरू किया। यहीं से शुरू हुआ टकराव। आज इनेलो और भाजपा के बीच सियासी जंग का कारण बन गया है।

सांसद दुष्यंत चौटाला ने सर छोटूराम के नाम पर दशकों से सियासत करने वाले बीरेंदर सिंह को भी इस मुद्दे पर कटघरे में खड़ा कर दिया। दुष्यंत ने सवाल किया है कि जब 2004 में संग्रहालय और प्रतिमा बनी थी, तो भाजपा ने उसे हटाकर वहां दौबारा क्यों बनाया? अगर बीजेपी ने इसे बनाया भी तो आखिर 9 महीनों तक सर छोटूराम की प्रतिमा बनने के बाद भी उनका अनावरण क्यों नहीं किया गया? दुष्यंत ने भाजपा के नेताओं, मुख्यमंत्री और खासकर बीरेंद्र सिंह को आड़े हाथों लेते हुए यह सवाल किया कि आखिर क्यों प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी के हाथों उद्घाटन करवाने के इंतजार में सर छोटूराम की प्रतिमा के साथ अपमान किया जा रहा है।

दीनबंधु सर छोटूराम का नाम लेते हुए उनका प्रभाव बड़ी संख्या में जाट वोटरों पर आज भी है। और इनेलो के लिए भी जाट मतदाता उनकी ताकत रहेे हंै। ऐसे में दीनबंधु सर छोटूराम का मुद्दा उनके लिए इक तीर से दो निशाने लगाने जैसा है। न केवल दीनबंधु सर छोटूराम का प्रभाव जिन जाट मतदाताओं पर है उनका विश्वास जीतना और बीरेंद्र सिंह के बहाने भाजपा से जाट मतों को तोडना।
दरअसल सर छोटूराम प्रतिमा का मामला भी दुष्यंत ने तब उठाया जब सत्ताधारी भाजपा पार्टी में खुद सर छोटूराम की विरासत संभालने वाले उनके ही परिवार के सदस्य बीरेंद्र सिंह पार्टी में मौजूद हैं। यह बड़ी ही अपमानजनक और हैरत की बात है कि सर छोटूराम के नाम पर वर्षों से अपनी सियासत की रोटियां सेकने वाले बीरेंदर सिंह। आज खुद सत्ताधारी बीजेपी पार्टी में होते हुए भी अपने नाना को यथोचित सम्मान नहीं दिला पाए। ऐसा आरोप है कि 9 महीनों से उनके नाना सर छोटूराम की प्रतिमा तैयार होकर धूल चाट रही है और बीरेंद्र शांत होकर तमाशा देख रहे हैं।

बीरेंद्र सिंह के बर्ताव से ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा पार्टी में सत्ते के नशे में रहते हुए उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि जिनके नाम से उनकी सियासत चल रही है उनको यथोचित मान दिलाये। अगर वह चाहते तो अपने पद से त्याग पत्र देकर या पार्टी में रहते हुए भी सर छोटूराम को सम्मान दिलाने की जद्दोजहद में विशाल आंदोलन छेड़ते और अपने नाना को सम्मान देने का प्रयास करते। मगर बीरेंद्र सिंह ने ऐसा नहीं किया। वह जगह-जगह भाषण देते तो दिखाई दिए, सर छोटूराम के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने की बातें करते तो दिखाई दिए। मगर आज दुष्यंत के आंदोलन ने हरियाणा की राजनीति को एक अलग मोड़ में लाने कि कोशिश कर दी है। मगर ऐसा प्रतीत होता है बीरेंद्र सिंह को प्रतिमा की नहीं बल्कि प्रतिमा का उद्घाटन जिनके हाथो होना है, उसकी ज्यादा फिक्र है। क्योंकि बीरेंद्र सिंह को ऐसा लगता है बड़े हाथों से शुभारंभ होगा तो उनकी राजनीति दुबारा चमकेगी।

मगर दुष्यंत चौटाला ने बीरेंद्र सिंह को क्लीन बोल्ड करते हुए सर छोटूराम के नाम पर 2019 की सियासी बिसात को लिखने का पहला अध्याय शुरू कर दिया है। दुष्यंत ने अप्रत्यक्ष तौर पर बीरेंद्र सिंह के बहाने भाजपा को टारगेट किया है। दुष्यंत का आंदोलन एक शक्ति प्रदर्शन ही नहीं बल्कि खुद को बतौर मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने का जरिया भी था। जहां पर उन्होंने “एक तीर से दो निशाने लगाए” पहला चौधरी ओमप्रकाश चौटाला के शिलान्यास के पत्थर को उचित सम्मान के साथ सर छोटूराम की प्रतिमा के पास लगाकर उनको मान देना और इनेलो कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करना तो वही दूसरी तरफ सर छोटूराम को उचित सम्मान देने का मुद्दा उठाकर भाजपा की छवि धूमिल कर उनके गढ़ में सेंध लगाना। सर छोटूराम की विरासत को हथियाने के पीछे भाजपा और इनेलो का यह दांव क्या 2019 चुनाव में मददगार साबित होगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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