राष्ट्रीयसंपादकीय

समाज में बढ़ने लगा है बेटियों को गोद लेने का रुझान

राजस्थान में झुंझुनू जिले के जिले के मुकुंदगढ़ के घोड़ीवारा बालाजी मंदिर के बाहर सर्द रात में एक नवजात बच्ची लावारिस हालत में मिली। रात को करीब दो बजे मंदिर के चौकीदार को एक बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी। उसने बाहर आकर देखा तो मंदिर के बाहर बनी प्याऊ के पास एक नवजात बच्ची दो कंबलों में लिपटी हुई थी और रो रही थी।
चौकीदार के साथ आस-पड़ोस के लोग बच्ची को लेकर मुकुंदगढ़ के सरकारी अस्पताल पहुंचे, जहां से बच्ची को झुंझुनू के बीडीके अस्पताल रेफर किया गया। फिलहाल बच्ची झुंझुनू के बीडीके अस्पताल में भर्ती है जिसकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है। नवजात बच्ची का वजन करीब तीन किलो है। संभावना जताई जा रही है कि बच्ची को पैदा होने के चार से पांच घंटे बाद ही सर्द रात में छोड़ दिया गया है। उस रात को क्षेत्र का तापमान 6.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। बच्ची का इलाज कर रहे शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ वीडी बाजिया ने बताया कि बच्ची को जन्म के चार से पांच घंटे बाद ही लावारिस छोड़ा गया है और डिलवरी भी प्रशिक्षित चिकित्सा स्टाफ व चिकित्सक द्वारा कराए जाने की बेहद कम संभावना है।
चाहे छह डिग्री की ठंड में मां ने बच्ची को छोड़ दिया हो लेकिन बीडीके अस्पताल के स्टाफ ने अपना नाता बच्ची के साथ जोड़ लिया है। ना केवल उसकी देखभाल के लिए एक विशेष टीम लगाई गई है बल्कि बच्ची के नामकरण से लेकर उसकी देखभाल करने तक की प्लानिंग की जा रही है। बच्ची को अस्पताल में ही नाम देकर पूरी तरह स्वस्थ किया जाएगा और फिर जयपुर भेजा जाएगा। इधर बच्ची को गोद लेने वालों के भी फोन बजने लगे हैं। चिकित्सकों के अलावा मीडियाकर्मियों के पास ऐसे एक दर्जन से अधिक लोगों के फोन आए हैं, जिन्होंने बच्ची को गोद लेने की मंशा जाहिर की है लेकिन केंद्र सरकार के नए नियम-कानून के मुताबिक अब बच्ची को गोद लेने के लिए केंद्रीय दत्तक ग्रहण एजेंसी को आवेदन करना होगा और इसके बाद ही बच्ची को गोद लिया जा सकेगा।
झुंझुनू जिले के ही भानीपुरा गांव में कुछ माह पहले एक नवजात बच्ची को कोई शिव मंदिर के बाहर चबूतरे पर छोड़ गया। सुबह मंदिर के पुजारी को यह बच्ची मिली। पुलिस की सहायता से उस बच्ची को झुंझुनू के बीडीके अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बीडीके अस्पताल के स्टाफ ने बच्ची को लक्ष्मी नाम दिया।
बुहाना की सुनीता का नवजात बेटा भी अस्पताल में भर्ती था। उसे दूध पीने में तकलीफ थी। सुनीता ने बताया उसके तीन बेटे हैं, बेटी चाहती थी लेकिन चौथा भी बेटा हो गया। अस्पताल में लक्ष्मी के बारे में सुना तो उसे ही बेटी मान उसे अपना दूध पिलाया। सुनीता ने कहा कि मैं तो चाहती थी कि लक्ष्मी मुझे ही मिल जाए। उस वक्त सुनीता सहित सात-आठ दम्पतियों ने अस्पताल में लक्ष्मी को गोद लेने की इच्छा जताई थी।
मुरादाबाद से करीब 15 किलोमीटर दूर झाडि़य़ों में किसी बच्चे की रोने की आवाज सुनकर गांव में रहने वाली जायदा वहां पहुंची तो देखा कि एक मासूम जोर-जोर से रो रही है। जायदा ने बच्ची को उठाया और गांव की शब्बो को साथ बच्ची को लेकर पुलिस थाने पहुंची। पुलिस वालों से शब्बो ने कहा कि बच्ची को उसको दे दें। लेकिन पुलिस ने मना कर दिया। बच्ची को बाल कल्याण समिति मुरादाबाद को सौंप दिया गया था। जहां बच्ची को गोद लेने 250 से ज्यादा लोगो ने इच्छा जतायी।
हरियाणा में बेटियों के प्रति सोच मे बदलाव आ रहा है। इसके साथ बदल रही है लोगों की सोच और बेटियों के प्रति नजरिया। वह भी ऐसे समाज के लोगों का जहां बेटों की चाह में बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है। इस माहौल के बीच सोच में बदलाव की रोशनी भी दिख रही है। हरियाणा में एक दम्पती ने बेटा पैदा होने पर उसे अन्य दम्पती को गोद दे दिया और उनकी बेटी को अपना लिया।
हिसार जिले के किरढान गांव के अनूप सिंह और उनकी पत्नी सीता ने अपने नवजात बेटे को किसी और दम्पती को गोद दे दिया और उनकी बेटी को गोद ले लिया। इस दम्पती ने बेटी की चाह में दूसरे बच्चे को जन्म देने का फैसला लिया। लेकिन इसे बेटा ही पैदा हुआ। इसके बाद इस दम्पती ने मिसाल कायम करते हुए अपने नवजात बेटे के बदले बेटी गोद ले ली। उनका बेटा जिनकी गोद में गया है उनकी भी चाहत पूरी हो गई। दूसरा परिवार हिसार के गांव किशनगढ़ का रहने वाला है। दोनों परिवार में आपस में पहले से कोई रिश्तेदारी व जान-पहचान नहीं थी। अस्पताल में ही दोनों परिवारों का परिचय हुआ। मगर आज दोनों परिवारों के बीच गहरा रिश्ता कायम हो गया है।
उपरोक्त उदाहरण इस बात को दर्शाते हैं कि आज लोगो की सोच में तेजी से बदलाव आ रहा है। बेटी बचाओ और देश बचाओ वाले नारे पर लोग अब अमल करने लगे हैं जिस कारण देश में अब बेटी को गोद लेने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। भारतीय समाज में लड़कियों को लडक़ों के मुकाबले कम तरजीह दी जाती है। लेकिन गोद लेने के मामले में भारतीय परिवार लड़कियों को तवज्जो देते नजर आते हैं। सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (कारा) में इस बात का खुलासा हुआ है कि देश में अब लोग नई सोच के तहत बेटों के बजाय बेटी को गोद ले रहे है। इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि आंकड़ें बताते हैं कि पिछले छह सालों में जितने बच्चे गोद लिए गए हैं, उनमें तकरीबन 60 फीसदी लड़कियां है। रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा बच्चे महाराष्ट्र में गोद लिए गए।
बच्चियों को गोद लेने के मामले में महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक का स्थान आता है। कर्नाटक में कुल 286 बच्चे गोद लिए गए इसमें 167 लड़कियां थीं। कर्नाटक के बाद तीसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल का नाम आता है। कारा के मुताबिक महाराष्ट्र बच्चियों को गोद लेने के मामले में सिर्फ इसलिए आगे नहीं है क्योंकि यह राज्य बड़ा है, बल्कि इसका एक बड़ा कारण राज्य में अधिक गोद देने वाली संस्थाओं का होना भी है। इसके पीछे लोगों का मानना है कि लड़कियों को पालन-पोषण करना केवल कत्र्तव्य ही नहीं होती बल्कि इसके पीछे श्रद्धा और संस्कार भी होते हैं। वैसे भी समाज में कम हो रही लड़कियों की संख्या की पूर्ति के लिए लोगों की ओर से उठाया गया यह कदम बेहद सराहनीय है।
रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सालों में विदेशी परिवारों ने भी भारतीय बच्चों को बड़ी संख्या में गोद लिया है। साल 2017-18 में करीब 651 बच्चों को विदेशी परिवारों ने गोद लिया था। अधिकतर परिवार अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन आदि देशों से थे। अब समाज में लड़कियों को लेकर नजरिया बदल रहा है। लोगों को लगने लगा है कि बच्चियों को संभालना ज्यादा आसान है। इन आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरीखे राज्यों के भी परिवार लड़कियों को गोद लेना अधिक पसंद करते हैं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पुरुषों और महिलाओं के सेक्स अनुपात में एक बड़ी खाई है।
वैसे देखा जाय तो बेटी बचाओ बेटी पढाओ कोई एक योजना नही यह समय के मांग की जरूरत है। अगर समाज में बेटियों को भी उचित शिक्षा और सम्मान मिले तो कभी भी ये बेटिया भी किसी भी क्षेत्र में पीछे नही रहती है। इसलिए यदि यह कहा जाय की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना नही हम सबकी एक जिम्मेदारी है तो इसमें कोई गलत नही है। यदि हम सभी एक अच्छे समाज का निर्माण करना चाहते है तो हम सबका यही फर्ज बनता है हम इन बेटियों को भी पढ़ाये। उन्हें इतना सशक्त बनाये की खुद गर्व से कह सके की देखो वह हमारी बेटी है जो इतना बड़ा काम कर रही है। वह खुद को गौरवान्वित करने वाली बात होंगी।
साक्षरता की दृष्टि से अग्रणीय झुंझुनू जैसे जिले में जहां एक तरफ बेटी को जन्मते ही मरने के लिये लावारिश छोड़ दिया जाता है वहीं झुंझुनू जिले की मोहना सिंह व प्रिया शर्मा जैसी बेटियां भी है जो आज देश में फाईटर प्लेन उड़ा कर जिले का पूरे देश में मान बढ़ा रही हैं। देश में बदलते समय के साथ लोगों का बेटियों के प्रति नजरिया भी बदलने लगा है। बेटियो को अब बोझ नहीं समझा जाता है। राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र के झुंझुनू, सीकर, चूरू सहित अन्य कई जिलो में बेटियों की शादी के समय बेटो की तरह घोड़ी पर बैठा कर निकासी (बिंदौरी) भी निकाली जाने लगी है जो समाज में बेटियों के बढ़ते मान का द्योतक है। बहरहाल बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान में राष्ट्र स्तर पर नाम कमाने वाले झुंझुनू जिले में इस तरह की घटनाएं लोगों की सोच पर सवाल जरूर खड़ा करती है।

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