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सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति के बाद भी विवाद जारी

Hisar Today

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की इजाज़त भले ही दे दी हो, लेकिन केरल में एक तबका ऐसा भी है जो इस फ़ैसले की राह में दीवार खड़ी करता हुआ दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया था। संवैधानिक बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि संविधान के मुताबिक़ हर किसी को, बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए। देश भर में युवा महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत भी किया। इसके बाद अब 17 अक्टूबर को देश के अलग-अलग हिस्सों से महिलाएं मंदिर के दर्शन के लिए पहुंच रही हैं। लेकिन बीजेपी समर्थित महिलाओं के समूह ने अपने विरोध प्रदर्शन के तहत सबरीमला मंदिर तक जाने वाले रास्ते पर आ रही गाड़ियों को रोककर चेक करना शुरू कर दिया है।

भगवान अयप्पा से जुड़े नारे लगाती हुईं ये महिलाएं गाड़ियों की तलाशी ले रही हैं ताकि 10 से 50 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को मंदिर की ओर जाने से रोका जा सके। वहीं, मंदिर के नज़दीकी गांव नीलाकल में लगभग 100 महिलाओं-पुरुषों का जमावड़ा लगा हुआ है जो इस विरोध प्रदर्शन से हटने का नाम नहीं ले रहा। केरल के इस प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर के कपाट खुलने का समय जैसे-जैसे करीब आ रहा है तनाव यहां और बढ़ता जा रहा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद यहां महिलाओं को प्रवेश नहीं देने की कोशिश की जा रही है। वहीं, स्वामी अयप्पा के दर्शन के लिए महिला श्रद्धालु जुटने लगीं हैं। सबरीमाला मंदिर में सभी लड़कियों और महिलाओं को प्रवेश की इजाजत देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से मंदिर के द्वार आज खुलने जा रहे हैं। इस बीच, भगवान अयप्पा की सैकड़ों महिला भक्तों ने निलक्कल में कई वाहनों को रोककर चेक किया। इस दौरान वे मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं को आगे जाने से रोक दिया गया। इसके बाद तनाव और बढ़ गया है। मंदिर परिसर से करीब 20 किलोमीटर दूर निलक्कल बेस कैंप में भगवान अयप्पा के बहुत सारे भक्त ठहरे हुए हैं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकने की सदियों पुरानी परंपरा को गलत बताते हुए उसे खत्म कर दिया था और सभी आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश करने की इजाजत दी थी। उस आदेश के बाद से बुधवार 17 अक्टूबर को शाम पांच बजे पहली बार मंदिर के द्वार खुले।

वहीं, हालात को सुलझाने के लिए त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड (टीडीबी) की आखिरी कोशिश बेकार रही, जहां पंडालम शाही परिवार और अन्य पक्षकार इस मामले में बुलाई गई बैठक को मंगलवार को छोड़कर चले गए। शीर्ष अदालत के आदेश के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने के मुद्दे पर बातचीत करने में बोर्ड की अनिच्छा से ये लोग निराश दिखे।
इस बीच, भगवान अयप्पा की सैकड़ों महिला श्रद्धालुओं ने मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर जाकर उन महिलाओं को मंदिर से करीब 20 किलोमीटर पहले ही रोकने का प्रयास किया जिनकी आयु 10 से 50 साल है। ‘स्वामीया शरणम् अयप्पा’ के नारों के साथ भगवान अयप्पा भक्तों ने इस आयु वर्ग की लड़कियों और महिलाओं की बसें और निजी वाहन रोके और उन्हें यात्रा नहीं करने के लिए मजबूर किया। सबरीमाला जाने के रास्ते में निलक्कल में भारी तनाव के बीच एक महिला प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘मासिक पूजा के लिए मंदिर जब खुलेगा तो 10 से 50 साल की आयु की किसी महिला को निलक्कल से आगे और मंदिर में पूजा-अर्चना की इजाजत नहीं दी जाएगी।

इस अति संवेदनशील विषय पर कठिन समय का सामना कर रहे मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने मंदिर में प्रवेश से श्रद्धालुओं को रोकने की कोशिश करने वालों को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा, ‘हम सभी की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। किसी को कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी। मेरी सरकार सबरीमला के नाम पर कोई हिंसा नहीं होने देगी।’मुख्यमंत्री ने कहा, ‘श्रद्धालुओं को सबरीमाला जाने से रोकने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।’ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर समीक्षा की मांग नहीं करने के सरकार के फैसले पर फिर से विचार किए जाने की संभावना खारिज कर दी। विजयन ने कहा, ‘हम सुप्रीम कोर्ट के कहे का पालन करेंगे।’

नीलाकल गांव के आसपास भगवा झंडे देखे जा सकते हैं। बीजेपी के समर्थन वाले हिंदू संगठनों ने स्थानीय महिलाओं और पुरुषों को अपने विरोध प्रदर्शन में शामिल करना शुरू कर दिया है। विरोध प्रदर्शन करती हुई महिलाओं का समूह कह रहा है कि भगवान अयप्पा के ब्रह्मचारी होने की वजह से ऐसी महिलाओं जो कि मासिक धर्म से गुज़र रही हों, उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। प्रदर्शनकारी राज्य सरकार से मांग कर रहे हैं कि राज्य सरकार को इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पीटिशन डालनी चाहिए। लेकिन, केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने ऐलान किया है कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानेगी और रिव्यू पीटिशन फाइल नहीं करेगी। ऐसी ही एक प्रदर्शनकारी लेलिथम्मा कहती हैं, “हम मंदिर की ओर आने वाली सभी गाड़ियों को चेक करना चाहते हैं। अगर हम 10 से 50 साल की उम्र वाली किसी महिला को देखेंगे तो उसे मंदिर के दर्शन करने की इजाजत नहीं देंगे। हम चाहते हैं कि ये परंपरा ऐसे ही चलती रहे। अगर युवा महिलाएं मंदिर के दर्शन करना चाहती हैं तो उन्हें 50 साल की उम्र तक होने तक इंतज़ार करने देना चाहिए।” इसके साथ ही महिला प्रदर्शनकारियों ने एक गाड़ी में दो पुरुषों और एक वृद्ध महिला के साथ बैठी दो लड़कियों को भी नीलाकल गांव छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का विरोध करने वाली एक युवा महिला निशा मनी कहती हैं, “मैं यहीं पैदा हुई हूं और बड़ी हुई हूं। मैं कभी भी इस मंदिर में नहीं गई जबकि मेरे घर के पुरुष मंदिर जा चुके हैं। मैं यहां इस जंगल के बीच रह रही हूं। यहां से मंदिर जाने के तमाम रास्ते हैं, लेकिन मैं कभी मंदिर नहीं गई क्योंकि यही परंपरा है। हम युवा महिलाओं को मंदिर जाने से रोकने के लिए सभी गाड़ियों को रोक देंगे।” वहीं, कुछ प्रदर्शनकारियों ने ये ऐलान भी किया है कि अगर युवा महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति मिली तो वह सामूहिक आत्महत्या करेंगी। नीलाकल गांव के पास एक दुकान चलाने वाले एस जयसन इस पूरे विरोध प्रदर्शन से थोड़े चिंतित हैं क्योंकि उनका मोहल्ला इस वजह से केरल की सबसे विवादित जगह बन गई है। जयसन कहते हैं, “यहां पर कई लोग इस फैसले का विरोध नहीं कर रहे हैं। एक लंबे समय से महिलाओं को इस मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं थी। लेकिन अब उन्हें इसकी इजाज़त मिल गई है। ऐसे में कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि सरकार उन धर्मार्थियों को सुरक्षा प्रदान करेगी जो मंदिर जाकर पूजा करना चाहते हैं।

17 अक्टूबर को देश के अलग-अलग हिस्सों से सबरीमला मंदिर के भक्त यहां पहुंचकर दर्शन करना चाहते हैं। हालांकि, महिला भक्तों को मंदिर से छह किलोमीटर दूर स्थित पंपा नामक जगह पर पहुंचकर गणेश अर्चना की इजाज़त है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद प्रदर्शनकारी महिलाओं को पंपा भई नहीं आने दे रहे हैं। इसी बीच केरल महिला आयोग की अध्यक्ष ए सी जोसफ़ाइन ने स्थानीय मीडिया को बताया है कि महिलाओं को मंदिर में जाने से रोकना सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ होगा और आयोग शिकायत करने वाली महिलाओं के मामलों की जांच करेगा। लिंग आधारित समानता को मुद्दा बनाते हुए महिला वकीलों के एक समुदाय ने 2006 में कोर्ट में याचिका डाली थी। दरअसल, हिंदू धर्म में पीरियड्स के दौरान महिलाओं को ‘अपवित्र’ माना जाता है और कई मंदिर इस कारण महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा देते हैं।

 

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