राजनीतिसंपादकीय

सच कहा था हुड्डा ने

“ये कांग्रेस पहले वाली कांग्रेस ना रही”

Hisar Today

आखिरकार लग रहा है कि हुड्डा का दाव कामयाब रहा। वैसे भी पहले ही हिसार टुडे ने इस बात की पुष्टि की थी कि हुड्डा ऐसे नेता है जो अपना फायदा नुक्सान देखकर ही निर्णय लेते हैं। यही हुआ पार्टी छोड़ी नहीं, मगर दबाव बनाने में ऐसे कामयाब हुए कि उन्हें कुछ हद तक खुद की पीठ थपथपाने का मौका मिल गया। बता दें कि कांग्रेस का इतिहास रहा है वह कभी एकमत पार्टी नहीं रही है। जैसे-जैसे गांधी परिवार की चापलूसी करने वाले बदलते रहते हैं वैसे-वैसे ही कांग्रेस भी अपना मत बदलती रहती है। इस बार हरियाणा प्रदेश में चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने अपना पुराना रूप दिखाना शुरू कर दिया है, हरियाणा प्रदेश में बिखरी हुई कांग्रेस को पूरी तरह फिर से गुटों में बांट दिया है। हरियाणा प्रदेश के कांग्रेस नेताओं का कलह राजनीतिक गलियारों में किसी से छुपा नहीं है। यह कलह बहुत लंबे अंतराल से चलता आ रहा है और इस कलह की वजह से कांग्रेस को प्रदेश में लम्बे समय से बहुत ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा है। गुटों में बटी कांग्रेस, हुड्डा गुट, अशोक तंवर गुट, सुरजेवाला में बटी हरियाणा कांग्रेस को हाई कमान द्वारा और भी ज्यादा अस्त-व्यस्त कर दिया गया है। यह तो सभी जानते है कि कुछ सालों पहले राहुल गाँधी ने हरियाणा की गुटबाजी को खत्म करने के लिए अपने विश्वासपात्र अशोक तंवर को बताकर प्रदेशाध्यक्ष बनाकर कमान सौपी थी। प्रदेश की जिम्मेदारी उन्होंने अपने स्तर पर बखूबी निभाई लेकिन उन पर हमेशा हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा से कलह और अनबन के आरोप लगते रहे। वैसे माना यह भी गया कि अशोक तंवर जिस प्रकार से काम करना चाहते थे उन्हें काम करने नहीं दिया गया और उनके काम में अड़चने लगातार लाने का प्रयास विरोधी गुट ने किया। वैसे प्रदेशाध्यक्ष के पद पर रहते हुए अशोक तंवर ने कभी भी सामने से भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ कुछ नहीं कहा। मगर हां, वह उनकी बार-बार चुटकियां जरूर लिया करते थे। इस चुटकियों के हमेशा यही मायने निकाले जाते थे कि हुड्डा और तंवर के बीच की तल्खिया अब भी ज्यों की त्यों हैं। अशोक तंवर प्रदेशाध्यक्ष पद पर आने के बाद से ही हुड्डा इसी फिराक में थे कि कब तक उन्हें प्रदेशाध्यक्ष की भागदौड़ अपने हाथों में मिलेगी। जब से अशोक तंवर आये उनको हटाने के पीछे हुड्डा समर्थकों का बड़ा हुजूम लगा हुआ था। अपनी बात मनवाने के लिए भी हुड्डा समय-समय पर अपने वह किसी न किसी प्रकार से पार्टी हाई कमान को दबाव देते रहे हैं। हाल में उनकी परिवर्तन रैली ने भी कहीं न कहीं दबाव बनाने की कोशिश की। इस परिवर्तन रैली में उन्होंने परिवर्तन नामक एक जुमला भी फेंका था। भाई अब समझ से परे है कि परिवर्तन कहां आया है। क्योंकि हुड्डा को तो जिसकी चाह थी वह पद मिला नहीं, बस खानापूर्ति के लिए कुछ एकाध पद देकर उनका बस मान रखने की कोशिश की गयी। क्योंकि हाल में जो सोशल मीडिया में दिल्ली में हुड्डा को बधाई देने वाली वीडियो घूम रही है उसे देखकर लगता तो नहीं कि हाई कमान में जो परिवर्तन किया है उससे हुड्डा खुश हैं। परिवर्तन रैली का जिक्र आया तो मुझे वह बात याद आ गयी जिसमें उन्होंने बहुत भारी दिल से कहा था कि “यह कांग्रेस पहले वाली कांग्रेस नहीं रही”, उनके इस बयान से लग रहा था कि हुड्डा कांग्रेस पार्टी छोड़कर चले जाएंगे। क्योंकि वह खुद कह रहे थे कि कांग्रेस पहले वाली कांग्रेस नहीं रही। तो भाईसाहब ऐसा क्या हुआ कि अब आपको जो कांग्रेस पसंद न थी वो अब पसंद आने लगी है। खैर हुड्डा तो मन मसोसते रह गए, क्योंकि कमान शैलजा को मिल गयी और बेचारे रह गए अशोक तंवर जो शुरू से अंत तक कांग्रेस में पूरे संयम से प्रदेश अध्यक्ष पद को संभाल रहे थे, विपक्ष को अपने लेवल पर घेरने की कोशिश तो कर रहे थे पर आपसी लड़ाई ने उन्हें कमजोर बना दिया था। अब धमकी देकर कांग्रेस से कोई भी बात बनवाई जा सकती है, ये तय हो गया है। सच कहा था हुड्डा ने “ये कांग्रेस पहले वाली कांग्रेस ना रही”

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