संपादकीय

Hisar Today|विदेशी धरती पर क्यों राहुल का वार

Archana Tripathi, Hisar Today

सालो से सत्ता से दूर रही कांग्रेस दुबारा भारत की सियासी जमीन पर अपनी फसल उगाने के लिए बेताब नजर आ रही है। अपनी इसी बेताबी के चलते कांग्रेस के रणनीतिकारों को ऐसा लगता है कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी विदेशी धरती पर कांग्रेस अध्यक्ष जब कुछ बोलेंगे तो भारतीय जनमानस पर उसका ज्यादा असर होगा।समय गवाह है की जब से नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री की कमान संभाली है, उसकी लोकप्रियता का मायने विदेशो में उनके प्रशंसकों की भीड़ उनके प्यार से नजर आया है। विदेशी धरती में ऐसी लोकप्रियता न केवल देश वासियो को यह सोचने को मजबूर करती है की अगर जो नेता बाहर इतना लोकप्रिय है तो वाकई वह देश के लिए अच्छा काम कर रहा होगा। जबकि अगर राहुल की बात की जाए तो कांग्रेस अध्यक्ष की भागदौड़ सँभालने के बाद वो खुद को बड़ा नेता प्रोजेक्ट करने की जद्दोजेहद में अभी भी लगे हुए है।

उनको ऐसा लगता है की देश में वो मोदी के खिलाफ भाषणबाजी कर के उन्हें बार बार टेंशन में डाल रहे है, अगर यही का कमाल वो बाहर कर दिखाए तो विदेशी मीडिया के लिए वो चर्चा का विषय और देश की भाजपा पार्टी के लिए और अधिक परेशानी में डाल देंगे। राहुल ने बाकायदा अपना मीडिया कैम्पेन शुरू कर दिया है। और नियोजित तरीके से वह देश से ज्यादा विदेशो में नाम कमाने के चक्कर में विवादित बयानबाजी कर सुर्खियों में छाए हुए है। राफेल डील इसी का जीता जगता उदाहरण है। खाइअर आगामी 2019 के चुनावों में राहुल गाँधी की यह रणनीति कितनी कारगर साबित होगी यह तो भविष्य के गर्भ में ही छिपा हुआ है। राहुल को वैसे भी मोदी कह चुके है कि 2024 तक कोई वैकेंसी नहीं है।

राहुल गांधी ने पहले जर्मनी के हैम्बर्ग में एनडीए सरकार खासतौर से पीएम मोदी पर निशाना साधा और उसके बाद लंदन की धरती से उन्होंने देश को ये समझाया कि मौजूदा सरकार की विदेश नीति नाकाम है। डोकलाम एक अलग घटना नहीं थी, बल्कि कई घटनाओं की कड़ी में वो एक और घटना थी। दरहसल राहुल गांधी को विदेशी धरती पर आरएसएस एक ऐसे संगठन के तौर पर नजर आया जो अरब देशों की मुस्लिम ब्रदरहुड की तरह है। राहुल को देश में होते लिंचिंग,दलित उत्पीड़न के लिए मोदी की नोटबंदी और जीएसटी जिम्मेदार लगी। कहते है कि नफरत का जवाब नफरत नहीं हो सकता है लिहाजा उन्होंने एक और दांव खेला और खुद की छवि निखारने के लिए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान पीएम को गले लगा लिया। लेकिन सवाल ये उठ खड़ा होता है कि इन मुद्दों को उठाकर वास्तव में राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस को कामयाबी मिलेगी या उनके तरकस से निकले तीर कांग्रेस की खुद की शरीर को छलनी कर देंगे।

इन सवालों के जवाब को तलाशने की कोशिश में यह जानना बेहद जरूरी है कि राहुल गांधी के बयान पर बीजेपी को क्या लगता है। बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि जिस शख्स को खुद के इतिहास और भूगोल के बारे में नहीं पता है वो दूसरों के बारे में क्या कहेगा। राहुल गांधी ने हिंदुस्तान को खत्म करने की सुपारी ले ली है। जानकारों का मानना है कि जब राहुल गांधी विदेश नीति की बात करते हैं तो देश के आम जनमानस को यह याद आता है कि कांग्रेस के शासन काल के दौरान तो पाकिस्तान की तरफ से किस तरह से सीजफायर का उल्लंघन होता था। लेकिन फिर भी उनकी सरकार कभी भी उतने सक्रिय भूमिका में नजर नहीं आई। जबकि अब लोगों को ये दिखाई दे रहा है कि घाटी में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई और पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग थलग करने में मोदी की एनडीए सरकार बेहद सक्रिय है।

इसके अलावा जहां तक डोकलाम का सवाल है तो वैली में जिस तरह से चीनी घुसपैठ हुई और यूपीए सरकार खामोश बैठी रही वो जनता के दिलो दिमाग में अंकित है। लेकिन मौजूदा सरकार ने 73 दिनों के डोकलाम गतिरोध को दूर कराने में कामयाबी हासिल की। चीन को पहली बार एक तरह से झुकना पड़ गया। इसके साथ ही जानकार ये कहते हैं कि राहुल गांधी के हमलावर अंदाज को बेअसर करने के लिए बीजेपी को और आक्रामक भूमिका में नजर आना होगा। हाल में जिस प्रकार राहुल ने आरएसएस की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से की उसके बाद से जानकारों की राय बंटी हुई है। कुछ जानकारों का कहना है कि ये मुद्दा कांग्रेस के लिए बैक फायर कर सकता है।

दरअसल जब कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी इस तरह की बात करते हैं तो वो अक्सर यह भूल जातें हैं कि गुजरात और कर्नाटक के चुनाव में उनका कौन सा रूप लोगो के सामने आया था। गुजरात में मंदिर मंदिर मत्था टेकते रहे। इसके साथ ही कर्नाटक में मठों का दौरा भी किया। ऐसे में कांग्रेस को अपने तथाकथित परंपरागत मतदाताओं को समझा पाना मुश्किल होगा कि आखिर वो बीजेपी से अलग कैसे है। जबकि दूसरे धड़े का मानना है कि आरएसएस पर धारदार अंदाज में हमला कर वो अपने परंपरागत मतदाताओं को अपने पाले में लाने में कामयाब रहेगी। लिंचिंग, दलित उत्पीड़न के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मौजूदा सरकार की नोटबंदी और जीएसटी को जिम्मेदार बताया। मगर राहुल के उठाये मुद्दे पर देश के मतदाताओं की इस मुद्दे पर राय बंटी हुई है। क्यूंकि लोगों का तो खुद यह मानना है कि कांग्रेस जिन मुद्दों को उठा रही है जबकि लिंचिंग या दलित उत्पीड़न की घटनाओं से निपटने में कांग्रेस भी मुक्त नहीं रही है। यूपी के गाजीपुर में एक ऐसी ही वारदात हुई थी जिसमें कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगे थे। लिहाजा जब राहुल गांधी इस तरह के आरोप लगाते हैं तो लोग कांग्रेस से ही सवाल खड़े करते हैं कि कांग्रेस के राज में “हरियाणा के मिर्चपुर में क्या हुआ था”।

कुछ जानकार कहते हैं कि आज भारतीय राजनीति में कई प्रेशर समूह काम कर रहे हैं जिनका अस्तित्व बीजेपी की उभार की वजह से खतरे में आ चूका है और फिलहाल वो समूह कांग्रेस को संजीवनी देने का काम कर सकता है। जीएसटी के मुद्दे पर जानकारों का कहना है कि देश की जनता इस तथ्य से वाकिफ है कि कांग्रेस जीएसटी लागू करने को लेकर पहले से विचार कर रही थी लेकिन इसे लागू करने के बाद सत्ता की कुर्सी पर पढ़ते दुष्परिणामों की आशंका के चलते यूपीए सरकार फैसला लेने से बचती रही। जबकि एनडीए सरकार बिना डरे जीएसटी से संबंधित नीतिगत फैसले पर आगे बढ़ी और उन आशंकाओं को निर्मूल साबित किया कि जीएसटी का नकारात्मक असर पड़ सकता है। गुजरात के साथ कुछ अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की कामयाबी से साफ हो गया कि व्यापारी समाज का पार्टी में भरोसा बरकरार रहा।इसके साथ ही नोटबंदी पर भी जानकारों की राय बंटी हुई है। कुछ लोगों का मानना है कि ये बात सच है कि नोटबंदी के खिलाफ विपक्ष ने जनमत बनाने की कोशिश की। लेकिन वो मुहिम सिर्फ सड़कों पर ही सीमित थी। क्यूंकि अन्य पार्टी एकजुट होने को तो तैयार थी , परन्तु राहुल के नेतृत्व में साथ आने को बिलकुल नहीं।

नोटबंदी के फैसले के बाद यूपी समेत कई राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि विपक्ष अपनी बात को असरदार तरीके से रख पाने में कामयाब नहीं रहा। नोटबंदी का फैसला 2 साल पहले लिया गया था और आज के मौजूदा समय में वो मौजूदा सरकार के खिलाफ मुद्दा नहीं बन सकता है।

राहुल को पता है की विदेशी सरजमीन के साथ भारत में मोदी की छवि भ्रष्टाचार मुक्त , ईमानदार प्रधानमनतरि की रही है। विदेशो में ज्यादातर भारतीय नागरिको की जनसँख्या होने के कारण वहा तक भी सीधा मोदी की छवि की शौहरत साफ़ दिखाई देते है। इसलिए उन्होंने लोगो की इस गलतफैमी को दूर करने के लिए सीधा राफेल का मुद्दा उठाकर मोदी को भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर अपनी ईमानदार छवि दिखने की कोशिशों के साथ यह भी दिखने की कोशिश की है की अगर कोई मोदी को आज के समय में सीधा टक्कर देने का दम भरता है तो वो खुद राहुल गाँधी ही है। ऐसा करके वो 2019 तक खुद को प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार के रूप में खुद को साबित करना चाहते हैं।

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