संपादकीय

लेट-लतीफ मॉनसून

Hisar Today

डर है कि राजनीतिक गतिविधियां कहीं मौसम की चुनौतियों से निपटने की तैयारियों पर भारी न पड़ जाएं। वैसे स्काईमेट नहीं मानती कि स्थितियां बहुत खराब हैं। उसका कहना है कि सामान्य से कम मॉनसून होने पर भी कृषि क्षेत्र पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

इस साल मॉनसून लेट-लतीफ है। मौसम विभाग ने कहा है कि केरल में वह 6 जून को, यानी पांच दिन की देरी से पहुंचेगा। इससे पहले गैर-सरकारी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने भी मॉनसून के देर से आने का अनुमान जताया था। सामान्य स्थिति में केरल के रास्ते देश में मॉनसून की एंट्री 1 जून को होती है, हालांकि पिछले साल यह तीन दिन पहले 29 मई को ही आ गया था। पिछले साल सामान्य बारिश हुई थी पर स्काईमेट के अनुसार इस साल इसके औसत से कम, 93 प्रतिशत ही रहने की उम्मीद है। कुछ समय पहले मौसम विभाग ने 96 प्रतिशत बारिश का पूर्वानुमान व्यक्त किया था। स्काईमेट ने महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और उत्तरी कर्नाटक को लेकर खास चिंता व्यक्त की है। उसके मुताबिक यहां सूखे से निपटने की आपात तैयारी अभी से शुरू करनी चाहिए क्योंकि मध्य भारत में सबसे कम, सिर्फ 91 प्रतिशत बारिश होने की संभावना है। अभी देश में चुनाव चल रहे हैं और नई सरकार बनने की गहमागहमी शायद मई बीतने तक चलती रहे। ऐसे में ये बातें परेशान करने वाली हैं।
डर है कि राजनीतिक गतिविधियां कहीं मौसम की चुनौतियों से निपटने की तैयारियों पर भारी न पड़ जाएं। वैसे स्काईमेट नहीं मानती कि स्थितियां बहुत खराब हैं। उसका कहना है कि सामान्य से कम मॉनसून होने पर भी कृषि क्षेत्र पर बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा और फसलों की पैदावार में कमी नहीं आएगी। कारण यह है कि पिछले कुछ वर्षों से कृषि प्रधान राज्यों पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंचाई के अच्छे प्रबंध हो गए हैं। जून-जुलाई में कम बारिश होने से रोपाई का काम देर से शुरू होगा, लेकिन अगस्त-सितंबर में अच्छी बारिश से धान जैसी फसलों को फायदा मिलेगा। सचाई यह है कि पिछले कुछ वर्षों में सिंचाई के साधन बढ़े हैं और जहां नहरें नहीं हैं, वहां खेतों में पानी की कमी भूजल के इस्तेमाल से पूरी की गई है।
लेकिन मध्य और पश्चिमी भारत में पानी की प्राय: कमी रहती है और कमजोर मॉनसून की स्थिति में इन इलाकों के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान अब तकरीबन 13 प्रतिशत ही रह गया है, फिर भी भारत की 60 फीसद से अधिक आबादी इस पर निर्भर है।
देश में खाद्य भंडार की कमी नहीं है, इसलिए अकाल की आशंका अतीत की बात हो गई है। लेकिन वर्षा से जुड़े उलटफेर का कुछ असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ता ही है। खाद्यान्न महंगा होने से वे लोग भी प्रभावित होते हैं, जिनकी आजीविका सीधे खेती से नहीं जुड़ी है। पूरी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता पदार्थों की मांग कम हो जाना इस दायरे की एक अलग समस्या है। जाहिर है, नई सरकार के सामने शुरुआती दिनों में ही एक चुनौती खड़ी रहेगी। इसे लेकर पहले दिन से ही सचेत रहा जाए तो कमजोर बारिश किसी बड़े सिरदर्द का सबब नहीं बनेगी।

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