राजनीतिसंपादकीय

लड्‌डूओं का आर्डर दिया क्या!

अब सभी यही सवाल कर रहे हैं कि भाई लड्डू कौन बनवा रहा है। प्रत्याशी अपने कार्यकर्ता से फीडबैक ले रहे हैं। कुछ प्रत्याशियों में जोश दिख रहा है, तो कुछ प्रत्याशी बड़े उमंग के साथ जनता से मिल रहे हैं। हालांकि कुछ प्रत्याशी ऐसे भी है जो सुर्खियों से ही बाहर हैं। बड़े जोशोखरोश के साथ कार्यकर्ताओं की टोली चुनाव में काम पर लग गयी थी, मगर अब उनके सामने उनके काम का रिजल्ट देखने को मिलेगा। क्या यह चुनाव ईमानदारी से हुआ? क्या वोटों को खरीदा गया? क्या वोट 500 से 1500 में बिके? क्या यह वोट खरीदने वाले विपक्ष या सत्ताधारी थे? क्या बोगस का खेल हुआ? या कार्यकर्ताओं ने अपने यहां के वोट डलवाने के लिए पैसा दिया? यह सवाल अब बस सवाल हैं इसका जवाब मेरे पास नहीं। शायद जिसने ऐसा किया होगा उसके मन में जरूर चल रहा होगा कि इसमें से कितने सवाल के जवाब उनके पास हैं।
भाई साहब आज ही बात हुयी ऐसे ही एक जोशीले कार्यकर्ता से। चुनाव का दिन था और इस कार्यकर्ता को हमेशा रात-दिन, सोते-जागते अपने पसंदीदा प्रत्याशी का गुणगान करते प्रचार में पसीने बहाते देखा। मगर जब से चुनाव बीता है महाशय “Silent Zone” में चले गए हैं। सोचा व्हाट्सअप से ही पूछ लूं, वहां तो यह हमेशा ऑनलाइन रहते हंै। वैसे व्हाट्सअप का जिक्र आते ही याद आया आजकल ग्रुप में लोग मिठाईयों की तस्वीर भेजकर एकदूसरे पार्टी के कार्यकर्ताओं की खिल्लियां उड़ा रहे हैं। मैंने भी सोचा पूछ लंू, मिठाई का आर्डर दिया या नहीं। कहते हंै हम तो आधे दाम में दूसरे पार्टी की मिठाई लेकर बाटेंगे। यह पढ़कर मैं जोर से हंस पड़ा। भाई साहब यही तो होता है जोश। नैय्या डूब रही है मगर फिर भी विश्वास कायम है।
वैसे यह विश्वास होना चाहिए। मगर जब चुनाव आता है तो अपने खास पर भी विश्वास नहीं होता कि क्या वो मुझे वोट देगा। मगर फिर भी विश्वास पर दुनिया कायम है। हमारा तो मानना है कि अब सब कुछ छोड़ो और विधानसभा की तैयारियों में जुट जाओ। अपना गढ़ अपना क्षेत्र बचाने में लग जाओ। क्योंकि अब के नतीजे यह तय करने वाले हैं कि आगे विधानसभा चुनाव में किस पार्टी की स्थिति मजबूत और कौन सी पार्टी चुनाव जीतने में कामयाब होगी। अगर चुनाव के नतीजे एक तरफा रहे तो विधानसभा में दूसरी पार्टियों को सरदर्द दे सकती है। मगर इन दिनों सुना है भाजपा का फोकस अपने अगली परीक्षा की तरफ हो गया है। जी हां विधानसभा चुनाव। लगातार कार्यकर्ताओं, लोकसभा प्रत्याशियों के साथ विधायकों से मिलने का दौर शुरू हो चुका है। हो सकता है कि भाजपा विधानसभा में कांग्रेस और अन्य दलों के सफाये को लेकर रणनीति तय करने में जुट जाए। सुना है विधानसभा चुनाव के पूर्व नौकरी भर्ती का मसला होगा। जो जींद उपचुनाव में गेम चेंजर के तौर पर साबित हुआ था। भाजपा का पूरा फोकस इसी बात को लेकर होगा। इतना ही नहीं दलबदल का दौर भी अब चर्म पर होगा। पार्टी की जीत के साथ अपनी नैय्या पार लगाने का आकलन कर नेता लोग यहां से वहां जायेंगे। और आप और मैं बस यह खेल देखते जायेंगे। 23 के नतीजे के बाद नेताओं को अपनी पार्टी के अंदर कमी दिखाई देने लगेगी और वह दूसरी पार्टी में चले जाएंगे।
भाजपा अब धड़ाधड़ विकास का पिटारा खोलेगी, अपने विपक्षी को आड़े हाथों लेगी। पार्टी के अंदर टिकट की घुड़दौड़ भी रोकेगी। मगर क्या विधानसभा का नया टारगेट लेकर आएगी। बता दें कि इस बार भारतीय जनता पार्टी, एकजुट और सक्रियता से अपनी प्लानिंग में जुट गयी है। कौन से गढ़ को कैसे भेदना है उसका मंथन चल रहा है। ऐसे में सभी पार्टी लड्डुओं का इंतजार छोड़ काम पर लग जाओ, वरना लड्डू खाने को नहीं मिलेंगे।

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