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राव तुलाराम ने अंग्रेजों से एक महीने तक किया था युद्ध

Hisar Today

रेवाड़ी के राजा राव तुलाराम वह शख्सयित थे, जिन्हों ने आजादी के पहले स्वाधीनता संग्राम मे अहम योगदान दिया था। अंग्रेजों के साथ एक ही युद्ध मे राज राव तुलाराम की सेना के लगभग पांच हजार सैनिक शहीद हुए थे। हरियाणा का रेवाड़ी जिला जिसे अहिरवाल का लन्दन कहा जाता है और इस लन्दन के राव राजा तुलाराम थे। राव तुलाराम ने देश के लिए लड़े गए 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में अहम योगदान दिया था, जिसको लेकर हरियाणा के लोग 23 सितम्बर का दिन शहीदी दिवस के रूप में मनाते है और हरियाणा के साथ साथ रेवाड़ी के लोग अपने आप पर गर्व महसूस करते है कि वह ऐसी धरती पर जन्में है जिस धरती से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले राव तुलराम जन्में थे।

राव तुलाराम का राज्य कनीना, बवाल, फरुखनगर, गुड़गांव, फरीदाबाद, होडल और फिरोजपुर झिरका तक फैला हुआ था। राव तुलाराम अंग्रेजों के शासन से काफी परेशान थे और उनके दिल में आक्रोश की भट्टी सुलग रही थी। जब पहली बार 1857 में बंगाल से क्रांति की आग लगी तो वो हरियाणा तक फ़ैल गई और दिल्ली से सट्टा अहिरवाल के क्षेत्र में ये विद्रोह और भयानक रूप से भड़क गया। अहिरवाल का नेतृत्व राव तुलराम और उनके चचेरे भाई गोपाल देव ने संभाला। बादशाह बहादुरशाह ने तुलाराम को निर्देश दिया था कि वो अहिरवाल का नेतृत्वन करें। दिल्ली के आसपास के इलाकों में विद्रोह की आग बराबर भड़की हुई थी।

अंग्रेज अब यह समझ चुके थे कि राव तुलाराम पर काबू पाए बिना वे चैन से दिल्ली पर शासन नहीं कर सकते इसलिए राव तुलाराम को तहस-नहस करने के लिए 2 अक्टूबर 1857 को ब्रिगेडियर जनरल शोबर्स एक भारी सेना तोपखाने सहित लेकर रेवाड़ी की ओर बढ़े तथा 5 अक्टूबर 1857 को पटौदी में उनकी झड़प राव तुलाराम की एक सैनिक टुकड़ी से हुई। अंग्रेज रावतुलाराम की सैनिक तैयारी को देखकर दंग रह गए. यह विदेशी लश्कर एक माह तक राव तुलाराम को घेरे में लेने की कोशिश करता रहा। दूसरी ओर अंग्रेजों ने दस नवम्बर 1857 को एक बड़ी सेना जबरदस्त तोपखाने के साथ कर्नल जैराल्ड की कमान में राव तुलाराम के खिलाफ रवाना की।

16 नवम्बर 1857 को जैसे ही अंग्रेजी सेना नसीबपुर के मैदान के पास पहुंची राव तुलाराम की सेना उन पर टूट पड़ी। यह आक्रमण बड़ा भयंकर था। अंग्रेजी सेना के छक्के छूट गए। उनके कमाण्डर जैराल्ड सहित अनेक अफसर मारे गए। नसीबपुर मे हुए युद्ध में घायल राजा राव तुलाराम राजस्थान चले गए जहां इलाज के बाद वह सहायता लेने के लिए अफगानिस्तान गए, फिर कई शहरों से होते हुए वे काबुल पहुंचे। वहां फैली बीमारी से ग्रस्त हो गए और आजाद कराने की तड़फ लिए 23 सितम्बर 1863 को काबुल में स्वर्ग सिधार गए। भारत में ऐसी मिसालें बहुत हैं जब आपसी द्वेष व निजी स्वार्थ के कारण देसी राजाओं ने विदेशियों को निमंत्रण व सहायता देकर देश को गुलामीं की जंजीरों में जकड़वा दिया, लेकिन राव तुलाराम ही भारत के इतिहास में पहले राजा थे जिन्होंने अपना राज्य, जान और माल न्यौछावर करके मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए विदेशों से सहायता प्राप्त करने की जीतोड़ कोशिश की।

वर्ष 1957 में जब भारत सरकार ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शताब्दीस मनाई तब राव तुलाराम की स्मृति में सरकार ने नारनौल, (नसीबपुर युद्ध क्षेत्र) रेवाड़ी और रामपुरा में शहीदी स्मारक बनवाए। हरियाणा सरकार ने भी 23 सितम्बर को राव तुलाराम व अन्य शहीदों को श्रद्धांजलि देने हेतु राजकीय अवकाश घोषित किया हुआ है। रामपुरा गांव में राव तुलाराम के वंशज रहते है। केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह और उनके दो भाई राव तुलाराम के वंशज है। साथ ही उनके नाम से रेवाड़ी में कई महत्वपूर्ण स्थान मनाये गए। रेवाड़ी में राव तुलाराम के नाम से एक चौक पर उनकी प्रतिमा लगाईं गई और उनके नाम से एक पार्क बनाया गया। एक स्टेडियम बनाया गया है साथ ही दिल्ली में राव तुलाराम के नाम से एक अस्पताल और एक कॉलेज बनाया हुआ है और अभी 2001 में राव तुलराम के नाम से डाक विभाग ने एक टिकट जारी की थी।

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