टुडे न्यूज़संपादकीय

रथ यात्रा सारथी के घोड़े न्यूयॉर्क में और रथ का महानायक दिल्ली में

Hisar Today

इतिहास की अपनी विडंबना है, कभी भी इतिहास का कोई भी महानायक कूड़ेदान में डाला जा सकता है, किसी भी घटना को जो कभी टर्निंग प्वॉइंट मानी जाती रही है, को बहुत मामूली बनाया जा सकता है। एक पल ऐसा होता है, जब वो घटना इतनी बड़ी लगती है कि भविष्य की नींव इसी पर रखी जा रही है, लेकिन एक दिन ऐसा भी आता है जब भविष्य ही उसे अपनी नींव मानने से मना कर रहा होता है। आडवाणी की रथ यात्रा के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ है।

25 सितंबर 2015 को लाल कृष्ण आडवाणी की पहली रथ यात्रा को शुरू हुए पूरे पच्चीस साल हो गए हैं। आलम ये है कि रथ यात्रा का सारथी आज देश का प्रधानमंत्री है, और आज के ही दिन वो संयुक्त राष्ट्र संघ में ना केवल भाषण दे चूका है, बल्कि यूएन के चीफ बान की मून से एक लंबी मुलाकात भी कर चूका है, दूसरी तरफ उस रथ यात्रा का नायक इस इंतजार में घर में बैठा है कि शायद उसकी पार्टी ही इस बड़े और खास दिन पर कोई आयोजन कर दे। लेकिन अभी तक ऐसा कोई ऐलान नहीं हुआ है। पूरी पार्टी देश भर में दीन दयाल उपाध्याय की 99वीं जयंती मनाने में मशगूल है। आडवाणी के सम्मान में ना सही उस घटना की याद में तो कोई आयोजन करती जिसने इस पार्टी ही नहीं देश की राजनीति की भी दिशा और दशा बदल दी। आडवाणी की सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की यात्रा के कई ऐतिहासिक मायने हैं, इतिहास को बदला नहीं जा सकता। सबसे बड़ा तो यही तथ्य है कि मोदी का राष्ट्रीय पटल पर अवतरण इसी रथ यात्रा के जरिए हुआ।

नरेंद्र मोदी, एक शख्सियत एक धरोहर के पेज नं. 131 पर मोदी ने लेखक को बताया है कि, ‘इस अनुभव से मुझे मेरी प्रबंधन क्षमता को विकसित करने का अवसर मिला’। 13 सितंबर 1990 को मोदी ने गुजरात इकाई के महासचिव (प्रबंधन) के रूप में रथ यात्रा के औपचारिक कार्यक्रमों और यात्रा के मार्ग के बारे में मीडिया को बताया। इस तरह मोदी पहली बार राजनीति के राष्ट्रीय मंच पर महत्वपूर्ण भूमिका में सामने आए थे। इस तरह पहली बार मोदी मीडिया रंगमंच के लिए प्रमुख पात्र बन गए थे, इतने बड़े कार्यक्रम की सबसे ज्यादा सूचनाएं अगर किसी के पास थीं तो वो थे नरेंद्र मोदी। कुछ जानकारियां तो आडवाणी को भी बाद में मिलती थीं।

यही वो वक्त था जब मोदी ने एक तीर से कई निशाने साधे, चूंकि नेशनल मीडिया से बातें करने के लिए वो अधिकृत थे, तो वीपी सिंह से लेकर यूपी सरकार तक उन्होंने सबको चुनौती दे डाली कि कोई रोक कर दिखाए, पहली बार मोदी का स्वरूप राष्ट्रीय होने लगा था, रथयात्रा ने उनके लिए दिल्ली का रास्ता खोलने का काम कर दिया था। इधर इस मौके पर मीडिया को दिए गए तमाम वक्तव्यों के दौरान उन्होंने राम मंदिर को लेकर भी इसे सांस्कृतिक चेतना और धरोहर बताया और उसके लिए संघर्ष की बात कही, जो भविष्य की उनकी योजनाओं को दर्शाता था। हालांकि मीडिया से मुलाकातों के दौरान मोदी से रथयात्राओं के संभावित दंगों के बारे में भी सवाल पूछे गए, मोदी ने उसे ये कहकर टाल दिया कि इस तरह की बातें तो गुजरात की आदत में हैं। मोदी ने ये तक ऐलान कर दिया कि बीजेपी 30 अक्टूबर को अयोध्या में एक और जलियांवाला बाग के लिए तैयार है।

दरअसल तय योजना के मुताबिक 25 सितंबर को सोमनाथ से शुरू होकर यात्रा 30 अक्टूबर को अयोध्या में खत्म होनी थी। रथयात्रा की कामयाबी को देखते हुए मोदी को प्रबंधन का मास्टर का खिताब मिल गया और उन्हें बीजेपी की अगली यात्रा यानी मुरली मनोहर जोशी की कन्या कुमारी से कश्मीर तक की एकता यात्रा का भी सारथी बना दिया गया।केवल मोदी ही नहीं एक और गुजराती भी इस यात्रा के जरिए चर्चा में आया। इसी दौरान मोदी के पुरान सहयोगी प्रचारक और कैंसर सर्जन प्रवीण तोगड़िया ने भी राष्ट्रीय पटल पर अंगड़ाई ली, और मौके को भुनाया। उन्होंने भी विश्व हिंदू परिषद के कई कार्यक्रमों का ऐलान कर दिया, उन्होंने 101 राम ज्योति यात्रा और 15,000 विजय दशमी यात्राओं का ऐलान कर दिया, वो उन दिनों विहिप की गुजरात इकाई के महासचिव थे।

हालांकि इस यात्रा की जड़ें कुछ साल पहले रखी गई थीं। अक्टूबर 1984 में वीएचपी ने अयोध्या में मंदिर के लिए रामजन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया। 8 अक्टूबर 1984 को अयोध्या से लखनऊ की 130 किलोमीटर की यात्रा से आंदोलन शुरू हुआ। 1986 में वीएचपी ने मंदिर आंदोलन को बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया। 1989 में वीएचपी ने विवादित स्थल के नजदीक ही राम मंदिर की नींव रख दी। 1989 में वीएचपी के आंदोलन को तब बड़ा मंच मिला जब बीजेपी उसके साथ खड़ी हो गई।

जून 1989 में बीजेपी ने पालमपुर प्रस्ताव में मंदिर आंदोलन के पक्ष में खड़े होने का फैसला किया। बीजेपी के कूदने के बावजूद तब तक वीएचपी ही आंदोलन की अगुवा थी। 1989 के आम चुनाव से ठीक पहले राजीव गांधी सरकार ने वीएचपी को मंदिर के लिए अयोध्या में 9 नवंबर को शिलान्यास की इजाजत दे दी। इसे वीएचपी की बड़ी सफलता माना गया लेकिन माहौल ऐसा बन गया था कि इस दौर में देश ने सांप्रदायिक दंगों का सबसे भयंकर दौर देखा। 22 से 24 नवंबर 1989 को आम चुनाव से पहले हिंदी प्रदेशों में दंगों में करीब 800 लोगों की जान चली गई। बीजेपी को 88 सीटें मिलीं जिसके समर्थन से वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। अब धीरे-धीरे आंदोलन की कमान बीजेपी के हाथ आने लगी थी।

रथ यात्रा को शुरू करने के पीछे तमाम वजहें मानी जाती हैं, माना ये भी गया चूंकि वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का फैसला किया तो बीजेपी को जाति के आधार पर हिंदू वोट बैंक के बंटने का डर था, जिससे उसे एक करने के लिए कोई नया मुद्दा उठाना बहुत जरूरी था, वैसे भी वो आरक्षण का विरोध करने की हालत में नहीं थी और आज भी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को इस मुद्दे पर दिया अपना बयान वापस लेना पड़ा। ऐसे में आडवाणी का ये दांव ना होता तो शायद बीजेपी का कमंडल मंडल के फेर में टूट जाता। इसलिए मंडल के दांव से कमंडल को बचाने वाली थी आडवाणी की रथ यात्रा। बीजेपी को 2 अंकों से तीन अंकों में पहुंचाने वाली थी रथयात्रा।

यूपी में कांग्रेस को बर्बाद करने वाली भी आडवाणी की रथ यात्रा ही थी। उसके पीछे भी दिलचस्प वजह है, मुलायम की सरकार यूपी में भाजपा के सहारे चल रही थी, जैसे केंद्र में वीपी सिंह की सरकार चल रही थी। जैसे ही आडवाणी की गिरफ्तारी हुई, उसके सात दिन बाद अयोध्या में यात्रा खत्म होनी थी, हजारों स्वंयसेवक और रामभक्त वहां पहुंच चुके थे। मुलायम ने उन पर गोलियां चलवा दीं। कई लोग मारे गए, बीजेपी ने सपोर्ट वापस लिया तो कांग्रेस ने मुलायम को सहारा दे दिया। सरकार तो बच गई लेकिन कांग्रेस की यही भूल सबसे बड़ी भूल साबित हुई। तब से आज तक यूपी में कांग्रेस चौथे स्थान से ऊपर नहीं उठ पाई है। मुलायम लगातार कांग्रेस के वोट बैंक को काट काट कर मजबूत होते गए।

रथयात्रा के बाद गुजरात में चुनाव हुए उनमें भाजपा ने 26 में से 20 सीटें जीतीं, भाजपा ने 119 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल की, ये नतीजे तो तब प्राप्त किए जब राजीव गांधी की हत्या के बाद देश में सुहानुभूति की लहर चल रही थी। आडवाणी इस यात्रा के बाद हर साल 25 सितंबर को सोमनाथ जाते रहे और वहां से किसी ना किसी बड़ी बात का हर साल ऐलान भी होता रहा। आडवाणी इस यात्रा के बाद पार्टी और संघ के निर्विवाद नेता बन चुके थे, अब उनसे उम्र में छोटे संघ प्रचारक आसानी से उनकी बातों को काटने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। उसका एक दूसरा पहलू भी सामने आया, शालीन और अनुशासित आडवाणी के आसपास एक चौकड़ी जमने लगी थी। जिसके चलते ही मीडिया और उनके अपने संघ परिवार में काफी कुछ लिखा कहा गया।

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