संपादकीय

महासमर का महारथी कौन

Hisar Today 

फरवरी की एक सर्द रात को श्रीनगर के आम लोग घने काले आसमान में उड़ते जेट फ़ाइटर की आवाज़ से जग गए थे। कई लोगों को ये आशंका हुई कि युद्ध महज एक धमाके भर की दूरी पर रह गया है। भारत प्रशासित कश्मीर के लोग अपने यहां खाने-पीने का सामान जमा करने लगे। पेट्रोल पंप के सामने लोगों की लाइन लगने लगी तो पेट्रोल पंप पर पेट्रोल कम पड़ने लगा। अस्पताल के डॉक्टरों को दवाइयों का भंडार रखने को कहा गया। घबराये हुए लोग अपने बगीचों में बंकर बनाने की सोचने लगे थे। एक बड़े नेता को अब इस बात पर पछतावा हो रहा है कि उन्होंने एयरपोर्ट के पास घर खरीद लिया. उन्हें अब ये अच्छा विचार नहीं लग रहा है।

कुछ ही दिनों में भारत के लड़ाकू विमान मिराज 2000 पाकिस्तान की सीमा में दाखिल तक हो गए। भारत ने कहा कि उसके जेट विमानों ने लेज़र गाइडेड बमों से ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के बालाकोट में चरमपंथी शिविरों को निशाना बनाया। साल 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद ये पहला मौका था जब भारत ने नियंत्रण रेखा के उस पार जाकर हवाई हमला किया। समझदारी यही कहती है कि परमाणु हथियार से संपन्न पड़ोसियों को सोच समझकर कदम उठाना चाहिए। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नीति को अब खारिज कर दिया है। इस हमले की वाहवाही करते हुए 68 वर्षीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ये हमला पुलवामा में फ़रवरी में ही भारतीय सुरक्षा बल के जवानों पर हुए घातक हमले का वाजिब और मुंहतोड़ जवाब है। मोदी ने लोगों से ये भी कहा कि उन्होंने इस हमले के लिए सेना को खुली छूट दी थी। एक सभा में तो उन्होंने ये भी कहा, “लोगों का खून उबल रहा है।” एक दूसरी सभा में उन्होंने कहा, “मेरे दिल में भी वही आग जल रही है जो आपके अंदर जल रही है।”

वहीं मोदी ने इसे अपने पक्ष में प्रचारित करने का कोई मौका नहीं गंवाया। उन्होंने ऐलान कर दिया, “देश सुरक्षित हाथों में है।” ये मोदी के लिए किसी जीत से कम साबित नहीं हुआ और इसकी कई वजहें भी सामने हैं। मोदी को पसंद करने वाली रेटिंग पिछले कुछ समय से राज्यों में चुनाव हारने के चलते गिरावट की ओर थी। उसमें तेजी से सुधार देखने को मिला। मोदी साल 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने, उन्होंने अपने नेतृत्व में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की बात करने वाली बीजेपी को शानदार जीत दिलाई। साल 1984 के बाद ये पहला मौका था जब किसी पार्टी को आम चुनावों में बहुमत हासिल हुआ था।

बहरहाल 11 अप्रैल से 19 मई तक, क़रीब 40 दिनों तक चलने वाले मैराथन चुनाव में तकरीबन 90 करोड़ लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। ये भी कहा जा रहा है कि ये देश का सबसे बड़ा, सबसे लंबे समय तक चलने वाला और सबसे महंगा चुनाव साबित होने वाला है। लेकिन सवाल वही है, जैसा कुछ लोग पूछ भी रहे हैं, “क्या ये चुनाव भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई है?”

मोदी का चेहरा लोगों की टीशर्ट, टोपी, होर्डिंग और कार पर सब जगह दिखता है। मोदी खुद तो मौजूद नहीं हैं, लेकिन हर तरफ वे नजर आते हैं। यहां के बीजेपी कार्यकर्ता इस बात को लेकर निश्चिंत नहीं हैं कि वे यहां चुनाव प्रचार करने का वक्त निकाल पाएंगे या नहीं। खुद कभी नहीं हार मानने वाली भट्ट कहती हैं, “मोदी जी यहां से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। लेकिन उनकी छवि लार्जर दैन लाइफ़ वाली है, जो लोग मुझे वोट दे रहे हैं, वे लोग मोदी जी को वोट दे रहे हैं। “ नवंबर, 2016 की शाम अंबरीश नाग बिश्वास काम पर से घर लौट रहे थे। कोलकाता के पूर्वी हिस्से से वो अपने घर पहुंच पाते उससे पहले उनके मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी। उनके एक दोस्त का फोन था जो बहुत घबराया हुआ लग रहा था। उसने तेज आवाज़ में कहा, “नरेंद्र मोदी टीवी पर हैं और वे हम लोगों से हमारा पैसा ले रहे हैं।” बिश्वास ने उनसे पूछा, “क्या मतलब है तुम्हारा?”तब उनके दोस्त ने थोड़ी सांस लेकर पूरी बात बताई।

प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार बड़े मूल्यों के नोट की वैधता ख़त्म करने जा रही है, अगले चार घंटे के बाद 500 और 1000 रुपये के नोट के चलन पर पाबंदी लग जाएगी। 500 और 1000 रुपये के नोटों का मूल्य भारतीय अर्थव्यवस्था में जितने नोट चलन में थे, उनमें 80 फीसदी से भी ज्यादा था। मोदी ने ये भी बताया कि इस कठोर कदम का उद्देश्य भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है क्योंकि लोगों के पास अरबों रुपया जमा है जो घोषित नहीं है, अब उन्हें नए नोट लेने के लिए बैंकों में जमा करना होगा। ये भी कहा गया कि इस कदम से जाली नोटों की समस्या से छुटकारा मिलेगा।
साथ में भारतीय अर्थव्यवस्था की नकदी पर निर्भरता कम होगी। उस रात बिश्वास को नींद नहीं आई। एक डेयरी फर्म में काम करने वाले बिश्वास के पास अपातकालीन जरूरतों के लिए घर में 24 हजार रुपये रखे हुए थे। अब उन्हें बैंक जाकर अमान्य करार दिए गए इन नोटों को जमा कराना था और नए नोट लेने थे। उनकी पत्नी रिंकू घरेलू महिला थीं और बेटी साबोरनी हाई स्कूल में पढ़ती थीं। अगली सुबह जब बिश्वास बैंक पहुंचे, तब बैंक बंद था। बैंक के बाहर भीड़ जमा थी और किसी को मालूम नहीं था कि कितने रुपये बदले जाएंगे। बिश्वास पूरे दिन कतार में खड़े रहे लेकिन उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली।

अगले दिन वे एक दूसरे बैंक में गए, जहां उनका खाता था लेकिन वहां और भी लंबी कतार थी। लंबी कतार देखकर वे पहले वाले बैंक में ही आ गए। अचानक से उन्होंने हलचल सुनी। छड़ी और नकद और बैंक के कागज़ वाले प्लास्टिक बैग के साथ कतार में खड़े एक बुजुर्ग आदमी गिर गए थे। चिलचिलाती धूप में घंटों खड़े होने और थकावट के चलते ऐसा हुआ था। बिश्वास ने आगे बढ़कर उस आदमी को उठाया और कार में बिठाकर अस्पताल तक ले गए। दो घंटे बाद भी बुजुर्ग को होश नहीं आया। बिश्वास बताते हैं, “मैं दो दिन काम पर नहीं जा पाया था, कतार में खड़े होने के बाद भी मैं अपने नोट नहीं बदलवा पाया था। “ ऐसे में बिश्वास ने अपने बॉस को फोन करके एक और दिन की छुट्टी मांगी। बिना खाए पिए, आठ घंटे तक कतार में रहने के बाद बिश्वास पैसा तो बैंक में जमा करा पाए लेकिन उन्हें वापस महज दो हजार रुपये ही मिल पाए। बैकों में तेजी से नकद ख़त्म हो रहा था। बिश्वास बताते हैं, “ये विचित्र स्थिति थी।

केवल हमारे जैसे लोग ही नकद के लिए कतारों में लगे थे। पैसे वाले प्रभावी लोग कहां थे, जिनके बारे में कहा जा रहा था कि काफी पैसा जमा कर रखा है।” मोदी की घोषणा के बाद देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। शहरों में हर तरफ घबराए लोग नजर आने लगे जो बैंकों में अपना पैसा जमा करा कर, कम मूल्य के नोटों में पैसे निकाल रहे थे। बढ़ती मांग के सामने कैश मशीन खाली पड़ने लगे थे। ऐसी घटनाएं भी देखने को मिलीं जिसमें लोगों ने अवैध पैसों को जला दिया और लोग अस्पताल और अंतिम संस्कार तक का पैसा नहीं जुटा पाए। एक आदमी तो कथित तौर पर दिल्ली के एक मोबाइल स्टोर में तीस लाख रुपये के नोट लेकर पहुंच गया और वह पूरे पैसे से आईफ़ोन का स्टॉक खरीदना चाहता था।

इस दौरान बैंकों की लाइन में खड़े 100 से ज्यादा लोगों की हार्ट अटैक से मौत की खबर भी सामने आई। बिश्वास और उन जैसे ढेरों लोगों के सामने महीनों तक हालात ऐसे ही बने रहे। बिश्वास बताते हैं, “दफ्तर में हमेशा झूठ बोलता था, ताकि बाहर निकलकर बैंक से अपने पैसे निकाल सकूं। काम खत्म होने के बाद, मैं कैश के लिए बाहर भी निकलता था।””बाइक लेकर ग्रामीण इलाकों तक में जाता था ताकि वहां के एटीएम में कैश मिल सके। नकद निकालने के लिए तो मैं दिन भर में 12-12 एटीएम मशीन के चक्कर लगा लेता था।” एक डेंटल कॉलेज में जाने के लिए मुझे गार्ड को रिश्वत तक देना पड़ा, क्योंकि मैंने सुना था कि वहां मौजूद एटीएम का कम इस्तेमाल होता है, लेकिन वहां भी एटीएम से कैश कत्म हो चुका था।”मोदी ने अपनी अपील में लोगों से महज 50 दिन तक तकलीफ उठाने की बात कही थी। उन्होंने कहा था, “50 दिन, केवल 50 दिन मुझे दे दीजिए. मैं वादा करता हूं कि 30 दिसंबर के बाद आपको वो भारत दिखाउंगा जिसकी आप कल्पना किया करते हैं.”

एक साल बाद विश्लेषकों ने बताया कि मोदी का नोटबंदी का दांव पूरी तरह से नाकाम रहा। इसने भारत की नकदी पर चलने वाली अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को काफी नुक़सान पहुंचाया। छोटी छोटी फैक्ट्रियां बंद हो गईं, गरीब मजदूरों का रोजगार छिन गया। एक विश्लेषक ने बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में नोटबंदी के फैसले को ‘रेसिंग कार के टायर को पंक्चर करने’ जैसा उदाहरण बताया।
-सौजन्य : बीबीसी

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