संपादकीय

मतदान देश के लिए करें धर्म के लिए नहीं

Hisar Today

लोकसभा चुनावी महासमर के मध्य देश के तथाकथित ‘राजनेताओं’ के बोल बार-बार उनकी नीयत तथा इरादों को स्पष्ट करते जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि 2019 का लोकसभा चुनाव जानबूझकर जनसरोकारों से पूरी तरह भटक कर बेहूदा व निरर्थक मुद्दों की ओर भटकाने की कोशिश की जा रही है। बड़ी ही चतुराई से निठल्ले तथा समाज के मध्य धीरे-धीरे अपनी पकड़ ढीली करते जा रहे नेतागण धर्मों व जातियों के नाम पर समाज का ध्रुवीकरण करने की ओर पूरी कोशिश में लगे हुए हैं। यह खेल केवल भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस द्वारा ही नहीं खेला जा रहा बल्कि अन्य क्षेत्रीय दल भी धर्म-जाति के नाम पर वोट मांगने का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। हालांकि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट सहित चुनाव आयोग द्वारा भी नेताओं को यह हिदायत कई बार दी गई है कि वे राजनीति में धर्म-जाति का इस्तेमाल किए जाने से परहेज़ करें। परंतु जो नेता स्वयं को राष्ट्रविधाता व ‘महान राजनेता’ मानने की गलतफहमी पाले बैठे हों उनसे देश की किसी संवैधानिक संस्था के निर्देश पर अमल करने की बात सोचना ही बेमानी है।
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने पिछले दिनों सहारनपुर में आयोजित महागठबंधन की एक संयुक्त रैली को संबोधित करते हुए मुसलमान समुदाय के लोगों से महागठबंधन के पक्ष में मतदान करने की अपील की। उन्होंने उपरोक्त धर्म के लोगों से महागठबंधन के पक्ष में एकपक्षीय मतदान करने की सार्वजनिक रूप से गुज़ारिश की। इसके पूर्व मायावती दलितों के स्वाभिमान की रक्षा के नाम पर दलित समाज के मतों को अपने पक्ष में प्रभावित करती आई हैं। मायावती का राजनैतिक अस्तित्व ही दलित मतों के धु्रवीकरण के चलते बचा हुआ है। हालांकि बसपा संस्थापक काशीराम तथा स्वयं मायावती भी इसके पहले इसी मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध नागवार गुज़रने वाले कई वक्तव्य भी देते रहे हैं। गत् एक दशक से तो मायावती अपने जनाधार को और बढ़ाने तथा अपने ऊपर लगे ‘दलित नेता’ के टैग को हटाने के लिए दलित राजनीति को त्याग कर बहुजन समाज का अर्थ सर्वजन समाज बताने लगीं। और इस बार उन्हें मुस्लिम प्रेम भी पुन: सताने लगा। निश्चित रूप से मायावती के पास शायद इस बात का कोई जवाब न हो कि उन्होंने अपनी विगत् तीन दशक की राजनीति में मुसलमानों के कल्याण के लिए क्या किया है? परंतु उन्होंने मुसलमानों से महागठबंधन के पक्ष में एकतरफा मतदान करने का आह्वान कर दूसरे बहुसंख्यवादी राजनीति करने वालों को अपनी ज़ुबान और तेज़ करने का मौका ज़रूर दे दिया है।
भारतीय जनता पार्टी में योगी आदित्यनाथ की गिनती ऐसे नेताओं में है जो संविधान,कानून तथा मर्यादाओं की परवाह किए बिना जब जो चाहें बोलते रहते हैं। इस बार फिर योगी ने शायद मायावती से ही प्रेरणा पाकर गत् दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक सभा में यह कहा कि-‘यदि उन्हें (विपक्ष) को मुसलामानों के मतों का ध्रुवीकरण करना है तो भारतीय जनता पार्टी को भी हिंदुओं को एक करने में कोई हिचक नहीं है। इसके बाद उन्होंने अपना वही वाक्य दोहराया जो पिछले चुनावों के दौरान भी वे बोलते रहे हैं। योगी ने आगे कहा कि इन (विपक्षी) दलों को यदि अली का सहारा है तो यहां भी बजरंग बली का सहारा है। योगी ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के अनेक शीर्ष नेता इस समय लोकसभा चुनाव में पूरे देश में घूम-घूम कर किसी न किसी बहाने धर्म व संप्रदाय की राजनीति कर रहे हैं। पाकिस्तान व आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दों को भी धर्म से जोडऩे की नापाक कोशिश की जा रही है। इसी प्रकार अखिेलश यादव ने यादव मतों में अपनी घुसपैठ और अधिक बढ़ाने की $गरज़ से यादव के नाम की सैन्य रेजीमेंट स्थापित करने की घोषणा कर दी है। गोया प्रत्येक नेता अपनी लोकप्रियता हासिल करने के लिए किसी न किसी धर्म व जाति को लुभाने जैसे शार्टकट का इस्तेमाल कर रहा है।
देश में पहली बार कुछ सत्ताधारी नेता यह कहते भी सुने जा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद भारतीय संविधान की जगह मनुस्मृति को संविधान के रूप में लागू किया जाएगा। एक $फायरब्रांड भाजपा सांसद यह भी कह चुके हैं कि 2019 के बाद संंभवत: देश में पुन: चुनाव ही संपन्न नहीं होंगे। संविधान तथा देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर धार्मिक रंग पोतने तथा इसे अपने रंग में रंगने का प्रयास किया जा रहा है। सवाल यह है कि स्वतंत्रता के 70 वर्षों के बाद आज क्या वजह है कि हमारा देश आगे बढऩे व आगे देखने के बजाए पीछे की ओर देखने के लिए बाध्य किया जा रहा है। देश में पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से ऐसे विषय पढ़ाए व गढ़े जा रहे हैं जो समाज में नफरत फैलाते हों। पूरे देश में विभिन्न शहरों,स्टेशन,जि़लों, कस्बों, बाज़ारों तथा भवनों आदि का नाम परिवर्तन करना भी इसी प्रकार की राजनीति का एक महत्वूपर्ण हिस्सा है। ज़रा सोचिए कि उर्दू बाज़ार का नाम हिंदी बाज़ार कर देने या मुग़ल सराय जंक्शन का नाम दीन दयाल उपाध्याय नगर कर देने से क्या देश के किसी वर्ग को कोई लाभ पहुंच सकता है? परंतु ऐसा करने से देश के सीधे व सादे मतदाताओं के दिमा$ग में वे यह ज़रूर बिठा देते हैं कि हम ही तुम्हारी संस्कृति व पहचान के वास्तविक संरक्षक हैं। और धर्म व संस्कृति की ऐसी घुट्टी पिलाकर वे मतदाताओं के मस्तिष्क पर एक प्रकार से अपना ताला लगा देते हैं ताकि वह जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों की ओर सोचने के लाय$क ही न रह जाए।
अन्यथा भारतवर्ष की पहचान पूरे विश्व में एक ऐसे देश के रूप में बनी हुई है जो अनेक धर्मों व जातियों के लोगों का एक संयुक्त,सुंदर गुलदस्ता है। प्राचीनकाल से ही इस देश में अनेक धर्मों व जातियों के लोग संयुक्त परिवार के रूप में रहते आ रहे हैं। यह वह देश है जहां मुस्मिल कवि हिंदू देवी-देवताओं की प्रशंसा में काव्य पाठ कर स्वयं को भारतीय इतिहास में रहीम,रसखाऩ तथा जायसी के रूप में स्थापित कर लेते हैं। यह वह देश है जहां के मंदिरों व शिवालयों में मोहम्मद रफी के गाए तथा शकील बदायूंनी के द्वारा रचे गए भजनों के बिना भजन-आरती पूरी नहीं होती। यह वह देश है जहां गुरू नानक देव अपने परम सहयोगी मुस्लिम समाज से जुड़े संत बाला मरदाना को भी अपना परम शिष्य मानते रहे हैं। यहां के अनेक हिंदू राजा हज़रत इमाम हुसैन की याद में मोहर्रम व ताजि़यादारी आयोजित करते रहे हैं। पाकिस्तान की सेना को धूल चटाने वाला परमवीर चक्र विजेती वीर अब्दुल हमीद इसी देश की मिट्टी में जन्मा भारत का महान सुपूत था। मिसाईलमैन एपीजे अब्दुल कलाम ने देश की मिसाईल रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करते समय शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि हमारे देश में कुछ ऐसे नकारात्मक सोच रखने वाले नेता भी अपना सिर भारतीय समाज में बुलंद कर सकेंगे जिन्हें धर्म-जाति की राजनीति करने व सांप्रदायिकता का ज़हर उगलने के सिवा और कुछ नहीं आता।
भारतीय मतदातओं के लिए 2019 का चुनाव निश्चित रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मतदातआों के लिए यह एक ऐसा सुनहरा अवसर है जबकि वे धर्म व जाति की राजनीति करने वालों तथा जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों से मुंह फेरने वाले नेताओं को अपने बहुमूल्य मतदान द्वारा करारा जवाब दें। देश के समस्त नागरिाकों को एक स्वर में बोलना चाहिए कि बजरंग बली भी हमारे हंै अली भी हमारे हैं। राम भ्ी हमारे रहीम भी हमारे ,नानक भी हमारे और ईसा भी हमारे। जब भारतीय मतदाता एक स्वर में ऐसी भाषा बोलने लगेगा यकीन कीजिए इन सांप्रदायिकता व जातिवादी राजनीति करने वाले नेताओं को अपना मुंह छुपाने के लिए ढूंढने पर भी कहीं जगह मयस्सर नहीं होगी।

Tags
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close