संपादकीय

मंदिर के बाहर सड़क पर लावारिस टहलती गौमाता

बात कहने का सबसे अच्छा तरीका होता है कि बिना किसी लाग-लपेट के सीधे कहें। इसका एक फायदा है कि आपकी बात मुझे समझ नहीं आई कहने का मौका हम सामने वाले को नहीं देते। मैं भी हिंदू धर्म के चार-धाम में से एक धाम द्वारका की अपनी यात्रा के बारे में बिना किसी लाग-लपेट के सीधे शब्दों में कहूं तो मेरा अनुभव था कि यहां ईश्वर मिलना तो दूर इंसानी जिंदगी की बुनियादी तमीज भी नहीं देखने को मिली। मंदिर के अंदर कथित दर्शन के लिए चीखते, औरतों को धक्का देते, लाइन तोड़ बैरिकेड्स पर चढ़ते लोग थे।

मंदिर के बाहर सड़क पर लावारिस टहलती गौमाता, कुछ भिखारी और थोड़ा आगे चलने पर रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त सामान्य शहरी समाज था। मैंने व्यक्तिगत तौर पर पिछले कुछ सालों में कई शहरों की यात्रा की है और किसी शहर के मंदिर ने मुझे कभी आकर्षित किया हो या वहां लौटने का खयाल दिल में आया हो, ऐसा मुझे याद नहीं है। पहले हम सुदामा सेतु पहुंचे जहां से कथित तौर पर श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा भी कृष्ण के अतुलनीय वैभव वाले दरबार में पहुंचे थे। सुदामा सेतु से कुछ ही आगे चलने के बाद आप अरब सागर के पास पहुंच जाते हैं। मेरे दिल में खयाल आया कि पूछूं जिस कृष्ण ने अर्जुन को इस लीला लोक और शरीर की नश्वरता अनादि लोक आदि का ज्ञान दिया था, उन्हें दोपहर को विश्राम की क्या जरूरत? दर्शन में महिलाओं की जितनी लंबी लाइन थी, उतने ही भक्त लाइन के बाहर एक-दूसरे को धक्का देने में व्यस्त थे।

कुछ अपनी सुपर फिटनेस का प्रदर्शन करने में जुट गए और खंभों और बैरिकेड्स पर ही चढ़कर दे जोर-जोर से जयकारे लगा रहे थे। इस मनोरम दृश्य को देखकर मेरा मन अतिरिक्त श्रद्धा से नतमस्तक-सा ही हो गया और मैंने भी अपनी फिटनेस का फायदा उठाते हुए एक खंभे पर तत्परता से चढ़ते हुए अपना एक पैर टिका दिया और प्रभु के मनोरम रूप के दर्शन कर लिए। चूंकि मेरे पास कोई प्रसाद या फूल वगैरह तो था नहीं, जिसे चढ़ाना जरूरी हो तो मैंने वहां से निकल लेना ही ठीक समझा। मंदिर के स्थापत्य को देखने और कुछ खाली से लगते आंगन में घूमने के बाद मैं बाहर निकल गया। मंदिर के बाहर जैसा कि प्रसाद और दूसरी चीजों की कई दुकानें थीं तो वहां लोग जुटे थे।

कुछ लावारिस-सी दिखती गौ-माता भी यदा-कदा टहलती कहीं से कुछ अपने मुंह में डालकर भूख मिटाती-सी प्रतीत हुईं। अचानक मैंने देखा कि कृष्ण की नगरी में उनकी अत्यंत प्रिय गौ-माता पर बेरहमी से एक पटरे के दुकान की मालकिन दे-दनादन दो-चार छड़ी टाइप कुछ बरसा रही थीं। मेरा मन अपार आश्चर्य से भर उठ कि गौ-माता पर ऐसा अत्याचार वह भी राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण प्रधानमंत्री के गृह-राज्य में? खैर! माजरा समझ में आ गया कि बेचारी भूखी गौ-माता ने उस दुकान के पटरे पर लगे बहुत से सामन को अपना आहार बना लिया था। अगर धामों की यात्रा से ईश्वर मिलते हैं, मन की शांति मिलती है तो मेरा अनुभव तो उससे कुछ अलग ही था। हालांकि, ईश्वर का अर्थ अगर सत्य है, ईश्वर का अर्थ जीवन की महत्ता को समझना, अपनी हर धड़कन, हर सांस को सुन पाना है तो जरूर मैंने द्वारका में ईश्वर के अंश को महसूस किया।

वह किसी मंदिर, किसी आरती और दर्शन में नहीं अपने डर पर काबू पाकर अरब सागर की अतल गहराइयों में महसूस किया। पानी से मुझे थोड़ा डर तो है और मैं 3 साल की कोशिश के बाद भी स्विमिंग नहीं सीख पाई हूं। फिर भी अपनी क्षमता और डर की सीमाओं के बाद भी मैंने अरब सागर में जीवन में पहली बार स्कूबा डाइविंग की। स्कूबा डाइविंग के दौरान मेरे चारों तरफ सिर्फ अथाह समुद्र और उसका नीला पानी था। मछलियों को मैंने अपने तलुए से छूकर जाते महसूस किया, चट्टान पर उग आए समुद्री पौधों को अपनी अटल गरिमा के साथ टिके हुए देखा।

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