संपादकीय

मंत्री बदल दोगे मगर बेमान नौकरशाहों को कब!

Hisar Today 

यह एक सच्ची घटना है। एक व्यक्ति को अपनी बेटी का मेडिकल में दाखिला करवाना था। सोचा की मंत्री जी के कोटे से बेटी का दाखिला अच्छे कॉलेज में हो जाएगा। मंत्री के पीए ने भरोसा दिलाया की दाखिला हो जाएगा आप ऐसा करो…… रकम जमा करवा दो। उस व्यक्ति ने रकम जमाकरवाई मगर जब मेडिकल परीक्षा के बाद पेसेंटज थोड़ा कम आया तो उस मंत्री का पिए बोलने लगा की ऐसा करो किसी दूसरे कॉलेज में आयुर्वेद में अड्मिशन ले लो। एयर नहीं लेना है तो जाओ। उस व्यक्ति ने अपने लाखो रूपए उस मंत्री के पीए को दिए थे, मगर उस व्यक्ति ने काम न होने पर पैसे वापस नहीं किया बल्कि सारे लाखो रूपए डकार कर बैठ गया और फ़ोन उठाना बंद कर दिया।
यह घटना मैं बताना नहीं चाहती थी, क्यूंकि इससे परीक्षा देकर मेरिट में आने वाले विधयर्थियो का सरकार से भरोसा उठ जाता और उन्हें लगता की आजकल दाखिले पैसे से होते है तो उनकी मेहनत का क्या फायदा। मगर अफ़सोस है यही हकीकत है। मंत्रियो से मिलने के लिए सेटिंग की जरुरत होती है ,इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि अपने देश में मंत्रियों या पार्टियों के बदलने से बहुत कुछ नहीं होगा बल्कि हर फसाद की जड़ कभी कभी नौकरशाही भी होती है, ईमानदार नौकरशाह बेहद कम दिखाई देते है। वैसे आपने अक्सर नेताओं को यह कहते सुना होगा कि उनकी नीतियों को नौकरशाही फेल कर देती है। स्पष्ट उदाहरण नोटबंदी का है, जब बैंक के अधिकारियों ने पुराने नोटों को बदल कर सरकार की नीति को फेल कर दिया था। इसलिए मेरा मानना है कि आने वाली सरकार को कुछ ऐसे उपाय करने होंगे कि नौकरशाही जनता के लिए उपयोगी बन सके।
मगर ऐसे कौन से उपाय है जिससे यह सब मुमकिन हो सकता है। मुझे लगता है पहला उपाय है कि संवैधानिक पदों पर जिन व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है उनकी उपयुक्तता पर सार्वजनिक बहस हो। चीफ विजिलेंस कमिश्नर, कंट्रोलर एवं ऑडिटर जनरल, चीफ इलेक्शन कमिश्नर आदि ऐसे पद हैं, जो शासन-व्यवस्था को सही दिशा देते हैं। वर्तमान में इनमें से कुछ की नियुक्ति करने वाली कमेटी में विपक्ष के नेता को सदस्य बनाया जाता है, लेकिन जिन व्यक्तियों को इन पदों पर नियुक्त किया जाता है उनके कार्यकलापों और चरित्र पर सार्वजनिक बहस नहीं होती।
इस मामले में हमें अमेरिका से सीख लेने की जरूरत है। वहां ऐसे पदों पर नियुक्ति के लिए संबंधित व्यक्ति को राष्ट्रपति मनोनीत करता है। उसके बाद संसद की एक कमेटी उस व्यक्ति का साक्षात्कार लेती है। संसदीय समिति की सहमति होने पर ही उस व्यक्ति की नियुक्ति मानी जाती है अन्यथा राष्ट्रपति किसी और व्यक्ति को मनोनीत करता है। ऐसा करने से सही व्यक्ति के मनोनीत होने की संभावना बढ़ जाती है।
दूसरा उपाय है कि सभी सरकारी विभागों की बाहरी ऑडिट कराई जाए। वर्तमान में सार्वजनिक इकाइयों जैसे बैंकों एवं एयर इंडिया की बाहरी ऑडिट कराई जाती है, लेकिन सरकार के अपने विभागों की ऑडिट केवल कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) द्वारा की जाती है और रपटों को संसद के पटल पर रखा जाता है। यह व्यवस्था सही होते हुए भी अपर्याप्त है क्योंकि सरकार के ही एक विभाग द्वारा सरकार के दूसरे विभाग की ऑडिट की जाती है जिससे ऑडिट में पारदर्शिता का अभाव दिखता है। इसके लिए जरूरी है कि सभी सरकारी विभागों की ऑडिट बाहरी ऑडिटरों द्वारा कराई जाए और इन बाहरी ऑडिटरों की नियुक्ति भी सार्वजनिक माध्यम से हो।
तीसरा उपाय है कि ऑडिट को केवल आय और व्यय के आकलन तक सीमित न किया जाए। वर्तमान में सीएजी का कार्य मुख्य रूप से यह देखना है कि खर्च नियमानुसार किए गए हैं अथवा नहीं। यह नहीं देखा जाता कि इन खर्चों की उपयोगिता क्या है। जैसे सरकार ने यदि गंगा की सफाई के लिए अमुक राशि खर्च की तो सीएजी देखेगा कि सक्षम अधिकारी से स्वीकृति ली गई अथवा नहीं। यह नहीं देखेगा कि खर्च का अंतिम परिणाम क्या रहा?
गंगा के पानी में स्वच्छता कितनी बढ़ी? सरकार के हर कार्य का कोई उद्देश्य होता है। जैसे छात्र स्कूल जाता है तो उसका उद्देश्य परीक्षा में पास होना होता है। यदि छात्र का आकलन केवल इस बात से किया जाए कि वह स्कूल समय से गया या नहीं, तो बात नहीं बनती है। देखना होता है कि वह परीक्षा में कितने नंबर से पास हुआ। इसी प्रकार सीएजी द्वारा आय-व्यय का ऑडिट करना पर्याप्त नहीं है। देखना चाहिए कि खर्च का सही प्रभाव पड़ा या नहीं। इसे इंपैक्ट ऑडिट कहा जाता है। यह व्यवस्था अपने देश में लागू करने की जरूरत है।
वर्तमान में अधिकारियों की जनता के प्रति जवाबदेही नहीं होती है। उनकी जवाबदेही मंत्रियों अथवा सीएजी तक सीमित होती है। उदाहरण के लिए यदि बिजली विभाग का अधिशासी अभियंता अकुशल एवं भ्रष्ट है तो जनता उस पर कोई दबाव नहीं डाल सकती है। किसी समय मैं एक पांच सितारा एनजीओ का मूल्यांकन कर रहा था। मुझे संदेह हुआ कि कुछ गड़बड़ी है, लेकिन समझ में नहीं आया। तब मैंने एनजीओ के लगभग एक हजार सदस्यों को एक प्रश्नावली डाक के माध्यम से भेजी और उनसे पूछा कि आप बताएं, एनजीओ के कामकाज से आप संतुष्ट हैं अथवा नहीं। लगभग तीन सौ ने जवाब दिए और एनजीओ की तमाम गलतियां सामने आ गईं। इसी प्रकार चौथा उपाय यह किया जा सकता है कि आईएएस ऑफिसर ने जिन विभागों में कार्य किया है उसके कुछ उपभोक्ताओं को गुप्त पत्र भेजा जाए और उनसे उस अधिकारी के कार्यों की सूचना ली जाए।
पांचवां उपाय है कि सूचना के अधिकार की तर्ज पर एक जवाब के अधिकार का कानून बनाया जाए। सूचना के अधिकार में आप वही सूचना प्राप्त कर सकते हैं जो विभाग की फाइलों में उपलब्ध है। लेकिन आप कोई प्रश्न नहीं पूछ सकते हैं। जैसे पुल बनाने में कितना खर्च हुआ यह जानकारी आपको सूचना के अधिकार से मिल सकती है लेकिन यदि आप यह पूछना चाहें कि इस पुल को 10 फुट चौड़ा बनाने की जगह 20 फुट चौड़ा क्यों नहीं बनाया गया, तो आपको इसका कोई अधिकार नहीं है।
इस अधिकार के न होने से जनता और नौकरशाहों के बीच संवाद नहीं हो पाता है इसलिए जवाब के अधिकार का कानून बनाना चाहिए जिसमें अधिकारी को जनता द्वारा पूछे किसी भी प्रश्न का समुचित उत्तर देना अनिवार्य हो।हमें समझना चाहिए कि एक पार्टी के स्थान पर दूसरी पार्टी को बिठाने से देश की परिस्थिति में मौलिक सुधार नहीं आ रहा है। मंत्री भी नौकरशाहों से परेशान रहते हैं। इसलिए नौकरशाही पर नकेल कसने के लिए ढांचागत सुधार लागू करने चाहिए। हिसार का ही उदाहरण ले लीजिये कितनी बार मंत्रियो ने स्वस्थ व्यवस्था सुधारने को लेकर अधिकारियों को लताड़ लगाई , मगर अधिकारी इतने ढीट हो जाते है कि काम ही नहीं करते। अब हिसार के काफी इलाकों में काफी दिनों तक कूड़ा उठाने वाले नहीं आते, ऐसे में आम जनता क्या करेगी वह सूखा कचरा तंग आकर घर या दूकान के सामने जला देती है। और फिर आते है अधिकारी दंड वसूलने। बताओ तो यह हद्द नहीं तो क्या है. एक तरफ डिपार्टमेंट के लोग शहर की स्वछता पर धयान नहीं देते और ठीक दूसरी तरफ बड़ी बड़ी बातें करते है।
अगर आपने अधिकारियों को खुश करने का गुर सिख लिया तो आपका काम तो होगा ही साथ ही अगर काम में कुछ अड़चन आयी तो उसके उपाय भी यही अधिकारी आपको मुफ्त में बता कर चले जाएंगे। मगर ऐसा नहीं की सभी नौकरशाह बेमान है हरियाणा के खेमका और प्रदीप कासनी इनसब में बेहद जुड़ा है। वो अपनी ईमानदार कार्यो के कारण कई बार तबादले के सिखर हो चुके है। खुद अशोक खेमका तो वह जीता जागता उदाहरण है कि खुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा उनके मूल्यांकन के नंबर घटाने का काम करके उनके प्रमोशन में अड़चन डालने का काम किया और यह मामला खेमका ने कोर्ट में लड़कर जीता। जो इस बात का साबुत है कि ईमानदार नौकरशाहों की कमी नहीं।

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