संपादकीय

भूमिगत जल संकट से जूझता देश

बिकूपट्टी उत्तरी बिहार में एक छोटा सा गांव है। आजकल इस गांव के लोग दुखी हैं। यहां पेयजल के एक मात्र साधन हैंडपंप ने पानी देना बंद कर दिया है। तालाब और कुएं पहले ही सूख चुके हैं। यह गांव एक छोटी नदी के बाएं तट पर बसा है। इतिहास लेखन के पहले से लखनदेही और भदनदेही नाम की यह नदी सदानीरा रही परंतु पैंसठ साल पहले विकासवादियों की इसे नजर लग गई। नतीजतन अब यह एक अर्से से सूखी हुई है। बरसात के दिनों में भी इसकी प्यास नहीं बुझती है। इसकी जमीन पर कब्जा करने की नीयत से ईंट-पत्थरों की अट्टालिकाएं खड़ी करने में आम लोगों और सरकारी संस्थानों के बीच की प्रतिस्पर्धा किसी से छिपी नहीं है। आज आलम यह है कि नदियों की अठखेलियों के लिए ख्यात उत्तरी बिहार में भूगर्भ जल भी शेष नहीं बचा। यह समस्या इसी गांव तक सीमित नहीं है। देश भर में ऐसे गांवों की संख्या लाखों में है। पानी के इस संकट को इंगित करने के लिए तीसरे विश्व युद्ध की बातें लंबे समय से होती रही हैं।

विधान भवन और संसद के अलावा न्यायालय भी भूगर्भ जल के संकट पर लंबे समय से सुनवाई कर रही है। एक दशक की सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को इसके प्रबंधन और नियमन के लिए एक प्राधिकरण गठित करने का फैसला सुनाया था। फलत: 14 जनवरी 1997 को केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड का गठन किया गया। यह भूमिगत पानी के दोहन के लिए जल संसाधन मंत्रालय के अधीन कार्यरत एक वैज्ञानिक संगठन होने का दावा करती है। पिछले 22 सालों में इस संस्थान द्वारा संरक्षण और संवर्धन के नाम पर की गई तमाम कोशिशों के बाद भी भूमिगत जल के स्तर में गिरावट ही दर्ज की गई है। बीते 12 दिसम्बर को जारी इसकी अधिसूचना में शुल्क जमा कर विभिन्न कार्यों के लिए जल की निकासी का प्रावधान किया गया, जिसे 1 जून 2019 से लागू करने की बात कही गई। फिर एन.जी.टी. में चल रही सुनवाई के दौरान सरकार की फजीहत होने लगी।

इसके चेयरमैन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे राष्ट्रहित में नहीं माना है। इस आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि यह अधिसूचना लागू करने से भूगर्भ जल का शीघ्र ही क्षरण होगा, जल के स्रोत नष्ट होंगे और यह संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित मौलिक अधिकारों का हनन है। पर्यावरण और जल संरक्षण मामलों के तमाम विशेषज्ञ इसमें सुर मिला रहे हैं। इस आदेश के अवलोकन से स्पष्ट है कि बोर्ड की इस मानसिकता के भरोसे भूमिगत जल के स्तर में वृद्धि दूर की कौड़ी ही है। मैदानी भाग के ग्रामीण क्षेत्रों में पचासी फीसदी जल की आपूर्ति भूमिगत पानी से होती है। साथ ही दो तिहाई कृषि क्षेत्र भी इसी पर निर्भर करता है।

सदियों से इसके निर्माण से लेकर संरक्षण और संवर्धन तक की सारी जिम्मेदारी उठाने में स्थानीय लोगों की अहम भूमिका रही है परंतु आज वह तंत्र छिन्न-भिन्न हो चुका है। सरकारी तंत्र द्वारा विकसित आधुनिक परियोजनाओं से पहले विभिन्न किस्मों के कुएं और तालाब बारिश की बूंदों को सहेज कर भूमिगत जल के स्तर को उन्नत करते रहे। यंत्रचालित ट्यूबवैल के इस्तेमाल के साथ जल संवर्धन की यह प्रक्रिया शिथिल होती गई। बिना जमा किए निकालने का क्रम कब तक चल सकता है। आखिरकार उस जल बिरादरी को नष्ट किया गया जिसने लंबे अर्से तक संरक्षण और संवर्धन का काम बाखूबी संभाले रखा था।

केन्द्र सरकार की यह एजैंसी यदि वाकई जल संरक्षण के लिए जिम्मेदार होती तो हालात बेहतर होते। पिछले दो दशकों में भूमिगत जल का हरण और इनके स्रोतों का क्षरण बड़ी तेजी से हुआ है। इसके कार्यों का दावा स्वयं ही हकीकत बयां करती है। यह भूमिगत जल के संवर्धन के बदले इसकी निकासी के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करती है। इस पर शुल्क भी वसूलती है। इससे जल निकासी से जुड़े कार्यों में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों के व्यापार में वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त जल संरक्षण के पुराने ढांचे को नष्ट कर नए मानकों के अनुरूप कार्य करने वालों को प्रोत्साहित करती है। हैरत की बात है कि यह जल संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वालों को खोजने हेतु जाती भी नहीं है बल्कि उन्हें ही अपने पास बुलाती है। भारत में जल सेवा और संरक्षण पवित्र कार्य माना जाता है।

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