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‘भारत छोड़ो आंदोलन’ वाली जगह पर कांग्रेस की बैठक में ड्रामेबाजी

Hisar Today

हाल में कांग्रेस ने एक तरह से 2019 के आम चुनावों के लिए अपने प्रचार अभियान का आगाज कर ही दिया है। कांग्रेस पार्टी ने अपनी इस महात्मा गांधी के दिखाए रास्ते और दर्शन पर चलने की प्रतिबद्धता दोहराई, साथ ही बीजेपी-आरएसएस के साथ लड़ाई को दो परस्पर विरोधी विचारों का युद्ध करार दिया। इसे समावेशी और निष्पक्ष भारत बनाम घमंड और नफरत भरे भारत का संघर्ष बताते हुए कांग्रेस ने विभाजनकारी और पूर्वाग्रह भरी ताकतों और मोदी सरकार की नफरत और प्रतिशोध वाली राजनीति के खिलाफ नये ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ छेड़ने की जरुरत बताई। अहम फैसले लेने वाली कांग्रेस की सर्वोच्च समिति की बैठक का आयोजन स्वतंत्र भारत में पहली बार सेवाग्राम में किया गया कांग्रेस ने दो घंटों से भी कम समय तक चली इस बैठक को ‘ऐतिहासिक’ करार दिया।

कांग्रेस वर्किंग कमेटी की यह बैठक ऐसे समय आयोजित कि गयी थी जिस समय में किसानों का आंदोलन उग्र, बेरोजगारी की आग, बढ़ती महंगाई देश वासियों के सामने मुंह बाए खड़ी हो। मगर बावजूद इसके इस बैठक में दो नए प्रस्ताव पारित किए। पहला-महात्मा गांधी की विरासत को याद करना और दूसरा- परेशान किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना। यह प्रस्ताव किसान क्रांति मार्च के तहत दिल्ली की ओर कूच कर रहे किसानों पर हुए लाठीचार्ज को ध्यान में रखते हुए पारित किया गया। लेकिन कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक एक ऐसा कार्यक्रम साबित हुई जिससे कोई ठोस संदेश नहीं निकला। गौरतलब है कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी 2019 के आम चुनावों से पहले चार राज्यों में होने जा रहे काफी अहम विधानसभा चुनावों से पहले हाल-फिलहाल दोबारा बैठक नहीं करेगी।

पार्टी के प्रवक्ता कहते हैं कि किसानों और बेरोजगारों से किए गए वादों व गठबंधन बनाने के सवालों को लेकर दो अलग कमेटियां बनी हुई हैं मगर मसलों को हाल में हुई बैठक में पारित दोनों प्रस्तावों के आधार पर ही हल किया जाएगा। प्रवक्ता की इस बात से यह इसका मतलब यह हुआ कि हमें यह जानने के लिए अभी इंतज़ार करना होगा कि किसानों के संकट और बेरोज़गारी के सवाल से निपटने के लिए कांग्रेस क्या करेगी। कोई कांग्रेस का समर्थन क्यों करे? कांग्रेस वर्किंग कमेटी एक और अहम सवाल का जवाब देने में नाकाम रही कि एक आम आदमी या महिला क्यों उनकी पार्टी का फिर से समर्थन करे? इस बार कांग्रेस ने गरीबो और आम -मध्यम वर्गीय लोगो के लिए क्या उपाय खोज निकाले है?

तीन दशकों से कांग्रेस ने ऐसा कोई जन आंदोलन नहीं चलाया है जो कोई विलक्षण सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन लाया हो। इस कारण पैदा हुए जन आंदोलनों के शून्य और विपक्षी पार्टी के अभाव को भरने में कांग्रेस नाकाम रही है। बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि कांग्रेस, महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत पर छोटे-बड़े आंदोलन शुरू करने का इरादा रखती है। कांग्रेस ने एक पदयात्रा भी निकाली जो बाद में एक रैली में तब्दील हो गई। इसमें राहुल गांधी ने 2019 के लिए प्रचार अभियान का आगाज किया और लोगों से यह कहते हुए एक बार फिर कांग्रेस में विश्वास जताने के लिए कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार सभी मोर्चों पर विफल साबित हुई है। पार्टी का इरादा तो सही था मगर कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने संगठनात्मक ढांचे, दूरदृष्टि, न्यू इंडिया की संकल्पना और जनता से फिर से नाता जोड़ने जैसी चुनौतियों पर कुछ नहीं किया।

गौरतलब है कि ऐसा लंबे समय बाद पहली बार हुआ था जब कांग्रेस के नेता सेवाग्राम आश्रम आए थे। ये वही जगह थी जहां से गांधी की कांग्रेस ने जुलाई 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू किया था। इसलिए सभी इसी आशा में थे कि इस जगह आयोजित बैठक के बाद कांग्रेस का अगला चुनावी रूप और उसकी रुपरेखा दिखाई देगी। परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कांग्रेस वर्किंग कमीटी हमेशा की तरह जनता में विश्वास पैदा करने में विफल रही। जिस प्रकार से हाल के दिनों में राहुल ने राफेल और महंगाई के मुद्दे पर केंद्र कि मोदी सरकार के पसीने छुड़ा दिए है। मगर जितना राहुल आक्रामक दिखे उतना बैठक के नतीजे नहीं। आलोचना प्रधानमंत्री मोदी की तो सभी ने कि मगर नतीजे बैठक में नजर नहीं आए।

11 से 15 मार्च 1948 तक महात्मा गांधी के 150 पक्के समर्थकों को वर्धा के पास सेवाग्राम के उसी महादेव स्मारक भवन में पांच दिनों तक बंद रखा गया था, जहां हाल में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई। महादेव स्मारक भवन को महात्मा गांधी की ऐसी धरोहर के तौर देखा जाता है, जहां उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक चिंतन किया था। इसे 1942 से 1944 के बीच बापू के करीबी सहयोगी और साथी महादेव भाई देसाई को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाया गया था। महादेव भाई देसाई की बड़ी इज्जत थी। उनकी मृत्यु अगस्त 1942 में हुई थी। उस समय बापू भारत छोड़ो आंदोलन को लेकर जेल में थे। 1944 में जेल से बाहर निकलने के बाद इसी हॉल में उन्होंने पहली बैठक को संबोधित किया था। बता दे कि यहां जो मीटिंग हो रही थी, पहले वह फरवरी 1948 में होनी थी। बापू चाहते थे कि इसमें उनके सहयोगी कांग्रेस का विघटन करने और कई संगठनों का एक बड़ा समूह बनाने पर विचार करें। बापू ने इसके लिए नाम भी सोचा था- लोक सेवक संघ। जो लोग इस सभा में आए, उन्होंने खुद से और नए देश से एक सवाल पूछा था, “क्या हमें यकीन है कि हम सत्य और अहिंसा के रास्ते ऐसा समाज बना सकेंगे जो समानता और न्याय पर आधारित हो? “उनके इस सवाल के पीछे संगठनात्मक दुविधा भी थी- ऐसा कौन सा ज़रिया होगा जो कांग्रेस और उसकी पार्टी की सरकार को निष्पक्ष और न्याय संगत समाज की ओर बढ़ने में मदद करेगा?

पूरे कांग्रेस नेतृत्व को इस सवाल पर विचार करना चाहिए- ‘सर्वोदय’ और देश में चल रहे अन्य रचनात्मक कार्यों के साथ उनका वैसा कोई जुड़ाव क्यों नहीं है, जैसा एक समय हुआ करता था? कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने सर्वोदय (सबका उदय, सबका विकास) के साथ फिर से जुड़ने का मौका खो दिया है। भले ही कांग्रेस के नेता इस बात को न जानते हों, यह बताना जरूरी है कि कांग्रेस को इस बात के लिए सर्व सेवा संघ का आभारी होना चाहिए कि उसने अपने महादेव स्मारक भवन को उसकी बैठक के लिए देने के लिए सहमति दे दी। वरना कुछ दिन पहले आश्रम के ट्रस्ट के अधिकारी ने स्पष्ट रूप से इस परिसर में कांग्रेस की बैठक की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि प्रार्थना करने वालों का यहां स्वागत है मगर राजनीतिक बैठक करने वालों का नहीं। महादेव भवन में कांग्रेस की बैठक को लेकर गांधीवादियों का एक वर्ग अभी भी नाखुश है। बापू के निर्मल और शांत सेवाग्राम आश्रम में तकरीबन एक घंटे स्पष्ट तौर पर निर्जीव सा माहौल बना हुआ था।

सुरक्षाकर्मियों ने आम लोगों को आश्रम के परिसर से बाहर निकालना शुरू कर दिया था। दूसरे छोर से कांग्रेस पार्टी के खास चुने हुए लोग आए और एक समय राष्ट्रपिता की निवास स्थल रही ‘बापू कुटी’ के सामने बिछाए गए गद्दों पर बैठ गए। भजन शुरू किया। घंटे भर भजन गायकी, कुछ अन्य गतिविधियां और फोटो खींचने का दौर जारी रहा। पहली पंक्ति पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बैठे थे। वे खामोश बैठ उस महान आत्मा का ध्यान कर रहे थे जिन्हें उनकी पार्टी अपने लिए एक मार्गदर्शक शक्ति मानती है। फिर वे पास में ही सेवाग्राम परिसर में मौजूद पांच गांधीवादी संस्थानों में से एक नाइ तालीम समिति द्वारा चलाए जा रहे स्कूल में गए। खाना खाने बाद उन्होंने अपने बर्तन बापू की शिक्षा के आधार पर साफ किए, जो कहते थे – अपने बर्तन और कपड़े ख़ुद साफ़ करने चाहिए। ये ऐसा कार्यक्रम था जो अधिकारी वर्ग के पहले से ही तय कार्यक्रमों की तरह चला। यह ऐसा सम्मेलन नहीं था जिसमें कोई अपनी आत्मा को तलाश रहा हो।

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