संपादकीय

बंगाल में बब्बर शेर और बंगाल की शेरनी की दहाड़

Hisar Today

पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो और चुनाव के हर चरण में होने वाली हिंसा चिंता का विषय बनती जा रही है। इस घटना के बाद तल्ख बयानबाजी आरोप-प्रत्यारोपों का दौर भी काफी तेज हो गया है। आखिर इस चुनाव में ऐसा क्या है की पहली बार यह लड़ाई ममता बनाम मोदी और शाह हो गई हैं।
इससे पहले राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच खूनी टकराव, हत्या, प्रत्याशियों पर हमले, पोस्टर-कटआउट फाड़ने, रैली करने से रोकने, कभी हेलीकॉप्टर को उतरने से मना करने जैसे वाकये आए दिन सुर्खिया बटोरे हुए थे। वैसे सवाल यह उठ खड़ा होता है कि भारतीय जनता पार्टी आज हर राज्य में चुनाव लड़ रही है मगर फिर हिंसा की खबर सिर्फ पश्चिम बगाल से ही क्यों आ रही है। जाहिर है तृणमूल कांग्रेस आक्रामक मुद्रा में प्रतिकार कर रही है, वह भी उस मुख्यमंत्री के राज्य में जो कभी वामपंथियों की हिंसा के विरोध में देशभर में सुर बुलंद किया करती थी।
वैसे पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का इतिहास रहा है लेकिन लोकसभा के अंतिम चरण के मतदान से पहले ताज़ा हिंसा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के लिए बीजेपी ने तृणमूल पर आरोप लगाए हैं। जबकि तृणमूल ने बीजेपी पर बाहर से भीड़ लाकर हिंसा फैलाने का आरोप लगाया है। इससे पहले के चरणों में भी हिंसा हुई थी लेकिन रोड शो के दौरान हिंसा का अलग ही स्वरूप सामने आया। दोनों पक्षों में जमकर पत्थरबाज़ी हुई और बंगाल में भावनात्मक अपील रखने वाले ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी गई। दोनों पक्ष एक दूसरे पर मूर्ति तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं। पुलिस ने हिंसा में शामिल 100 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। भाजपा ने इसे लेकर आयोग से शिकायत की।
वैसे माना यह भी जाता है कि “पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं। जब भी सत्तारूढ़ पार्टी खुद को कमज़ोर पाती है और कोई नई पार्टी चुनौती देती हुई लगती है तो हिंसा होती ही है। “पश्चिम बंगाल सिद्धार्थ शंकर रे के ज़माने से पिछले चार दशकों से चुनावी हिंसा का गवाह रहा है। 70 के दशक में जब सीपीएम उभर रही थी तब और जब 90 के दशक के अंतिम सालों में तृणमूल सीपीएम को चुनौती दे रही थी तब भी। राज्य में पिछले पंचायत चुनावों में भी हिंसा हुई थी। इन चुनावों में सीमावर्ती इलाकों में भाजपा को कुछ सीटें भी मिलीं थी। अब वो संसदीय चुनाव में कुछ सीटें जीतना चाहती है।
वक्त गवाह है कि साल 2009 से ही पश्चिम बंगाल में भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ रहा है। पंचायत चुनावों में मिली सफलता के बाद भाजपा चाहती है कि उसका बढ़ता जानाधार सीटों में परिवर्तित हो जाए। अंतिम चरण में जिन नौ सीटों पर मतदान होना है, 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने ये सारी सीटें जीती थीं। इसलिए इस बार मोदी और शाह के सामने चुनौतियां बेहद ज्यादा है। वैसे माना जाता है कि भाजपा इनमें से कम से कम दो सीटों पर जीत की उम्मीद लगाए हुए है, इसीलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह यहां अंतिम चरण के चुनाव प्रचार में पूरी ज़ोर लगाए हुए हैं। भाजपा के इनदोनो ही नेताओ को लगता है कि अगर उन्होंने यह चुनाव जीत लिए तो भाजपा को पश्चिम बंगाल में आने वाले समय में सत्ता काबिज करने से कोई रोक नहीं पायेगा। सबसे ख़ास बात यह भी है कि उत्तरी कोलकाता का संसदीय क्षेत्र हिंदी बहुल इलाका है और भाजपा का यहां जनाधार लगातार बढ़रहा है। इसलिए ही एक तरफ जहा भाजपा राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह रोड शो के ज़रिए शहरी मतदाताओं में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं तो तृणमूल ऐसा होने नहीं देना चाहती। हिंसा की यह भी एक बड़ी वजह है। इसके अलावा ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी डायमंड हार्बर से चुनाव लड़ रहे हैं, और भाजपा को उम्मीद है यह सीट उनके पास आएगी। हालांकि “पिछले लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव को देखें तो चुनावी हिंसा में क़रीब दो तिहाई की कमी आई है।” पश्चिम बंगाल में पहले से ही टकराव का माहौल रहा है। चुनावों में भाजपा की आक्रामक एंट्री ने ही इस टकराव को और बढ़ा दिया है। कॉलेज स्ट्रीट का इलाक़ा बहुत छोटी जगह है, जहां हिंसा हुई। वहीं पास में भाजपा का कार्यालय भी है। जबकि आस पास मुस्लिम बहुल इलाका है। ऐसे में इस हिंसा से दंगा फैलने की आशंका भी थी। रोड शो के लिए बीजेपी के कार्यकर्ता वहीं इकट्ठा हुए थे लेकिन सवाल ये उठता है कि दूसरे दल के कार्यकर्ताओं को वहां इकट्ठा होने क्यों दिया गया? प्रशासन इस टकराव को रोक सकता था। उन्होंने कहा कि ये हिंसा स्वतःस्फूर्त नहीं बल्कि पूर्व नियोजित लगती है, लेकिन इससे दोनों पार्टियों को कोई अतिरिक्त फायदा नहीं होने जा रहा। गौरतलब है कि विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने को तृणमूल कांग्रेस मुद्दा बना रही है और इसे बंगाली पहचान पर हमले के रूप में प्रचारित कर रही है। जबकि अमित शाह ममता बनर्जी पर दोष रोपण कर रहे है। राज्य के चुनाव आयोग व पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दरअसल राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये जिन बाहुबलियों को वामपंथी इस्तेमाल करते रहे हैं, वही कालांतर तृणमूल कांग्रेस में शिफ्ट हो गये जो पश्चिम बंगाल में स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं। पार्टी विशेष के पक्ष में जबरन वोट डलवाने, फर्जी मतदान करवाने तथा मतदाताओं को डराने-धमकाने के मामले खूब सामने आते हैं। कहीं न कहीं लोकतंत्र बाहुबलियों व धनबलियों के हाथों कसमसाता नजर आता है। राजनीतिक दलों द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को संयमित रहने व मर्यादित व्यवहार करने की सीख नहीं दी जाती। अत: सड़कों पर कार्यकर्ताओं का अराजक व्यवहार लोकतांत्रिक मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाता नजर आता है।
इसमें दो राय नहीं कि ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन खिसकती दिखायी दे रही है। जिस तरह भाजपा अध्यक्ष ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी पूरी ताकत पश्चिम बंगाल में झोंकी है, उसने तृणमूल कांग्रेस को बेचैन किया है। कहीं न कहीं भाजपा पश्चिम बंगाल में अपना जनाधार बढ़ाने के लिये हिंदू ध्रुवीकरण करने में कामयाब हुई है। कभी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि ज्योति बसु के लाल बंगाल में भगवा कमल खिलेगा लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टीकरण के प्रतिवाद स्वरूप भाजपा के दक्षिणपंथ को विस्तार पाने का अवसर मिला है। जिसे भाजपा वोटों में तबदील करने के लिये जी-जान से जुटी नजर आती है। बांग्लादेशी घुसपैठियों व एनआरसी के मुद्दे को भाजपा ने खूब प्रचारित किया है। विदेशों से आये शरणार्थी हिंदुओं को भारत में सुविधानजक ढंग से नागरिकता देने का वायदा करके भाजपा ने पश्चिम बंगाल में बसे बांग्ला शरणार्थियों के एहसासों को जगाया है। इस सारे राजनीतिक घटनाक्रम से ममता बनर्जी को अपनी जमीन खिसकती नजर आ रही है। जिसका नतीजा उनके व्यवहार में आक्रामकता और उनके कार्यकर्ताओं के हिंसक व्यवहार में नजर आता है। यही वजह है कि कोई ही चरण ऐसा गया होगा जब तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भाजपा प्रत्याशियों व कार्यकर्ताओं को निशाना नहीं बनाया होगा। यह स्थिति तब है जब पश्चिम बंगाल में आम चुनाव सात चरणों में हुए हैं। वह भी केंद्रीय सुरक्षा बलों के संरक्षण में।
यदि केंद्रीय सुरक्षा बलों की सुरक्षा छतरी न होती तो निश्चय ही हिंसा का दायरा बड़ा हो सकता था। यह जानते हुए भी कि बंगाल में राजनीतिक कार्यकर्ता ज्यादा सक्रिय और वैचारिक रूप से उत्तेजित रहे हैं। निश्चय ही पश्चिम बंगाल में बम्पर वोटिंग व चुनावी हिंसा बदलते राजनीतिक परिदृश्य की तरफ भी इशारा करती है।

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