संपादकीय

फैसला और उलझन

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को बहाल तो कर दिया है लेकिन लोगों के मन में कुछ सवाल बाकी रह गए हैं। वैसे कोर्ट से इस फैसले के अतिरिक्त दिशा-निर्देश की उम्मीद भी की जा रही थी, जैसा की वह देती रही है।सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के फैसले को निरस्त करके इस संस्था के शीर्ष पर छाए विवाद को समाप्त करने की कोशिश की है। अदालत के फैसले के मुताबिक सरकार आलोक वर्मा पर लगाए गए आरोपों को चयन समिति में रखेगी, जहां से क्लीन चिट मिले बगैर सीबीआई से जुड़ा कोई बड़ा निर्णय वे नहीं ले सकेंगे। वर्मा का कार्यकाल आगामी 31 जनवरी को ही समाप्त हो रहा है, लिहाजा अपने पद पर उनकी बहाली एक औपचारिकता ही सिद्ध होगी। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक अप्रिय विवाद का निपटारा भले हो गया हो पर इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट से कुछ और अपेक्षा भी की जा रही थी।

मसलन यह कि कोर्ट इस मामले में अपनी विस्तृत व्याख्या से न सिर्फ सीबीआई की साख बहाल करेगा बल्कि सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश भी देगा। जैसा कि वह और मामलों में करता रहा है। लेकिन अदालत ने खुद को इस तकनीकी पहलू तक ही सीमित रखा कि सीबीआई निदेशक को छुट्टी पर भेजने का फैसला सरकार नहीं, उन्हें चुनने वाली समिति ही ले सकती है। मामले के ब्यौरे में जाएं तो यह सिर्फ दो अधिकारियों की लड़ाई तक सीमित नहीं है। सरकार द्वारा सीबीआई जैसी संस्था के भीतर मनमाने हस्तक्षेप और नियमों को दरकिनार कर अपने मनपसंद अधिकारी की नियुक्ति करने के आरोप कहीं ज्यादा गंभीर हैं। कोर्ट ने इस संदर्भ में सीधे कुछ कहना जरूरी नहीं समझा है, अलबत्ता यह जरूर कहा है कि विधायिका द्वारा सीवीसी ऐक्ट और डीएसपीई ऐक्ट में संशोधन की जरूरत है।

गौरतलब है कि सारा मामला सतह पर तब आया जब सीबीआई के दूसरे नंबर के अधिकारी राकेश अस्थाना पर रिश्वत लेने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई। यह पहला मौका था, जब सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर पर खुद सीबीआई ने ही केस दर्ज किया हो। लेकिन इस कार्रवाई के तुरंत बाद राकेश अस्थाना ने भी सीबीआई चीफ पर 2 करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप लगा दिया। देश की एक आला संस्था के दो टॉप अफसरों की लड़ाई से पैदा संकट को दूर करने के लिए सरकार ने इन दोनों को ही छुट्टी पर भेज दिया और एम. नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक की जिम्मेदारी सौंप दी।

लेकिन आलोक वर्मा सरकार के इस कदम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। पहली नजर में इस पूरे बवाल की जड़ अस्थाना की नियुक्ति में ही नजर आती है। करीब दो साल पहले वह सीबीआई के अंतरिम निदेशक नियुक्त किए गए, तभी गुजरात में उनकी गतिविधियों के हवाले से इस नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। फिर फरवरी 2017 में आलोक वर्मा सीबीआई के प्रमुख बने तो दो महीने बाद उन्होंने बतौर स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना की नियुक्ति का विरोध यह कहते हुए किया कि उनके खिलाफ कई संगीन आरोपों की जांच सीबीआई ही कर रही है, लिहाजा उन्हें इस भूमिका में नहीं होना चाहिए। ये सारे दाग क्या आलोक वर्मा की बहाली से धुल जाएंगे?

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