राजनीतिसंपादकीय

फिर एक और बार मोदी सरकार

Exit Polls और जानकारों की राय के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी सीट पर सुबह से ही लगातार आगे चल रहे थे। शुरुआती रुझान आने के साथ ही उन्होंने बढ़त बना ली थी और अब उनके आसपास कोई भी प्रतिद्वंद्वी नजर नहीं बचा। सभी को चारों खाने चित कर मोदी ने दिखा दिया कि “यहां के हम सिकंदर।” वाराणसी लोकसभा सीट देश की सबसे हॉट सीटों में से एक मानी जा रही थी। देश के लोगों को इस बात की उत्‍सुकता थी कि इस सीट पर पीएम नरेंद्र मोदी कितने वोटों से चुनाव जीतेंगे। पीएम मोदी ने नामांकन के दौरान सात किलोमीटर लंबा रोड शो किया था, जिसकी चर्चा पूरे देश में हुई थी। यहां तक की नरेंद्र मोदी के खिलाफ सपा-बसपा गठबंधन से शालिनी यादव और कांग्रेस से अजय राय चुनावी मैदान में थे। इससे पहले सपा ने बीएसएफ के बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव को उम्मीदवार बनाया था, जिनका नामांकन चुनाव आयोग ने खारिज कर दिया था। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट भी गए, लेकिन वहां भी उनका नामांकन खारिज कर दिया गया।
साल 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को करीब पांच लाख 80 हजार वोट मिले थे और अरविंद केजरीवाल को दो लाख नौ हजार वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस के अजय राय को सिर्फ 75 हजार वोट मिले थे। यहां से बसपा उम्मीदवार विजय प्रकाश जायसवाल को करीब 60 हजार और सपा प्रत्याशी कैलाश चौरसिया को महज 45 हजार वोट मिले थे। यहां कुछ दिनों तक यह चर्चा चल रही थी कि मोदी के मुक़ाबले कांग्रेस यहां से प्रियंका गांधी को मैदान में उतारेगी लेकिन कांग्रेस ने सभी अटकलों पर विराम देते हुए यहां से अजय राय को फिर से अपना उम्मीदवार बनाया। इस बार मोदी को सर्वाधिक 25 प्रत्याशी चुनौती दे रहे हैं। मोदी के खिलाफ 2014 में भी सर्वाधिक 41 लोग मैदान में उतरे थे। मगर हमेशा की तरह यहां पर मोदी लहर से पूरा परिसर सराबोर हो उठा , सबसे ख़ास बात यह रही की खुद को प्रधानमंत्री का दावेदार मानने वाले राहुल गाँधी को भाजपा की प्रत्याशी स्मृति ईरानी से हार का मुँह देखना पड़ा जो इस बात का साबुत है की देश से कांग्रेस मुक्त करने कीराह में भाजपा चल पड़ी है। और उनके सामने कोई ठीक नहीं पा रहा है। न ममता बनर्जी , न राहुल -प्रियंका की जोड़ी।
वैसे यह मंथन की बात है कि ऐसी कौन सी बात रही जिसे कांग्रेस ने बेहद हलके में लिया। वैसे लोकसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार ‘ प्रचंड मोदी लहर’ पर सवार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) रिकॉर्ड तोड़ सीटों के साथ फिर से केंद्र की सत्ता पर काबिज होने जा रही है। भाजपा ने बेहतरीन प्रदर्शन कर दिखा दिया है कि कुछ भी हो “फिर एक बार मोदी सरकार”. और चौकीदार मोदी जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरने का काम कर रहे है। जिस तरह से बीजेपी जीती है उससे साफ है कि इस बार पीएम मोदी ने जातिगत समीकरणों को तोड़ दिया है। निर्वाचन आयोग की ओर से बृहस्पतिवार को जारी मतगणना की ताजा जानकारी के अनुसार भाजपा ने 350 के करीबी आकड़े पर पहुंच कर यह दिखा दिया की जनता की पहली पसंद कौन है ?
मगर ऐसे कौन से मुद्दे है जिसे समझने में कांग्रेस नाकामयाब रही। वह मुद्दा है राष्ट्रवाद का मुद्दा। जिसकी लहार भाजपा के जित का कारण बनी। बता दें की ऑपरेशन बालाकोट के बाद से पूरा चुनाव मुद्दों के बजाए राष्ट्रवाद के आसपास सिमटता नजर आया है। पीएम मोदी ने भी एक रैली में पुलवामा में हुए शहीदों के नाम पर वोट डालने की अपील की थी। जिसने मतदाताओं को अपनी तरफ मोड़ने में कामयाबी हासिल की थी। हालांकि बाद में उन्होंने अपने शब्दों को बदल दिया और चुनावी रैलियों में एयर स्ट्राइक का जिक्र करते हुए मतदाताओं को ‘राष्ट्रवाद’ से प्रभावित करने की कोशिश की। जिसका लाभ भाजपा को चुनाव में मिला।
दूसरा मुद्दा है ‘TINA’ फैक्टर काम कर गया। मतलब बीजेपी ने इस चुनाव में विपक्ष में पीएम मोदी की तुलना में किसी और विकल्प का मुद्दा भी जमकर उठाया। वहीं कांग्रेस की ओर से पीएम पद के उम्मीदवार राहुल गांधी विपक्ष के साथ आम सहमति बनाने में नाकामयाब रहे और पूरे चुनाव में पीएम मोदी के मुकाबले एक सर्वमान्य नेता कोई नहीं बन पाया। यानी पीएम मोदी के आगे There is No Alternative (TINA) फैक्टर ने विपक्ष को नुकसान पहुंचाने का काम किया और यही मुद्दा भाजपा को लाभ पंहुचा गया।
वही राफेल को कांग्रेस ने भुनाया मोदी ने मंत्रियो की प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उसमें पानी डाला। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दो सालों से राफेल को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की। राहुल गांधी की ओर से ‘चौकीदार चोर है’ जैसे भी नारे लगाए गए। लेकिन पीएम मोदी ने भी उसी अंदाज में ‘मैं हूं चौकीदार’ का नारा लगाया। इस मुद्दे पर बीजेपी एक बार भी बैकफुट पर जाने के लिए तैयार नहीं हुई। इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इसी जुड़े एक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में माफी भी मांगनी पड़ गई। यही कारण है कि लगातार गलती करने वाला और कमजोर लीडर जनता पसंद नहीं करती यही राहुल की हार की सबसे बड़ी वजह है।
कमजोर विपक्ष भी भाजपा के जित की सबसे बड़ी वजह है। देश में इतनी महंगाई थी मगर कांग्रेस ने महंगाई के साधारण से मुद्दे को उठाने में नाकामयाब रही। यही कारण है कि इस चुनाव की सबसे खास बात यह रही कि मोदी सरकार को महंगाई जैसे मुद्दों का सामना नहीं करना पड़ा। साल 2014 के चुनाव में कांग्रेस की सरकार के सामने महंगाई के एक बड़ा मुद्दा बन गई थी। इसकी बड़ी वजह यह रही है कि मोदी सरकार ने पूरे 5 साल तक पूरी तरह से नियंत्रण में रखा। सरकार में आते ही पीएम मोदी ने कालाबाजारियों पर नकेल कसना शुरू कर दिया था। जिसका असर साफ दिखाई दिया।
इतना ही नहीं जिस उज्जवला, किसान निधि और घर-शौचालय वाले योजना पर कांग्रेस ने खिल्ली उड़ाई वही लोगो को ज्यादा पसंद आयी। बता दे कि बीजेपी सरकार की जीत में इन योजनाओं का भी बहुत बड़ा असर हुआ है। चुनाव से पहले ही 2-2 हजार रुपये की दो किश्त किसानों के खाते में जा चुकी थी औ पूरे पांच साल मोदी सरकार ने जो स्वच्छता अभियान शुरू किए उसी के तहत मिलने वाले शौचालयों को चर्चा गांव-गांव हो रही है। दूसरी ओर उज्जवला योजना की तरह कई लाख घरों में सिलेंडर भी पहुंचाए गए। इसलिए माना जा रहा है कि इन योजनाओं का असर भी वोटरों पर पड़ा और भाजपा को जनता का भरपूर प्यार वोट के रूप में मिला।
वही जब बात करे पश्चिम बंगाल की तो जो ममता बनर्जी भाजपा को कहती थी खता नहीं खोल पाएगी उसी भाजपा ने ममता के भी पसीने छुड़ा दिए। इस लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों ने एक बार फिर राजनीतिक पंडितों को पूरी तरह से चौंका दिया है। इनमें से सबसे चौंकाने वाला राज्य पश्चिम बंगाल निकला। वैसे भारतीय जनता पार्टी शुरू से यहां पर 25 से ज़्यादा सीटों जीतने का दावा कर रही थी। भले ही नतीजे/ रुझान दावे के करीब नहीं है। लेकिन 2014 में मात्र 2 सीट जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी तृणमूल कांग्रेस के किले में बड़ी सेंधमारी की। ममता बनर्जी को भरोसा था कि वह अपने किले को बचाकर केंद्र की राजनीति में एक मजबूत दावेदारी पेश करेंगी। लेकिन अगले पांच साल तक ऐसा नहीं होने वाला। ऐसे अब हर किसी के मन में सवाल में उठा दिया है कि BJP के इस प्रदर्शन की वजह क्या है? इसकी असली वजह है बंगाल में पांच साल बाद दिखा मोदी लहर का जलवा। जी हां तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी का सामना इस बार मोदी लहर से हो ही गया। और इस लहर में उनका किला पूरी तरह से ध्वस्त तो नही हुआ। लेकिन बीते लोकसभा चुनाव में 2 सीट जीतने वाली बीजेपी करीब 20 सीट के करीब पहुंच गई। इसे बड़ी सेंधमारी ही कहा जाएगा। पश्चिम बंगाल शुरू से बीजेपी और नरेंद्र मोदी के एजेंडे में था। 42 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में नरेंद्र मोदी ने कुल 17 रैलियां की। रैलियों में आने वाली भीड़ और प्रधानमंत्री को मिलने वाली प्रतिक्रिया से साफ था कि जमीन पर कुछ हो रहा था।
इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों की आबादी करीब 30 फीसदी है। ऐसे में बीजेपी शुरू से ही बंगाल को अपनी किस्म की राजनीति के लिए उर्वर जमीन मानती रही है। राष्ट्रीय पार्टी ने सबसे पहले ममता बनर्जी पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया। उनका आरोप था कि ममता बनर्जी सिर्फ मुसलमानों की फिक्र करती हैं, हिंदुओं की नहीं। इमाम को पेंशन दिया जा रहा है। लेकिन हिंदु धर्म के पंडितों के लिए कुछ नहीं किया जाता। इनमें से सारे आरोप सही नहीं थे। लेकिन चुनावी राजनीति में माहौल बनाना बहुत अहम होता है जिसमें बीजेपी कामयाब हो गई।
एक और नारा कमाल कर गया “चुपचाप कमल छाप”। लेफ्ट को पश्चिम बंगाल की सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए ममता बनर्जी ने चुपचाप फूल छाप का नारा दिया था। इसी नारे को भारतीय जनता पार्टी ने अपना बना लिया। इस बार फूल छाप की जगह कमल छाप जुड़ गया। माना जात रहा है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद अक्सर ही हिंसा होती है। खासकर चुनाव में अपनी पसंद की पार्टी को दिया गया वोट भी कई बार उन वोटरों के लिए ही जान का खतरा बन जाता है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने समर्थकों को चुपचाप कमल के निशान पर वोट डालने के लिए प्रेरित किया। जो होता दिख रहा है।

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