संपादकीय

प्रधानमंत्री मोदी को खतरा तो है भईया!

Archana Tripathi, Hisar Today

एक जमाने में पैट्रॉल और डीजल के बढ़ते दामों को लेकर तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ परचम फहराने वाले मोदी ने कभी नहीं सोचा था की कमान से निकला हुआ तीर एक दिन उन्हें ही जा चुभेगा। जिसकी पीड़ा उन्हें इतनी होगी की उसका दर्द 2019 के चुनावों तक उन्हें रह रह कर चुबने लगेगा। दरहसल केंद्र सरकार को बने चार साल बीत चुके हैं। जो लोग पंचम स्वर में अच्छे दिनों की बात कर रहे थे उन्हें आज निश्चित ही हकीकत समझ आ गई होगी कि ये मृगमारीचिका ही है। मृगमारीचिका की तरह अच्छे दिन वादों में दिखाए तो जा सकते हैं लेकिन पास जाने पर ये और दूर हो जाते हैं।

मृगमारीचिका का एहसास अक्सर मरुस्थल में होता है और शायद इसलिए राजस्थान के लोग इसे सबसे पहले समझे और वहां उपचुनाव में उन्होंने शुरुआत कर दी। जल्द ही यह बात मध्य प्रदेश और योगी के राज्य उत्तरप्रदेश वालों को भी समझ आ गई और उन्होंने भी अपने यहां संम्पन उपचुनावों में वोटों के सौदागरों को जमीन सुंघा दी। लेकिन चूंकि सौदागरों की तिजोरी अभी राज्य सरकारों से भरी पड़ी है इसलिए वो बेफिक्र हैं । इसमें उनका कोई कसूर भी नहीं। भरी तिजोरी का इतना गुमान तो होगा ही। किसी की कोई परवाह नहीं ,किसी को किसी से लेना देना नहीं। क्या शाह और क्या खुद को जनता का सेवादार और चौकीदार कहने वाले प्रधानमंत्री मोदी। सेवादार विदेशी यात्रा और शाह देश यात्रा में निकल जाए तो हुक्मरानों की नजर बचाकर रूपया डॉलर के मुकाबले 72 तक जा पहुंचा है। उधर पेट्रोल -डीजल ने तो और भी रफ़्तार पकड़ ली है। वैसे भी उनका तो सम्बन्ध ही रफ़्तार से है।

इनके शतक को लेकर अब तो आम जनता भी परेशान हो उठी है। हालांकि साहब ने स्वस्थ होकर आते ही डाटा जारी कर दिया है कि जीडीपी 8 हो गई है घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन जनता जो आम तौर पर यूं भी नासमझ होती है, उसे यह कतई समझ नहीं आ रहा कि जीडीपी ऊपर जा रही है तो फिर उसकी जेब क्यों खाली होती जा रही है? लेकिन इसकी चिंता जिन्हें करनी चाहिए कोई उनकी चिंता को नहीं समझ रहा। केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी सरकार के चार सालों के दौरान सरकार की आेर से देश की अर्थव्यवस्था आैर आम आदमी से जुड़े पेट्रोलियम पदार्थों को बाजार के हवाले करना सबसे बड़ी घटना मानी जा सकती है। पेट्रोलियम पदार्थों को नियंत्रणमुक्त करने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में कमी होने के बावजूद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी होती रही है।

इसे लेकर कई सरकार की आेर से उठाये गये इस कदम का ही नतीजा है कि आज पेट्रोल-डीजल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचने के कगार पर है। भले ही मोदी शतक लगाने के करीब हो ,मगर उनके शुभचिंतक मानते है की पेट्रोल -डीजल को छोड़कर मोदी ने पिछले चार साल के कार्यकाल में गरीबो के लिए बहुत कुछ किया है। आटा-चावल जैसी जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं के दाम इनके न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई वृद्धि को देखते हुए ज्यादा नहीं बढ़े, चीनी के दाम 10 फीसदी नीचे हैं, लेकिन मध्यम वर्गीय परिवार के द्वारा ब्रांडेड तेल, साबुन जैसे रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले विनिर्मित उत्पादों में इस दौरान आठ से 33 फीसदी की वृद्धि देखी जा रही है।

मगर यह बात करके भले की भक्त अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश करने में लगे हो, लेकिन पिछले कुछ महीने से लगातार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से सरकार की आगे की राह कठिन जरूर नजर आ रही है। दिल्ली में पेट्रोल 79.31 रुपये और डीजल का दाम 71.34 रुपये के आसपास पहुंच गया है. देश के कुछ राज्यों में पेट्रोल का दाम 80 रुपये लीटर को पार कर चुका है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने,अमेरिका द्वारा इस्पात और एल्यूमीनियम जैसे उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाने और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के चलते आने वाले दिनों में महंगाई को लेकर सरकार की राह और कठिन हो सकती है। जीएसटी लागू होने के बाद 14 फीसदी तक बढ़े आटे का दाम मोदी सरकार ने पिछले साल एक जुलाई से देश में वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) लागू किया। जीएसटी के तहत खुले रूप में बिकने वाले आटा, चावल, दाल जैसे खाद्यान्नों को कर मुक्त रखा गया, जबकि पैकिंग में बिकने वाले ब्रांडेड सामान पर पांच अथवा 12 फीसदी की दर से जीएसटी लगाया गया।

एक सामान्य दुकान से की गयी खरीदारी के आधार पर तैयार आंकड़ों के मुताबिक, मई 2014 के मुकाबले मई, 2018 में ब्रांडेड आटे का दाम 25 रूपये किलो से बढ़कर 28.60 रुपये किलो हो गया। खुला आटा भी इसी अनुपात में बढ़कर 22 रुपये पर पहुंच गया। मोदी राज में यह वृद्धि 14.40 फीसदी की रही। 15 से 25 फीसदी तक बढ़ी चावल की कीमत, अरहर दाल 75 से 140 रुपये किलो तक पहुंची हालांकि, चार साल में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 19.65 फीसदी बढ़कर 1735 रुपये क्विंटल तक पहुंच गया। चावल के दाम में कुछ तेजी दिखती है. पिछले चार साल में चावल की विभिन्न किस्म का भाव 15 से 25 फीसदी तक बढ़ा है। जबकि सामान्य किस्म के चावल का एसएसपी इस दौरान 14 फीसदी बढ़कर 1550 रूपये क्विंटल तक रहा।

खुली बिकने वाली अरहर दाल इन चार सालों के दौरान 75 से 140 रुपये तक चढ़ने के बाद वापस 75 से 80 रुपये किलो पर आ गयी। सब्जी आैर फलों के दाम में भी लगातार तेजी बरकरार है। नेशनल काउंसिल आॅफ एपलायड इकोनोमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की फैलो बोरनाली भंडारी ने महंगाई के मुद्दे पर कहा कि 2017-18 इस मामले में नरमी का साल रहा। खाद्य मुद्रास्फीति में गिरावट रही। लेकिन फल एवं सब्जियों में तेज घट-बढ देखी गयी। एनसीएईआर की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2017-18 में खाद्य महंगाई दो फीसदी रही, जो कि 2016-17 में चार फीसदी थी।

गौतलब है की इस बिच प्याज-टमाटर जैसी सब्जियों के दाम कभी 10-15 रुपये किलो तो कभी 100 रुपये किलो तक ऊपर पहुंच गये। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, सरकार ने दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पिछले कुछ सालों में अरहर, उड़द, चना के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 24 से लेकर 38 फीसदी तक की वृद्धि की है. इसके बावजूद दालों के खुदरा दाम चार साल की समाप्ति पर पूर्वस्तर के आसपास ही टिके हैं. चीनी की कीमत घटी, मगर खाद्य तेलों के दाम में इजाफा देखा गया। हालांकि, पिछले चार साल में खुली चीनी का खुदरा दाम 35 रुपये से लेकर 40 रुपये और फिर घटकर 31 रुपये किलो रह गया, धारा रिफाइंड वनस्पति तेल आलोच्य अवधि में 120 रुपये से 8.33 फीसदी बढ़कर 130 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गया. सरसों तेल की एक लीटर बोतल 10 फीसदी बढ़कर 105 रुपये हो गयी। ब्रांडेड टाटा नमक की यदि बात की जाये, तो चार साल में यह 6.66 फीसदी बढ़कर 16 रूपये किलो हो गया।

डिटोल साबुन (तीन टिक्की) का पैक आलोच्य अवधि में सबसे ज्यादा 33 फीसदी बढ़कर 150 रुपये हो गया. कुछ ब्रांडों के दाम 50 प्रतिशत तक भी बढ़े हैं। मसालों के दाम ने जायका जरूर खराब किया। हल्दी, धनिया, मिर्च में ब्रांड के अनुसार भाव ऊंचे नीचे रहे। लेकिन इनमें घट-बढ़ ज्यादा नहीं रही। धनिया पाउडर का 200 ग्राम पैक इन चार सालों के दौरान 35 से 40 रूपये के बीच बना रहा. हल्दी पाउडर भी इस दायरे में रहा. देशी घी का दाम जरूर इस दौरान 330 रुपये से बढ़कर 460 रुपये किलो पर पहुंच गया।

लेकिन इस मुद्दे पर सभी भाजपा विधायकों और सेवादार मौन धारण किये हुए है। अब महंगाई को लेकर भक्त शोर नहीं मचाते। इतनी महंगाई के बाद भी सभी को लगता है की यह अच्छे दिन चल रहे रहे। भई आपके खातें में आप 15 लाख आने का इंतजार करते जाओ। मगर जब नींद खुलेगी तो हकीकत शायद आपको चौका दे। खैर देश की ऐसी स्तिथि को देखते हुए आज नरेंद्र मोदी भी चिंता के है, कि जिस जनता से अच्छे दिन की बात करके, महंगाई को प्रमुख मुद्दा बनाकर उन्होंने पिछला चुनाव जीता था हो सकता है की यही मुद्दा उनके गले की फांस न बन जाए?

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