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पार्षद चुनाव में देखते है प्रत्याशी तो लोकसभा में क्यों नहीं!

भाजपा पार्टी की तरफ से सांसद का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी आज कल बड़े रिलैक्स है। क्योंकि उनको पता है कि जीते तो ठीक वरना हारे तो कह देंगे जनता मोदी से नाराज। इनदिनों भाजपा की टिकट से सांसद का चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों की म,मस्त मौज है, वैसे उनको यह तो पता है कि यह चुनाव वह लड़ रहे है, मगर वह इस बात से निश्चिन्त है कि खुद का मेहनत क्या करना अपने पार्टी के नेता लोग है न उनकी नैय्या पार लगाने के लिए।
वैसे इनदिनों विधायकों की डिमांड भी काफी बढ़ गई है। खुद के पार्टी भी विधायकों पर हार जीत और लीड के लिए उनपर निर्भर है, बल्कि उनको पता है कि उनकी नाराजगी भी उनका(सांसद प्रत्याशी) का कॅरिअर ले डूबेगी। वैसे खुद की पार्टी के विधायकों से ज्यादा आजकल दूसरे पार्टी के पूर्व नेताओ और सांसदों व विधयाको ने जिस प्रकार से दलबदल का खेल खेला वह सभी ने देखा है।
वैसे एक बात कहु अपने जो सांसद प्रत्याशी पता है क्या बोलते है, वह कहते फिर रहे हैं कि यह चुनाव हमारा थोड़े ही है, यह तो मोदीजी का चुनाव है। आप हमें नहीं, मोदीजी को देखो, उनको चुनो।
अरे इसका मतलब यह तो नहीं कि अगर हमने पांच साल तक मुंह नहीं दिखाया तो क्या मोदीजी का चेहरा तो हमेशा सामने रहा न तुम्हारे। नहीं क्या? इसलिए हमसे जो शिकवा-शिकायतें हैं, उन्हें भूल जाइए और मोदीजी को चुनिए। गजब है न खुद नहीं रहे जनता के बीच मगर किसी और के नाम पर वोट माँगना। खुद किसी काम के काबिल नहीं मगर अब मोदी नामक ढाल उनके हाथ में है। इसलिए तो गुमान में यह प्रत्याशी सोचते होँगे कि लो करो हम पर हमला, लगाओ हम पर आरोप, दो हमको गालियां, करो हमसे शिकायत। कुछ नहीं कर पाओगे। क्योंकि हम कौन हैं, कुछ भी नहीं, सामने तो मोदीजी हैं। वोट तो मोदी को देना है।
इस बार हरियाणा के मतदाता भी बेहद कंफ्यूस है उसको पता है सामने वाला काम नहीं करता, 5 साल तक जनता के खोज खबर नहीं लेता ऐसे में उसको कैसे वोट दे। खैर यह तो जनता तय करेगी की उसे करना क्या है। मगर यह तो तय है की लोकसभा चुनाव के नतीजे आगामी विधानसभा के पृष्टभूमि को लिखने का काम करेंगे। कौनसे विधानसभा क्षेत्र से किसको मिलती है बढ़त इसी का आकलन करके पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में जोड़तोड़ में लग जायेगी। ऐसे में सवाल यह उठखडा होता है कि किसका दबदबा कहा सबसे ज्यादा है। हर विधानसभा से मिली लीड के अनुसार ही पार्टी गठजोड़ की राजनीति कर उस क्षेत्र से अपनी हर जीत के पैमाने तय कर सकती है।
वैसे आपने कभी सोचा है कि जो पार्षद अपने इलाके के पार्षद चुनाव में जितने वोट लाने में कामयाब होते है क्या उतने ही वोट वह विधानसभा या लोकसभा चुनाव में अपने पार्टी के लिए लाने में कामयाब होते है ? आप मतदाता जो अपने इलाके के पार्षद को चुनते हो क्या आप उस व्यक्ति को देखते हो या पार्टी को।
मैंने तो अक्सर देखा है कि पार्षद चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार भी जीतता है। इसका मतलब जनता यह देखती है कि वो उनके इलाके में काम करवाने के लायक है या नहीं। सही कहा न मैंने। पार्षद चुनाव में जनता यह नहीं देखती कि उसका पार्षद प्रत्याशी किस पार्टी का है। मगर जब बात आती है विधान सभा और लोकसभा चुनाव की। मतदाताओं की यह सोच बदल जाती है। मतदाता को यह समझना चाहिए कि इलाको का विकास करने उनके बीच कौन आएगा। कौन उनसे मिलेगा। कौन उनके काम करवाएगा। इसीलिए जरुरी है कि मतदाता जागरूक होकर मतदान करे।

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