संपादकीय

नोट और वोट के खेल में लोक?

Hisar Today

मम्मी मम्मी देखो- फ्रॉग ने सूसाइड कर लिया। चौंक कर देखा तो माजरा समझ में आया। आठ-दस साल का बच्चा अपनी माता श्री के साथ एक तालाब के पास टहल रहा था। पबजी टाइप बच्चा था, जो ज्यादातर मोबाइल पर ही लगे रहने का शौकीन था। मेंढक को पानी में छलांग लगाते देख मासूम परेशान हो गया। बादल, बारिश, कोयल और कच्चे आमों से कोई खास सबका था नहीं। बेचारा मंेढको को क्या समझता? बस कुछ यूं समझिए कि कुछ-कुछ वैसा ही नादान जैसे टीवी चैनल ऐंकरों को मंत्रमुग्ध होकर देखती हमारी मिडिल क्लास जनता। न उन्हें अपने दुख-दर्द का ख्याल और न घर मोहल्ले की तकलीफों से वास्ता। अपनी-अपनी श्रद्धा के हिसाब से किसी खास ऐंकर, खास सियासी दल और खास नेता से अभिभूत। सरकारें बनाने-बिगाड़ने के गप्पों में मशगूल।
गजब दौर में जी रहे हैं हम। टॉप के नेताओं की भाषा और भाव-भंगिमाएं देखो तो समझ नहीं आता कि सियासत हो रही है या फिल्म चल रही है। जहां किरदार होने चाहिए थे, वहां कलाकार नजर आ रहे हैं। जहां कला होनी चाहिए थी, वहां रीमिक्स हो रहा है। पुराने गानों को सजा-धजा कर नए ढंग से पेश किया जा रहा है। ठीक वैसे ही जैसे पुरानी योजनाओं को रंग-रोगन कर उन्हें नए नाम दिए जाते हैं। सालाना कैश ट्रांसफर के वादे होते हैं। इस तिकड़म के भरोसे की पुरानी सब्सिडी और योजनाएं बंद होंगी। जनता के हितों से जुड़े किसी मसले पर कहीं कोई सार्थक बहस नहीं। हैरत होती है कि जोर-जोर से चीखते-चिल्लाते और डांट लगाते ऐंकरों को देखकर। प्रॉडक्ट बेचने वाले चैनलों के सेल्स वीजे के अंदाज मे यह लोग जोर-जोर से चीखते हैं। गोया कि खबर सुनी नहीं तो वह बिक जाएगी कुछ मिनट में। लोग भी गजब हैं। उन्हें लगता है कि लोकतंत्र का तम्बू मानो इन्होंने ही संभाल रखा है।
आम चुनाव होने वाले हैं। करोड़ों-अरबों खर्च हो रहे हैं। कहीं-कहीं छापों में बोरों में भरी नोटों की गड्डियां भी मिल रही हैं। राजनीतिक दल हर संसदीय सीट पर करोड़ों खर्च कर चुनाव प्रचार कर रहे हैं। कहीं कोई बड़ा सवाल नहीं है। सिर्फ एक-दूसरे पर आरोप हैं, सियासी पार्टियां एक मसले पर एक हैं। पब्लिक को यह जानने का हक नहीं कि किसके चंदे से यह खर्च हो रहा है। पर यह बड़ा सवाल है कि कौन है, जो राजनीतिक दलों को चला रहा है ? हर वोटर को जानने का हक होना चाहिए कि बड़े-बड़े चंदे कौन लोग दे रहे हैं? राजनीतिक दल हमें आपको यह नहीं बताना चाहते, ऐसा क्यों? आखिर इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वालों को उनके चंदे के बदले में क्या दिया जाता है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजनीतिक दल उन्हें बताए कि किसने कितना चंदा दिया है। प्रत्याशी या नेता घर आए वोट मांगने तो जरूर पूछें। कम से कम इतना तो पूछें ही कि कितना खर्च कर रहे हो, कहां से ला रहे हो? अगर ऐसे सवाल नहीं होंगे तो भूल जाइए कि आप की समस्याओं का कोई हल है। लोकतंत्र सिर्फ वोट से नहीं चलता। उसे चलाने के लिए नोट की भी जरूरत होती है। नेता आपके वोट को सिर्फ पांच साल में एक बार याद करते हैं। नोट देने वालों को रोज याद किया जाता है। नोट-वोट के इस खेल में लोक किनारे हो जाता है। तंत्र लोक के हाथ में तभी होगा, जब वास्तव में आपके नोट और आप ही के वोट से चुनाव हो। शायद तभी जवाबदेही होगी। वरना सियासत तो बेहद पेचीदा है, इस शेर की तरह- नोट और वोट के खेल में लोक ?

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