संपादकीय

नाराजगी के बावजूद मोदी का साथ देना ‘रामदेव’ की मजबूरी

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और योग गुरू बाबा रामदेव के बीच नाराजगी के स्वर सुनाई दे रहे हैं। बाबा रामदेव नरेन्द्र मोदी से नाराज हैं। योगगुरु बाबा रामदेव ने सरकार को भी चुनौती देते हुए आगाह किया कि देशभर में महंगाई पर अगर जल्दी नियंत्रण नहीं किया गया तो अगले आम चुनाव में मोदी सरकार के लिये यह महंगा साबित होगा। रामदेव ने यह भी कहा कि वह 2019 में भाजपा के पक्ष में प्रचार नहीं करेंगे, जैसा 2014 के चुनाव में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में सक्रियता से प्रचार किया था। महंगाई बहुत बड़ा मुद्दा है और मोदीजी को शीघ्र सुधारात्मक कदम उठाने होंगे। ऐसा करने में विफल रहने पर ‘महंगाई की आग मोदी सरकार को बहुत महंगी पड़ेगी।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को पेट्रोल और डीजल की कीमत समेत महंगाई को कम करने के लिये कदम उठाना शुरू करना होगा। यह पूछे जाने पर कि क्या वह भाजपा के लिये प्रचार करेंगे तो उन्होंने कहा, मैं क्यों करूंगा। मैं उनके लिये प्रचार नहीं करूंगा। उन्होंने कहा, मैं राजनीति से अलग हो चुका हूं। मैं सभी दलों के साथ हूं और मैं निर्दलीय हूं। योग गुरु ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना करना लोगों का मौलिक अधिकार है। रामदेव ने कहा कि स्वच्छ भारत मिशन शुरू करके और कोई बड़ा घोटाला नहीं होने देकर उन्होंने अच्छा काम किया है। रामदेव ने आगे कहा कि सरकार को पेट्रोल और डीजल को माल एवं सेवा कर के दायरे में लाना चाहिये और उन्हें इसे सबसे निचली श्रेणी में लाना चाहिये क्योंकि लोगों की जेब खाली हो रही है।

स्वामी रामदेव ने इनदिनों टीवी के एक शो में साफ-साफ शब्दों में कहा कि वे सर्वदलीय और निर्दलीय दोनों हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे 2019 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का प्रचार नहीं करेंगे, तो उन्होंने कहा कि ‘‘भला क्यों करेंगे, नहीं करूंगा।’’ हालांकि इसी कार्यक्रम में उन्होंने ये भी कहा कि कालाधन, भ्रष्टाचार और व्यवस्था में परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर उनका मोदी जी पर भरोसा था। मगर जब उनसे ये भरोसा अभी है या नहीं, पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर उन्होंने फ़िलहाल मौन रखा है। ये बाबा रामदेव का नया अंदाज है और राजनीतिक तौर पर नई पोजिशनिंग है। 2019 के आम चुनाव के नजदीक आने से पहले वे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से एक तरह से दूरी बरत रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले मोदी सरकार से दूरी बरतने का संकेत स्वामी रामदेव ने नहीं दिया था। बाबा रामदेव कथित तौर पर इतने पॉलिटिकल हैं कि उनके किसी भी राजनीतिक फैसले का अंदाजा एक दो बयानों से नहीं लगाया जा सकता। आखिर इसी चार जून, 2018 को वो भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह से संपर्क फॉर समर्थन अभियान में मिले थे। इस मुलाकात के बाद अमित शाह ने मीडिया में बयान दिया था, “बाबा रामदेव से मुलाकात का मतलब हम लाखों लोगों से मिल रहे हैं, उन्होंने अगले चुनाव के दौरान पूरा समर्थन देने का वादा किया है। बाबा रामदेव का ये बयान क्या किसी बदली हुई राजनीतिक तस्वीर का संकेत है या फिर रामदेव दबाव बनाने की भूमिका बना रहे हैं। इस बात को आंकने से पहले मोदी के 2014 के चुनावी अभियान की कामयाबी में स्वामी रामदेव की भूमिका को देखना होगा।

यहां ये बात ध्यान रखने की है कि चार जून, 2013 को रामदेव तब नरेंद्र मोदी को देश का अगला प्रधानमंत्री बता रहे थे जब मोदी को उनकी पार्टी ने चुनाव समिति का चेयरमैन भी नहीं बनाया था। नरेंद्र मोदी को चुनाव समिति के चेयरमैन की जिम्मेदारी नौ जून, 2013 को मिली थी। यहां से शुरू होने के बाद प्रधानमंत्री बनने तक स्वामी रामदेव हर मंच से मोदी को ईमानदार, राष्ट्रवादी और काले धन के खिलाफ स्टैंड लेने वाला नेता बताते रहे। इसी सिलसिले में, 29 दिसंबर, 2013 को बेंगलोर प्रेस क्लब में स्वामी रामदेव ने घोषणा की थी कि वे ‘वोट फॉर मोदी’ नाम से डोर-टू-डोर कैंपेन चलाने जा रहे हैं। लेकिन यह कोई अचानक से नरेंद्र मोदी-स्वामी रामदेव के बीच उपजा प्रेम नहीं था। 2010 में स्वामी रामदेव भारत स्वाभिमान के नाम से एक राजनीतिक पार्टी भी बना चुके थे। इसके गठन की घोषणा करते वक्त उन्होंने अगले आम चुनाव में प्रत्येक सीट से अपना उम्मीदवार उतारने की बात कही थी, लेकिन एक साल के अंदर ही उन्होंने अपना इरादा बदल कर भारतीय जनता पार्टी का साथ देने का मन बना लिया। उनका ये फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के अनुकूल साबित हुआ।

काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार के खिलाफ जो हवा बन रही थी, उसे बाबा रामदेव एक दिशा देने का काम करने में लगे थे और उनकी ये भूमिका कुछ ऐसी थी जिससे भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की चुनावी मुश्किल बेहद आसान होने जा रही थी। 2014 के चुनाव से ठीक दो सप्ताह पहले, नई दिल्ली में आयोजित मेगा योग कैंप में उन्होंने नरेंद्र मोदी को स्टेज पर आमंत्रित किया और हज़ारों लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘आप लोग ना केवल वोट डालने जाएंगे बल्कि दूसरे लोगों को समझाएंगे भी।’ रामलीला मैदान में हुए इस आयोजन में नरेंद्र मोदी ने भी लोगों से कहा था कि उनका और बाबा रामदेव का लक्ष्य कॉमन है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ खड़ा होता है कि बाबा रामदेव को नरेंद्र मोदी से दूरी बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है? हालांकि ये भी सच है कि टीवी के कार्यक्रम में वे नरेंद्र मोदी की किसी आलोचना से बचते नज़र आए, उनके मुताबिक दूसरे लोगों का मौलिक अधिकार है कि वे मोदी की आलोचना कर सकते हैं।

बाबा रामदेव अगर अपना स्टैंड बदल रहे हैं तो इसे व्यवहारिकता के आईने में भी देखना होगा। बाबा रामदेव का पंतजलि आयुर्वेद का कारोबार हजारों करोड़ तक पहुंच गया है। हाल ही में न्यूयार्क टाइम्स ने ‘द बिलियनेर योगी बिहाइंड मोदी’ज राइज’ नाम से विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें बाबा रामदेव कहते हैं कि 2025 तक उनका लक्ष्य अपने समूह के उत्पादों की बिक्री को 15 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है। ये मौजूदा वित्तीय साल में 1.6 अरब डॉलर तक है। मोदी की सरकार में बाबा रामदेव का कारोबारी साम्राज्य कितना बढ़ गया है, इसकी झलक रायर्ट्स की एक खोजी रिपोर्ट से भी लगाया जा सकता है जिसमें दावा किया गया है कि 2014 में मोदी सरकार के बनने के बाद पंतजलि समूह ने देश भर में 2000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है और कई मामलों में ये अधिग्रहण बेहद सस्ती दरों पर किया गया है। इसमें असम से लेकर महाराष्ट्र तक में बीजेपी शासित राज्यों की जमीनें शामिल हैं। पिछले साल जब हरिद्वार में रामदेव ने अपने पंतजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट का उद्घाटन किया तो ये काम उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के हाथों से ही कराया।

इसके अलावा जिस तरह से मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में योग और आयुर्वेद को बढ़ावा दिया है, उसका अप्रत्यक्ष रूप से फायदा बाबा रामदेव के कारोबार को भी मिला है। ऐसे में ये समझना मुश्किल नहीं है कि हजारों करोड़ रुपये का कारोबारी समूह चलाने वाले शख्स के लिए अब मोदी की तरफदारी करना उस तरह से संभव नहीं रह गया है जैसी स्थिति 2014 से पहले थी। क्योंकि किसी एक राजनीतिक समूह से नजदीकी भविष्य में उनके लिए मुसीबतों का जंजाल साबित हो सकती है। इन सबके बीच हकीकत ये भी है कि बाबा रामदेव भारतीय राजनीति की नस नस से भी वाकिफ हैं और समय-समय पर क्षेत्रीय दलों चाहे वो समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव रहे हों या फिर अतीत में बिहार के लालू प्रसाद यादव रहे हों, इन सबसे भी गलबहियां करते नजर आए हैं।

क्या पता उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं नया मोड़ ले रही हो, जैसा कि न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बाबा रामदेव भारत के अगले डोनल्ड ट्रंप बनने की कोशिश कर सकते हैं, यानी खुद को सत्ता के शिखर पर देखने की उनकी महत्वाकांक्षा हो सकती है। हालांकि ऐसा उन्होंने कभी भी जाहिर नहीं किया है। रामदेव टीवी के ही कार्यक्रम में कहते हैं कि पॉलिटिकल पार्टी पूरा देश नहीं है, अभी उनकी जिंदगी बीती नहीं है, वे अगले पचास साल तक देश के लिए समाजिक, राजनीतिक और अध्यात्मिक तौर पर सक्रिय भूमिका निभाते रहेंगे और ये भूमिकाएं किस रूप में सामने आएंगी ये तो आनेवाले वक्त ही बताएगा।

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