संपादकीय

जयप्रकाश और सुरजेवाला की दोस्ती बना रही नये समीकरण

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हरियाणा की राजनीित में दो दिग्गजों का आपसी मिलान इस बात की तरफ इशारा कर रहा है की आने वाले समय में जींद में होने वाले उपचुनावों में इस दोस्ती का असर कोई खास अध्याय लिख सकता है। ऐसा मानना जा रहा है की रणदीप सुरजेवाला और जेपी के साथ आने से कांग्रेस की स्थिति बेहद अलग और बेहतर हो चुकी है। ऐसी चर्चायंे है की जींद से कांग्रेस जेपी के भाई या उनके बेटे को चुनाव में उतार सकती है। रणदीप सुरजेवाला की इन तैयारियों को धत्ता बताते हुए भाजपा नेता मुख्यमंत्री मनोहर लाल, कैप्टेन अभिमन्यु और बीरेंद्र सिंह की तिगड़ी भाजपा का फूल खिलाने की जुगत में लगी है। ऐसे में जेपी और सुरजेवाला के साथ आने से जींद के राजनीतिक अखाड़े में हलचल पैदा हो गयी है।

वैसे जेपी का कांग्रेस में आने के अलग राजनीतिक मायने लगाए जा रहे है। सवाल ये उठता है की क्या जेपी आज कांग्रेस की परिस्थिति और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के राजनैतिक हालात देखकर समझ चुके हंै क्या की अब हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा का युग समाप्त हो चूका है? और आने वाला दौर कांग्रेस के राष्ट्रिय प्रवक्ता और नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला का आनेवाला है। आखिर देवीलाल स्कूल से निकले जेपी की जमीनी स्तर पर लोगो से मजबूत पकड़ा है। जिसका फायदा कांग्रेस को अधिक और नुक्सान इनेलो को ज्यादा होगा। रणदीप सुरजेवाला की आज पार्टी आलाकमान में मजबूत पकड़ है। ऐसे में जमीनी स्तर की मजबूती जेपी के संभाले जाने से प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति और बेहतर होने की उम्मीद जताई जा रही है।

रणदीप सुरजेवाला खुद को मुख्य्मंत्री पद का दावेदार मानते हुए अपनी सियासत चमकाने में प्रयासरत है। हाल में रणदीप सुरजेवाला का पार्टी के प्रकार से कद बढ़ा है, पार्टी आलाकमान में उनका दबदबा है ऐसे में सुरजेवाला सीधे देशो से मुख्यमंत्री रहे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को कड़ी चुनौती दे रहे है। सुरजेवाला जानते है की आज भूपेंद्र हुड्डा रोहतक, सोनीपत और झज्जर में उनका प्रभाव है, उसी प्रकार सुरजेवाला कैथल, जींद, कुरुक्षेत्र और करनाल में अपना दबदबा बढ़ाने की जद्दो जद्दोजहद में लगे है।

वैसे जयप्रकाश राजनीती के मंजे हुए खिलाड़ी हैं, वह इस बात से भली भांति वाकिफ है की आज कांग्रेस में रणदीप सुरजेवाला की तूती बोलती है। अगर ऐसे समय पर वह कांग्रेस के साथ आये तो अन्य राजकीय पार्टियों को कड़ी टक्कर देना उनके लिए आसान होगा। और पार्टी आलाकमान रणदीप सुरजेवाला के मुख्यमंत्री बनने से उनकी राह आसान हो जाएगी। गौरतलब है की रणदीप सुरजेवाला और जेपी के बिच लम्बे समय से राजनीतिक दुश्मनी चलती रही है। पहली बार 1996 चुनाव में यह दोनों एक दूसरे के आमने सामने आए थे। उस दौर में कांग्रेस से रणदीप सुरजेवाला, लोकदल से ओमप्रकाश चौटाला और हरियाणा विकास पार्टी से जयप्रकाश चुनाव लड़ रहे थे। इस सबसे प्रतिष्ठित और चर्चित सीट से रणदीप ने जेपी को लबभग 849 वोटो से हराया था, जबकि चौटाला तीसरे नंबर में पहुंच गए थे। उस चुनाव के बाद से रणदीप सुरजेवाला और जेपी के बीच जमकर ठनी और उस दौरान जेपी ने हरियाणा विकास पार्टी से दूरी बनाकर हरियाणा गढ़ पार्टी भी बना ली थी।

1999 को जेपी को बीरेंद्र सिंह का साथ मिला और वह कांग्रेस में शामिल हो गए। तब ऐसा सूत्र बताते है की उनदिनों बीरेंद्र सिंह ने जयप्रकाश के जरिये रणदीप सुरजेवाला पर खूब निशाने साधे। 2000 में जयप्रकाश कांग्रेस की टिकट से बरवाला के विधायक बने। 2004 के लोकसभा चुनाव में रणदीप सुरजेवाला हिसार संसदीय क्षेत्र से टिकट लेना चाहते थे, लेकिन बीरेंद्र सिंह और केंद्र में कांग्रेस के पुराने नेताओ ने ऐसी फील्डिंग लगाई की सुरजेवाला की जगह जेपी टिकट लेने में कामयाब रहे। उसी के बाद से जेपी और रणदीप सुरजेवाला के बिच राजनीतिक गतिरोध और दूरिया और बढ़ गयी थी। इसका परिणाम ही था की 2009 के चुनाव में रणदीप सुरजेवाला ने जेपी को जींद और कैथल कही से भी टिकट लेने नहीं दिया और उन्हें भजनलाल के गढ़ आदमपुर जाने के लिए मजबूर किया। यहां भी हजकां के कुलदीप बिश्नोई ने जेपी को 6015 वोटो से हराया।

अगले चुनाव अर्थात 2014 के चुनावों में जयप्रकाश अपने गृहक्षेत्र कलायत से चुनाव लड़ना चाहते थे , मगर रणदीप सुरजेवाला ने पार्टी आलाकमान में अपनी पैठ का फायदा उठाते हुए उन्हें टिकट मिलने नहीं दिया , परिणामस्वरूप जेपी को निर्दलीय टिकट से चुनाव लड़ना पड़ा। जेपी ने तब इनेलो के रामपाल माजरा को हराकर शानदार जीत हासिल की। अब जेपी दुबार कांग्रेस में आना चाहते है। लेकिन कांग्रेस की कोर कमिटी में शामिल रणदीप सुरजेवाला के समर्थन के बिना उनकी दाल नहीं गलने वाली , इसलिए उनका यह प्रयास इसे जोड़कर भी देखा जा रहा है। वैसे चर्चाये ये भी है की रामपाल माजरा भी कांग्रेस में शामिल हो सकते है। लेकिन फ़िलहाल संभावनाएं कम ही है। वैसे खुद को भावी मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने वाले सुरजेवाला को जयप्रकाश जैसे एक दमदार नेता की जरुरत थी। इसलिए दोनों नेताओ ने एक मंच में आना मुनासिब समझा। खैर अब देखना है की दोनों नेताओ के साथ आने पर कैसे करिश्नमा चलता है।

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