टुडे न्यूज़संपादकीय

जनता को ‘मुर्ख’ मत बनाओ बीरेंद्र सिंह

मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि 73 वर्षीय बीरेंद्र ने गजब काम कर दिया है, क्योंकि हमने वंशवाद की राजनीति को खत्म कर दिया है। जनाब यह पब्लिक है सब जानती है, इस प्रकार बरगलाना बंद करो। क्योंकि यह सभी जानते हंै कि चौधरी बीरेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री बनने का कितना मोह है, अपनी इच्छा उन्होंने कई बार जाहिर भी की है। इस मोह के कारण उन्होंने कई बार मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल की सभाओं में अपने तल्ख तेवर भी दिखाए हंै। मगर क्या अपना इस्तीफा अमित शाह को सौंप कर बीरेंद्र सिंह ने कोई महान काम नहीं किया है। क्योंकि जब तक अमित शाह और राज्यसभा के स्पीकर उनके इस्तीफे को स्वीकार नहीं कर लेते, मैं तो इस इस्तीफे को महज ड्रामेबाजी मानूंगा। चलो इस्तीफा स्वीकार भी कर लें तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता आपको तो पता है कि प्रधानमंत्री मोदी भाजपा से 75 साल वालों की छुट्टी करने में लगे हंै। भाजपा की नयी नीति के अनुसार 75 के बाद चुनाव में नो एंट्री-नो टिकट। महाशय बीरेंद्र अब 73 साल के हंै। 2 साल बाकी हैं उन्हें अपनी राजनीतिक विरासत को सेट करने के लिए। जब वह आगे टिकट पा ही नहीं सकते तो जाहिर है अपना कोई वारिस ही तो कुर्सी पर बिठाएंगे। अब आपको पता चला क्यों वो बार-बार अपने बेटे को चुनाव लड़वाना चाहते थे? क्योंकि माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी का स्पष्ट संकेत दे रखे हैं कि 75 की उम्र के बाद टिकट की कोई उम्मीद न करो। ऐसे में बीरेंद्र सिंह को लगा होगा कि जिसकी जिंदगी राजनीति में गई है, वो आज राजनीति के पक्के खिलाड़ी हैं। ऐसे में वो भला पॉलिटिक्स से कैसे जा सकते हैं? मुझे तो लगता है कि बीरेंद्र सिंह ने बेज्जती के डर और सत्ता के लालच में इस्तीफा दिया है। क्योंकि उनको पता था कि हर बार राजयसभा का सांसद पद नहीं मिलेगा। 75 के बाद वैसे भी पार्टी उनको टिकट नहीं देगी, ऐसे में उनकी सियासत को कौन संभालेगा? क्योंकि कुर्सी का नशा एक बार जुबान में चढ़ गया तो क्या बीरेंद्र साहब आसानी से इसे छोड़ देंगे? नहीं न बिलकुल नहीं। इसलिए तो उन्होंने सत्ता और राजनीति में वंशवाद को जिन्दा रखने के लिए अपने बेटे की आईएस की नौकरी छुड़वाकर उसे राजनीति में ला दिया। उस बृजेन्द्र सिंह को जिसे राजनीति में “A -B-C-D” का भी ज्ञान नहीं।
ऐसा तो कोई मुर्ख नहीं हो सकता कि पढ़ाई करे पायलट की और लोगों के घर जाकर धोये बर्तन, कहने का मतलब है कोई बेवकूफ नहीं है कि आईएएस की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ कर राजनीति में कदम रखे। कुछ लोग कहते हंै सेवा के लिए आये हैं राजनीति में, तो भाई क्या आईएएस की नौकरी करके वे क्या सेवा नहीं कर रहे थे जनता की ? वैसे सेवा और मेवा का गहरा रिश्ता है हमारी राजनीति में। यह बात बीरेंद्र सिंह भली-भांति जानते होंगे। अब देखो आप ताज्जुब करेंगे या नहीं कि जिस हिसार लोकसभा सीट से आईएएस सरजी को चुनाव लड़ने का मन कर रहा है, उस शहर की अब तक शक्ल तक नहीं देखी और चुनाव प्रचार कहां से शुरू किया पता है अपने माताश्री के विधानसभा क्षेत्र उचाना से। एक महीने से भी कम दिन बचा है और अब तक हमारे नेताजी जनता को अपनी शक्ल तक दिखाने नहीं आये हिसार। हैरत होती है और ताज्जुब होता है इन जैसे उम्मीदवारों पर। एक तो चुनाव में पैसा पानी की तरह बहाना और दूसरी तरफ शक्ल भी नहीं दिखाना। मुझे तो लगता है कि वैसे भी बीरेंद्र सिंह का राजनितिक कॅरिअर खत्म था। अगर 75 साल के पहले वह अपना इस्तीफा देते नहीं तो पार्टी उनसे इस्तीफा मांगती, अगर ऐसा होता तो वह शर्म से कहां जातें ? आपने तो देखा होगा उदाहरण हमारे आडवाणी जी का, मुरलीमनोहर जोशी, सुषमा स्वराज और अब बीरेंद्र सिंह का। बस एक ही बात कहानी है की “जनता को मुर्ख मत बनाओ बीरेंद्र सिंह जी”।

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