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सिद्धांतप्रिय, धार्मिक एवं जनप्रिय नेता थे चौ. भजनलाल

Hisar Today

मानव रत्न, बिश्नोई रत्न मेरे पिता स्व. चौ. भजनलाल जी एक कर्मयोगी, अनथक पथिक, युग पुरूष, गरीबों का ध्यान रखने वाले, दूरदृष्टा, दृढ़निश्चियी, आशावादी, सर्वजन हितैषी, निडर, साहसी, मृदुभाषी, मेहनती, सिद्धांतप्रिय, धार्मिक एवं जनप्रिय नेता के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने अपनी मेहनत लग्न, अनथक परिश्रम से एक युग को प्रभावित किया।

उन्होंने गीता में वर्णित “कर्मण्ये वाधिकारस्तेमा फलेषु कदानाचनम मा कर्मफल हेतुर्भूमा ते संगोत्सव कर्माणि कर्म” सिद्धांतों को सही अर्थों में अपनाते हुए कर्म को प्रधान मानते हुए हमेशा कर्म करने में विश्वास किया। उन्होंने सामाजिक व राजनैतिक जीवन में हिमालय की ऊंचाईयों को छुआ, वे पद से नहीं, बल्कि पद उनसे थे, उन्होंने समय से नहीं, बल्कि समय ने उनसे सीखा। \

चौ. भजनलाल का जन्म पंजाब सूबे के जिला बहालपुर गांव कोड़ांवाली (अब पाकिस्तान) के एक साधारण कृषक परिवार में माता कुंदना देवी व पिता श्री खैराज जी मांझु के धार्मिक परिवार में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव कोडांवाली के प्राथमिक विद्यालय में हुई तथा इंटर मीडियट तक की शिक्षा उन्होंने पास के गांव से प्राप्त की। पिताजी जी बताया करते थे कि उन्हें बचपन में कबड्डी तथा पहलवानी का बहुत शौक था तथा खेलने के पश्चात वे गांव के पास बहने वाली सादकी नदी में दोस्तों के साथ नहाते थे।

भारत विभाजन के फलस्वरूप पूरा आदमपुर के गांव मोहम्मदपुर रोही में आकर बसा। मात्र 19 वर्ष की युवावस्था में उन्होंने व्यापार में कदम रखा और अपने साथी पोकरमल के साथ फर्म बनाकर आढ़त का काम शुरू किया। चौ. भजनलाल ने साधारण व्यापारी के रूप में व्यावसायिक जीवन शुरू किया, राजनीति की ओर रूख हुआ और आदमपुर के ब्लॉक समिति सदस्य, पंच फिर सरपंच बने और अपनी कुशल संगठन व नेतृत्व क्षमता के कारण प्रदेश की सर्वोच्च पंचायत यानि विधानसभा में मुख्यमंत्री के रूप में पदस्थापित हुए। 11 वर्ष, 9 महीने और 25 दिन तक मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश का नेतृत्व किया। केन्द्र में कृषि, पर्यावरण व वन मंत्री के रूप में काम करते हुए उन्होंने आम आदमी के जीवन स्तर में सुधार के लिए अनेक ऐसी नीतियां बनाई, जो कालांतर में जाकर मील का पत्थर सिद्ध हुई।

1982 के दिल्ली एशियाई खेलों के दौरान जब आतंकवादियों की धमकियों से केन्द्र सरकार चिंतित थी तो उस समय चौ. भजनलाल ने ऐलान किया था कि हरियाणा की सीमा से एक भी आतंकवादी दिल्ली पहुंच जाए तो वे मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे। चाक-चौबंद व्यवस्था के दम पर उन्होंने अपना वादा निभाया और एशियाड 82 शान से शुरू हुआ और संपन्न हुआ। तब जरनैल भिंडरावाले की तरफ से पिताजी को धमकी मिली थी। तभी उन्हें जेड प्लस सुरक्षा मिली, जो जीवन पर्यंत उनके साथ रही। पिता जी का विपरीत परिस्थतियों से जूझने और चक्रव्यूह से विजेता की तरह निकलने का उदाहरण 1989 का फरीदाबाद लोकसभा चुनाव भी रहा है। मेव बहुल फरीदाबाद में उन्होंने दिग्गज नेता खुर्शीद अहमद को उस समय 1 लाख 37 हजार वोटों से शिकस्त दी थी। विरोधियों ने जब उन पर आरोप लगाए तो उनसे भी वे निडरता से निपटे। चाहे विजीलेंस जांच हो, जसवंत सिंह आयोग हो या फिर सीबीआई जांच तीनों जांचों में चौ. भजनलाल पाक साफ निकले और विरोधियों द्वारा उन पर लगाए गए तमाम आरोप झूठे साबित हुए।

स्व. चौ. भजनलाल एक कुशल राजनेता, सुयोग्य प्रशासक एवं श्रेष्ठ वक्ता थे। वन एवं पर्यावरण मंत्री के रूप में 4 दिसंबर 1986 को ‘पर्यावरण संरक्षण’ पर संसद में दिया गया उनका भाषण सर्वश्रेष्ठ भाषण है। संसद के 1947, 1997 तक के 50 वर्षों में दिए गए 100 भाषणों का संकलन किया गया, जिसमें डॉ. राधा कृष्ण, पंडित जवाहर लाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री राजीव गांधी जैसी महान हस्तियों के भाषण शामिल किए गए, जिनमें चौ. भजनलाल जी का यह भाषण भी शामिल है। चौ. भजनलाल जी एक साधारण परिवार से निकल आए थे, उन्होंने समाज के दबे, कुचलों, पिछड़ों को गले लगाया और लाखों लोगों को रोजगार देकर उनका जीवन स्तर ऊपर उठाया व उनके मसीहा बनकर उभरे। वे सुबह 5 बजे से लेकर रात 9 बजे तक लोगों की समस्याएं सुनते रहते थे।

उनके पास हर वर्ग के, हर क्षेत्र के लोग आते थे। उनके द्वार से कोई खाली हाथ नहीं जाता था। वे किसी जाति, धर्म व क्षेत्र की सीमा में नहीं बंधे थे। वे मृदुभाषी थे तथा प्रत्येक व्यक्ति को इज्जत देते थे। वे सभी वर्गों का समभाव से कल्याण करते थे। चौ. भजनलाल ने अपने सामाजिक व राजनैतिक जीवन में सिद्धांतों को लागू किया। वे समय की गति भांपते थे। मैंने देखा है कि घटनाओं के बारे में उनका आकलन सही व सटीक होता था। परिणाम के बारे में वे पहले से भविष्यवाणी कर देते थे, जो कालांतर में सही सिद्ध होती थी। उन्होंने कभी छल कपट से काम नहीं लिया। वे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की तरह आशावादी थे। कई बार उनके कार्यकर्ता उदास हो जाते थे तो वे कहते थे-सब ठीक हो जाएगा आगे चलकर और भी ठीक होगा।

तीन बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने चौ. भजनलाल ने अपने कार्यकाल में ऐसे अनेक जनकल्याणकारी कदम उठाए जो कालांतर में मील का पत्थर साबित हुए। मानेसर में टैक्नीकल हब व औद्योगिक नगरी बन चुके गुडग़ांव का ब्लू प्रिंट तैयार करवाना, यमुनानगर थर्मल प्लांट को मंजूरी देना, एक परिवार को एक रोजगार योजना शुरू करना, मेवात डेवेलपमेंट बोर्ड का गठन करना, पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत करके 25 वर्षों के बाद दोबारा जिला परिषदों का गठन करना, ग्रामीण क्षेत्रों को दिन भर में 60 प्रतिशत समय बिजली उपलब्ध करवाना, अपनी बेटी अपना धन योजना लागू करना, कन्या के जन्म पर 2500 रूपये के इंदिरा विकास पत्र के बदले 18 वर्ष बाद 25000 रूपये का भुगतान किया जाना, लड़कियों के लिए स्नातक तक मुफ्त शिक्षा योजना लागू करना, जाति व क्षेत्र के आधार पर भेदभाव की बजाय प्रदेश के कोने-कोने में बसे समाज 36 बिरादरी के लोगों को रोजगार के सम्मान अवसर उपलब्ध करवाना आदि उनके मुख्यमंत्री काल की उपलब्धियों की लंबी फेरहिस्त है।

वर्ष 1995 में आई भीषण बाढ़ के समय किसानों को 3000 रुपए से लेकर 10000 रुपए तक प्रति एकड़ व ट्यूबवैल के लिए 50 हजार रुपए का मुआवजा तुरंत प्रदान करके और बाढ़ पीडि़तों की मदद को जुटे रहकर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। चाहे एसवाईएल का विवाद हो या फिर प्रदेश की राजधानी चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने का फैसला, हर एक अंतरराज्यीय मसले पर चौ. भजनलाल ने हरियाणा प्रदेश की वकालत पूरे दमदार तरीके से की।

प्रदेश की प्यासी जनता की समस्या को दूर करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कपूरी गांव में कस्सी चलवा कर एसवाईएल (सतलुज यमुना संपर्क नहर) की खुदाई का कार्य शुरू करवाना, उनकी दूरदर्शिता थी। एसवाईएल का पानी लाने के प्रति उनकी लग्र इसी बात से जाहिर हो जाती है कि एसवाईएल नहर के निर्माण का 98 प्रतिशत कार्य उनके कार्यकाल में पूरा हुआ। पंच, सरपंच से लेकर मुख्यमंत्री के ऊंचे ओहदे तक पहुंचे चौ. भजनलाल जमीन से जुड़े व्यक्ति थे। उनकी सोच थी कि छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्हें राजनीति से जोडऩा जरूरी है। उनके मुख्यमंत्रीतत्व काल के बाद आज तक प्रदेश में छात्र संघ चुनाव नहीं हुए।

जीवन के अंतिम क्षणों में भी वह अपने घर आने लाने वाले लोगों का हाल-चाल तो पूछते ही थे साथ ही साथ उनके घर-परिवार की सलामती पूछना नहीं भूलते थे। एक वाक्य जो समर्थकों से मिलने के समय हर समय उनकी जुबान पर रहता था। यह ऐसा वाक्य था जो उनसे मिलने आने वाले हर पार्टी कार्यकर्ता चाहे वह छोटा हो अथवा बड़ा, उनकी धमनियों में नए रक्त का संचार कर जाता था। वह वाक्य था, और कोई मेरे लायक सेवा। किसी भी पुत्र की तरह मैं भी अपने पिताजी की पारिवारिक स्तर पर कमी को दूर करने तथा उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का सपना ही देखता हूं। भले ही आज चौ. भजनलाल शारीरिक रूप से हमारे साथ नहीं हैं किंतु उनका महान व्यक्तित्व मेरे लिए जीवन भर मार्गदर्शक व पे्ररणा स्रोत बना रहेगा। अपने राजनैतिक, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में कोई अहम फैसला करने से पूर्व मैं उन्हें मन ही मन याद करता हूं और सोचता हूं कि अब यदि पिताजी मेरे साथ होते तो मुझे क्या निर्देश देते। मेरी कल्पना में मिले उनके मार्गदर्शन के अनुसार मैं विकट परिस्थितियों में भी अपने को असहज महसूस नहीं करता।

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